कोरोना के साथ रहना आसान नहीं

अंग्रेजी मुहावरे में एक कैच-22 सिचुएशन होती है, जिसे हिंदी में सांप-छुछुंदर की गति कहते हैं। भारत में इस समय केंद्रीय सरकार, राज्यों की सरकारें और हर खासो-आम नागरिक इसी स्थिति का शिकार है। उसे लॉकडाउन से निकलना है तो कोरोना वायरस से भी बचना है। पर न लॉकडाउन से निकलना इतना आसान है और न कोरोना वायरस से बचना आसान है। इसके लिए भारत की सरकारों ने एक नया जुमला गढ़ा कि कोरोना के साथ रहना सीखना होगा। पर मुश्किल यह है कि कोरोना इंसानों के साथ रहना नहीं सीख रहा है, वह इंसानों की जान लेने पर तुला है। कोरोना वायरस से हर दिन मरने वालों का अंतरराष्ट्रीय औसत पांच हजार का है और राष्ट्रीय औसत एक सौ से ऊपर का है।

कह सकते हैं कि भारत की आबादी के लिहाज से एक सौ या सवा सौ मौतों का औसत कोई ज्यादा नहीं है और न पांच हजार मामले रोज आने का औसत ज्यादा है। इसके मुकाबले दुनिया के देशों की स्थिति बहुत ज्यादा खराब है। सोशल मीडिया में बहुत व्यवस्थित तरीक से इसका प्रचार शुरू हो गया है। सरकार समर्थक समूहों में बताया जा रहा है कि अमेरिका, समूचे यूरोप, ब्रिटेन, ब्राजील और रूस को मिला कर जितनी आबादी है उतनी अकेले भारत की है। इसका मतलब यह समझाया जा रहा है कि भारत में कोरोना वायरस का मुकाबला इतने देशों में वायरस से मुकाबला करने के बराबर है और यह काम नरेंद्र मोदी की सरकार ने बहुत बेहतर तरीके से किया है।

यह असल में एक काउंटर नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप, ब्राजील, रूस के आंकड़े सामने रख कर तुलना की जा रही है। पर यह तुलना भी वक्त की बात है। आखिर कुछ समय पहले तक यहीं समूह दूसरे आंकड़े बता रहे थे और अब जबकि भारत में कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्या एक लाख पहुंच गई है तो उसी आंकड़े को दूसरे तरीके से पेश किया जाने लगा है। यह सब असल में गोलपोस्ट बदलते रहने की रणनीति का हिस्सा होता है, जिसमें कभी किसी एक स्टैंड पर टिके नहीं रहा जाता है ताकि समर्थकों को बचाव का नया तर्क हासिल होता रहे और आम नागरिक कंफ्यूजन में रहे। इसी वजह से अब जहां कहीं भी कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्या बताई जा रही है वहीं तुरंत यह बताया जाने लग रहा है कि मामले दोगुने होने की रफ्तार ये हो गई है और इतने लोग इलाज से ठीक हो गए हैं या मृत्युदर दुनिया में सबसे कम है।

बहरहाल, जिस दिन भारत में वायरस संक्रमितों की संख्या एक लाख करीब पहुंची है उसी दिन लॉकडाउन का चौथा चरण शुरू हुआ है और उसी दिन देश भर में लॉकडाउन से सबसे ज्यादा छूट देने का ऐलान भी हुआ है। यह कमाल का विरोधाभास है कि जिस समय देश में पांच सौ से कम मामले थे, उस दिन पूरे देश में सख्ती से लॉकडाउन लागू किया गया और अब जब मामले एक लाख पहुंच गए हैं और सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या 13 दिन में दोगुनी हो रही है तो लॉकडाउन में छूट दी जा रही है। हालांकि यह भी कमाल का आंकड़ा है, जो हर दिन खुद स्वास्थ्य मंत्री पेश कर रहे हैं कि भारत में संक्रमण के मामले दोगुने होने की रफ्तार कम हो रही है और यह अब 11 या 12 या 13 दिन तक पहुंच गई है।

सवाल है कि अगर मामले 13 दिन में ही दोगुने हो रहे हैं तो उसका अंत नतीजा क्या है? क्या सरकार ने इसका कोई प्रोजेक्शन बनाया हुआ है कि अगर इस रफ्तार से मामले दोगुने होते गए तो क्या होगा? क्या यह अनंतकाल तक चलता रहेगा? अगर मामले दोगुने होने की रफ्तार इतनी रहती है तब भी यह महीना खत्म होने तक भारत में दो लाख मामले होंगे। उस समय अगर दोगुने होने की दर 25 दिन भी पहुंच जाती है तो जून का महीना खत्म होने तक चार लाख या उससे ज्यादा मामले होंगे। असली बात तो यह है कि मामले कम होने किस दिन से शुरू होंगे? जैसे दुनिया के सभी सभ्य और विकसित देशों ने यह प्रोजेक्शन बनवाया कि मामले किस समय चरम पर पहुंचेंगे, उस समय आंकड़ा क्या होगा और कब से मामले कम होने लगेंगे, उस तरह भारत कोई प्रोजेक्शन क्यों नहीं बनवा रहा है? क्या कोई इस बात की गारंटी दे सकता है कि 31 मई को संक्रमण बढ़ने की दर धीमी हो जाएगी और उसके बाद लॉकडाउन बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी?

दूसरा सवाल है कि लॉकडाउन बढ़ाने का आधार क्या है और इसकी शर्तों में छूट देने का आधार क्या है? आम लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी किसी महामारी के बीच क्या सिर्फ इस आधार पर छूट दी जा सकती है कि अर्थव्यवस्था डूब रही है और अब लोगों की जान से ज्यादा उनका जहान बचाने की चिंता करनी चाहिए? ऐसा किसी देश में देखने को नहीं मिला। सबके पास लॉकडाउन लागू करने का वैज्ञानिक आधार था, लॉकडाउन के पीरियड में क्या काम करना है इसका ब्लूप्रिंट था और उससे बाहर कैसे निकलना है इसकी भी तैयारी थी। तभी उन्होंने मामले बढ़े तो लॉकडाउन किया और मामले कम होने लगे तो छूट देनी शुरू की।

भारत में इसका बिल्कुल उलटा मामला है। जिस समय केसेज कम थे उस समय लॉकडाउन लागू हुआ और जब तेजी से मामले बढ़ने लगे तो लॉकडाउन में छूट दे दी जा रही है। कहा गया कि कोरोना वायरस के साथ रहना सीखें। पर वायरस के साथ रहना बहुत मुश्किल है। किसी भी वायरस या बीमारी के साथ तभी रहा जा सकता है, जब उसकी दवा आ जाए। जैसे दुनिया पिछले 40 साल से एचआईवी के साथ रह रही है। अभी तक उसका टीका नहीं आया है। पर दवा आ गई है। इसलिए बीमारी का पता लगने पर इलाज संभव है। तभी पिछले चार दशक में इस बीमारी से तीन करोड़ 20 लाख लोगों की मौत के बावजूद दुनिया इसके साथ रह रही है। पर कोरोना वायरस का न तो टीका आया है और न दवा बनी है। ऊपर से इससे संक्रमित होने का तरीका और संक्रमण बढ़ने की दर दूसरी तमाम संक्रामक बीमारियों से अलग और ज्यादा है।

तभी इसके साथ रहना बहुत मुश्किल है और उतना ही मुश्किल है इससे बचने के लिए पूरे देश को लॉकडाउन में रखना। सरकार बिना सोचे समझ देश को 68 दिन के लॉकडाउन में डाल चुकी है। यह दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन है। अमेरिका में भी सभी 33 करोड़ लोग लॉकडाउन में नहीं रहे। चीन ने तो कंपलीट लॉकडाउन सिर्फ एक करोड़ की आबादी वाले वुहान में किया था। पर भारत में 130 करोड़ लोग कंपलीट लॉकडाउन में रहे और वह भी बिना किसी ठोस, वैज्ञानिक आधार के और अब समूचा देश, आम नागरिक, सरकार, अर्थव्यवस्था सब इसके दुष्चक्र में फंस गए हैं, जिससे निकलने का रास्ता फिलहाल नहीं दिख रहा है।

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