मानी जाए राज्यों की मांग

कोरोना वायरस से लड़ने में केरल के मॉडल की दुनिया भर में तारीफ हुई। मगर अब वही राज्य घोर आर्थिक संकट में है। जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों के पास राजस्व के स्रोत वैसे भी काफी कम बचे थे। शराब बिक्री, जमीन रजिस्ट्री आदि जैसे ही स्रोत हैं, जिनसे उन्हें आमदनी होती है। लॉक़डाउन में इन सबकी वसूली रुक गई। जीएसटी का राज्यों हजारों करोड़ का हिस्सा केंद्र ने जारी नहीं किया है। नतीजतन, कोरोना से लड़ाई और लॉकडाउन के प्रभावित क्षेत्रों को मदद देने के मामलों में राज्यों के हाथ तंग हो गए हैं। यह समस्या सिर्फ केरल की नहीं है। आंध्र, बिहार, ओडीशा जैसे भी राज्य भी केंद्र से धन की मांग कर चुके हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का तो कहना है कि राज्य के पास फंड की भारी कमी है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो कर्मचारियों को तनख्वाह देना मुश्किल हो जाएगा। यही बात प्रधानमंत्री के साथ वीडियो कांफ्रेसिंग में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने कही थी।

अमरिंदर सिंह ने एक निजी समाचार चैनल के को दिए इंटरव्यू में कहा कि हमें अभी केंद्र सरकार से पैसे लेने हैं। हमारे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और एक्साइज के पैसे केंद्र सरकार के पास बकाया है। राज्य की लगभग 6200 करोड़ रु. की एक्साइज ड्यूटी नहीं आई है। इसके पहले उन्होंने लॉकडाउन के तहत लागू शराबबंदी पर भी सवाल उठाए थे। कहा था- केंद्र सरकार ने शराबबंदी कर रखी है। राज्य को सबसे ज्यादा शराब पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी से ही कमाई होती है। राज्य केंद्र सरकार से शराब की दुकानें खोलने के लिए कह चुके हैं। अगर उन्हेम एक्साइज और जीएसटी का पैसा मिल जाए तो थोड़ी राहत होगी। वरना “मैं तनख्वाह नहीं दे पाऊंगा।” बेशक कोरोना के खिलाफ लड़ाई लंबी और महंगी है। केंद्र और राज्य सरकारों को एक साथ आकर लड़ना होगा। राज्य लगातार कोरोना की जांच कर रहे हैं। इसका उन पर भारी खर्च आ रहा है। अभी एक मरीज का टेस्ट करने में तकरीबन दो हजार रु. लगते हैं। अगर सबका टेस्ट होगा तो उसके लिए राज्यों को अतिरिक्त फंड चाहिए। मुद्दा है कि यह कहां से आएगा। और अगर ये फंड नहीं मिलेगा, तो क्य कोरोना के खिलाफ लड़ाई कमजोर नहीं पड़ जाएगी? इसीलिए केंद्र को राज्यों की तरफ से आई आर्थिक पैकेज की मांग पर तुरंत और अनिवार्य ध्यान देना चाहिए।

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