nayaindia legacy of crisis modi विरासत पर संकट का दौर
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विरासत पर संकट का दौर

legacy of crisis modi

पता नहीं किस सनक में जलियांवाला बाग से लेकर साबरमती और इंडिया गेट से लेकर काशी  तक विध्वंस का अभियान चल रहा है। भव्यता के प्रति अपने अदम्य आग्रह की वजह से काशी की गलियों को सरकार ने गलियारा बना दिया। ताकि काशी विश्वनाथ मंदिर को भव्य रूप दिया जा सके। क्या महादेव को भव्यता पसंद है? उनके लिए तो कहा जाता है कि उन्हें टूटी हुई झोंपड़ी, नंदी की सवारी और भांग-धतूरे का प्रसाद प्रिय है! यह भी विरासत और परंपरा के प्रति अज्ञानता की एक मिसाल है। दुर्भाग्य से देश ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां इतिहास, विरासत, परंपरा, सभ्यता को मिटा कर सब कुछ नया गढ़ने का आग्रह पैदा हो गया है। यह व्यक्ति, समाज और देश तीनों के लिए अच्छा नहीं है। legacy of crisis modi

ब्रिटिश गणितज्ञ और दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने कहा था कि विकास क्रम में अमेरिका ने एक पायदान की छलांग लगा ली, वह सभ्यता के दौर से गुजरा ही नहीं और आधुनिक हो गया। उसी तरह भारतीय जनता पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ और उसके वैचारिक पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अपने विकास क्रम में एक पायदान की छलांग लगा ली। आजादी की लड़ाई से जुड़े बगैर ये संगठन सीधे चुनावी राजनीति में आ गए और लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी तलाशने लगे। तभी महाशक्ति बन जाने के बावजूद जिस किस्म की कुंठा और हीनता का बोध एक राष्ट्र के नाते अमेरिका के अंदर है वैसा ही हीनता बोध भाजपा के अंदर भी है। भाजपा का मौजूदा नेतृत्व इस हीनता बोध से कुछ ज्यादा ही ग्रसित दिख रहा है तभी उसकी सरकार इतिहास की उन तमाम स्मृतियों को लोगों के दिमाग से निकालने के ज्यादा प्रयास करती दिख रही है, जिसमें उसका हिस्सा नहीं है।

सबको पता है कि इतिहास को नहीं बदला जा सकता है। एक क्षण पहले जो कुछ घटित हो गया  वह इतिहास हो गया। दुनिया की कोई ताकत उसे नहीं बदल सकती है। लेकिन उसे स्मृति से जरूर निकाला जा सकता है या निकालने का प्रयास किया जा सकता है। ऐसी ही कुछ चीजों को यह सरकार देश के नागरिकों की सामूहिक स्मृति से निकालने के प्रयास कर रही है। आजादी की लड़ाई सहित आधुनिक भारत की तमाम गौरवशाली उपलब्धियों को लोगों की नजरों से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि समय के साथ इनकी स्मृति लोगों के दिमाग से निकल जाए। इंडिया गेट पर पिछले 50 साल से जल रही अमर जवान ज्योति को बुझा देना इसी प्रयास का हिस्सा है। अमर जवान ज्योति की मशाल 1971 के गौरवशाली युद्ध में शहीद सैनिकों के सम्मान में जल रही थी। युद्धों की जीत-हार से अलग बांग्लादेश की मुक्ति का यह युद्ध इस मायने में ऐतिहासिक था कि इसने भारतीय उप महाद्वीप का भूगोल बदला था। इस युद्ध के बाद एक नए देश का उदय हुआ था। इस युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक मशाल जलती रहे, इसमें भला किसी को क्या दिक्कत हो सकती है!

यह सही है कि इंडिया गेट अंग्रेजों ने बनवाया था और उस पर पहले विश्व युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के नाम लिखे गए हैं, जबकि नए बने राष्ट्रीय समर स्मारक पर 1971 की लड़ाई में शहीद सैनिकों के नाम अंकित हैं। उन सैनिकों के सम्मान में वहां भी एक मशाल जला दी गई थी। सवाल है कि क्या पहले विश्व युद्ध में शहीद सैनिकों की याद में एक मशाल नहीं जलती रह सकती है? वह भी एक महान लड़ाई थी और उसमें शहीद हुए सैनिकों की याद में दुनिया के लगभग हर देश में स्मारक बने हैं। यह ध्यान रहे भारतीय सेना का इतिहास आजादी के बाद नहीं शुरू होता है और न देश को आजादी 2014 में मिली है। ब्रिटिश शासन के समय से ही भारतीय सेना का इतिहास रहा है और बेहद गौरवशाली इतिहास रहा है। भारतीय सेना के जवान पहले विश्व युद्ध में शहीद हुए अपने पूर्वजों के शौर्य से प्रेरणा लेते रहे हैं। इसलिए अगर इंडिया गेट पर जिन शहीद सैनिकों के नाम अंकित हैं उनके सम्मान में भी एक ज्योति जलती रहे तो भारत पर कोई बहुत बड़ा बोझ नहीं पड़ने वाला है।

इसलिए यह फालतू का तर्क है कि दो अलग अलग जगह मशालें जल रही थीं इसलिए उन्हें मिला दिया गया या राष्ट्रीय समर स्मारक पर 1971 की लड़ाई के शहीद सैनिकों के नाम अंकित हैं इसलिए वहीं पर मशाल जलनी चाहिए। शहीद सैनिकों के नाम इंडिया गेट पर भी अंकित हैं, वे भी सैनिकों के लिए प्रेरणास्रोत हैं और उन शहीदों के वंशज भी अपने पूर्वजों के शौर्य पर गर्व करते होंगे। वह प्रेरणा, वह गर्व, वह श्रद्धा क्यों छीनी जा रही है? भारतीय सेना के जवानों और अधिकारियों की कई पीढ़ी ने इंडिया गेट पर सलामी दी है और दुनिया की महान हस्तियों ने वहां सिर झुकाया है। वहां की मशाल बुझा देना किसी के हीनता बोध को संतुष्ट करता होगा लेकिन देश के गौरव को कम करता है।

india gate amarjawan jyoti

इससे पहले सरकार ने पंजाब में जलियांवाला बाग की पूरी संरचना को बदल दिया है। वहां गोली लगी दिवारों की बजाय अब फाउंटेन और लाइट एंड साउंड शो दिखाई देते हैं। जिस बाग की मिट्टी, गोली के निशान वाली दिवारों और सैकड़ों लोगों की बर्बर हत्या का गवाह रहे कुएं को देख कर एक अव्यक्त क्रोध की अनुभूति होती थी, दिल-दिमाग एक साथ क्रोध और गर्व से भर जाता था, शरीर में सिहरन और रोमांच पैदा होता था वहां अब बेजान सी सजावट दिखाई देती है। गुजरात के साबरमती में इसी तरह महात्मा गांधी के आश्रम को नया रूप देने की तैयारी चल रही है। उसे भव्य और दिव्य बनाया जा रहा है। सोचें, क्या गांधी को भव्यता से प्रेम था? क्या सत्य, सादगी और अहिंसा उनकी ताकत नहीं थी? क्या हमारे पास कहीं तुलसी और कबीर की कुटिया होती तो उसे भी हम एक भव्य महल में बदल देते? ऐतिहासिक धरोहर और भव्यता के प्रति मोह, दो अलग अलग चीजें हैं। आप जितनी चाहें भव्य इमारतें बना सकते हैं लेकिन वह ऐतिहासिक विरासत की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

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पता नहीं किस सनक में जलियांवाला बाग से लेकर साबरमती और इंडिया गेट से लेकर काशी  तक विध्वंस का अभियान चल रहा है। भव्यता के प्रति अपने अदम्य आग्रह की वजह से काशी की गलियों को सरकार ने गलियारा बना दिया। भव्य काशी, दिव्य काशी अभियान के तहत सैकड़ों छोटे छोटे मंदिर तोड़ दिए गए और रास्ते में आने वाले विग्रह हटा दिए गए। इसलिए ताकि काशी विश्वनाथ मंदिर को भव्य रूप दिया जा सके। क्या महादेव को भव्यता पसंद है? उनके लिए तो कहा जाता है कि उन्हें टूटी हुई झोंपड़ी, नंदी की सवारी और भांग-धतूरे का प्रसाद प्रिय है! जिन चीजों से भारत की सभ्यता की निरंतरता को रेखांकित किया जाता है उनमें एक महादेव भी हैं। हड़प्पा की सभ्यता में भी महादेव की पूजा के प्रमाण मिलते हैं और एएल बाशम ने चार हजार साल पहले जिस बैल की पूजा होने का प्रमाण खोजा है वह महादेव का नंदी ही तो है, जिसकी आज भी पूजा होती है। ऐसे औघड़ दानी महादेव के मंदिर को भव्य बनाने का उद्यम किस मानसिकता का प्रमाण है? आप भगवान राम के लिए भव्य महलनुमा मंदिर बनवाएं तो समझ में आता है क्योंकि वे राजमहल में पैदा हुए थे। पर वैसा ही आग्रह महादेव के लिए क्यों? यह भी विरासत और परंपरा के प्रति अज्ञानता की एक मिसाल है। दुर्भाग्य से देश ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां इतिहास, विरासत, परंपरा, सभ्यता को मिटा कर सब कुछ नया गढ़ने का आग्रह पैदा हो गया है। यह व्यक्ति, समाज और देश तीनों के लिए अच्छा नहीं है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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