lok sabha election 2024 ममता के पत्ते बिछाना और.....
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ममता के पत्ते बिछाना और…..

lok sabha election 2024

ममता बनर्जी जोश में है। वे 2024 के आम चुनाव के पत्ते बिछाने लगी है। वैसे ही जैसे एक वक्त चार सौ से अधिक सीटों का बहुमत लिए राजीव गांधी के खिलाफ वीपीसिंह ने बोफोर्स के बूते पत्ते बिछाए थे या 2012 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सरकार के खिलाफ पत्ते बिछाए। सवाल है ममता बनर्जी के पत्तो का दम क्या है? कौन सी वह तुरूप है जिससे 2024 से पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ अधबीच वाले मगर निर्णायक मतदाताओं में नरेंद्र मोदी हटाओं का माहौल बने! हां, दिल्ली की स्थापित बहुमत सत्ता तभी चुनावों में हारती है जब प्रधानमंत्री के खिलाफ यह हवा बने कि यह तो भ्रष्ट है। lok sabha election 2024

निकम्मा है! लोगों में मन ही मन गुस्सा हो, हटाने का निश्चय हो। इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की हार, राजीव गांधी के रिकार्ड तोड बहुमत की हार, या सर्वप्रिय-शाईनिंग वाजपेयी की आक्समिक हार और मनमोहन की दस साला सरकार की पराजय, चारों में निर्णायक मनोभाव था कि बहुत हुआ अब बदलों इस प्रधानमंत्री को! भ्रष्ट है (हां, वाजपेयी की हार में भी कारिगल-ताबूत-तहलका का हल्ला मामूली नहीं था)। निकम्मा है।

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सो फालतू बात कि लोगों को पहले विकल्प दिखेगा तो परिवर्तन होगा। लोग बिना चेहरे के ही प्रधानमंत्री को हरा डालेंगे बेशर्तै उसके करप्ट-निकम्मे होने की हवा बने। क्या ममता बनर्जी ऐसे पत्ते नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिछा सकती है? क्या ममता और उनके प्रबंधक प्रशांत किशोर यह हवा बनवा सकते है कि नरेंद्र मोदी चोर है और ममता ईमानदारी की देवी? नरेंद्र मोदी अदानी- अंबानी के सेवक है न कि लोक सेवक? या ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में गुजरात से भी बेहतर जनहितकारी मॉडल बनाया है और वह मां दुर्गा की सच्ची हिंदू उपासक है, हिंदूवादी है और उनके शक्तिरूप से मुसलमान, पाकिस्तान, चीन थर्राएंगे?

इस मसला ज्यादा मायने वाला नहीं है कि हिंदीभाषी प्रदेशों में बांग्लाभाषी नेता लोकप्रिय नहीं होगा।  गुजरात की 26 लोकसभा सीटों के गुजराती नरेंद्र मोदी के मुकाबले  बंगाल की 42 लोकसभा सीटों वाली ममता ऐसी कई खूबियां लिए हुए है जिससे उनकी उत्तर भारत में भी इमेज बन सकती है। फाइटर, लडाकू होने का चेहरा व चप्पल, झोला, साडी पहन सादगी से जीने वाली और दुर्गा पूजक, ब्राह्यण होने के पहलूओं में नरेंद्र मोदी के मुकाबले ममता बनर्जी के पास पत्ते कम नहीं है। संभव यह भी है कि हिंदीभाषी प्रदेशों में ब्राह्यणों का यदि नरेंद्र मोदी-योगी-शाह के राज से मोहभंग बना तो अंततः वह वक्त दूर नहीं है जब बनारस के पंडित लोग ममता बनर्जी को वैसे ही दुर्गा अवतार माफिक पूजने लगे जैसे वीपीसिंह को राजऋषि बनाया था या नरेंद्र मोदी के लिए हर,हर करते हुए थे।

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हां, संभव है सन् 2024 आते-आते मोदी-योगी-शाह का ब्राह्यणों के साथ छल नया सामाजिक समीकरण बनवा डाले जिसका आक्समिक फायदा ममता बनर्जी को हो सकता है।  

बावजूद इसके ये सारे पत्ते एक और एक दो वाले है। मोदी के खिलाफ तुरूप या एक और एक ग्यारह की सिनर्जी, कैमेस्ट्री बनवाने वाली नहीं है। इनसे नरेंद्र मोदी की भ्रष्ट, निकम्मे और अब बहुत हुआ वाला मनोभाव हिंदीभाषी प्रदेशों में नहीं बनने वाला है। इसलिए कि बुनियादी पेंच है कि उसे बनवाने के माध्यम कहा है?  हिंदीभाषी प्रदेशों में कौन ममता बनर्जी की डुगडुगी बनाने वाला है? वे ब्राह्यण है, दुर्गा अवतार है, दुश्मनों की नाशक है, ईमानदार है यह बात यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश याकि लोकसभा की 543 सीटों में से 239 सीटों वाले हिंदी प्रदेशों में प्रचारित कैसे होगी? इन प्रदेशों में ममता बनर्जी के यदि आज नामलेवा लोग, संगठन, अखबार-मीडिया नहीं है तो अगले दो वर्षो में कैसे हो जाएंगे?

ऐसा हो सकना सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस से, कांग्रेस के साथ एलायंस से, राहुल -प्रियंका गांधी के साथ एक और एक ग्यारह की कैमेस्ट्री से संभव है। जेपी के वक्त में या वीपीसिंह ने या 2004 में सोनिया गांधी ने मतभेद-खुन्नस के बावजूद जनसंघ, भाजपा या लेफ्ट पार्टियों से एलायंस बना कर प्रधानमंत्री की हवा बिगाड़ने-हराने की रणनीति बना कर यदि सफलता पाई थी तो सीमाओं को समझते हुए था! तब 2024 में ममता बनर्जी और उनके प्रबंधक प्रशांत किशोर कैसे अकेले, बिना कांग्रेस से एलायंस के उत्तर भारत में नरेंद्र मोदी की हवा बिगाड़ सकते है? ये कांग्रेस की हवा बिगाड़ रहे है या नरेंद्र मोदी की?  इन्हे कांग्रेस को खत्म करना है या नरेंद्र मोदी को? तभी लाख टके का सवाल है ममता के पत्ते बिछाने की मौजूदा मुहिम कांग्रेस को हराने के लिए है या नरेंद्र मोदी को जीताने के लिए?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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