loksabha election BJP Modi मैं बताता हूं, भाजपा कहां जाने वाली है
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मैं बताता हूं, भाजपा कहां जाने वाली है

अगर थोथे हिंदुत्व और फ़र्जी राष्ट्रभक्ति के पत्ते भाजपा के पास न हों और भावविभोर मतदाता इस जालबट्टे के ताने-बानों में न उलझें तो उसका पारंपरिक वोट 20 प्रतिशत के आसपास ही है। पारंपरिक यानी पारंपरिक। और, यह पारंपरिक वोट अब हर अगले चुनाव के साथ बढ़ना नहीं, घटना है। इसलिए कि लोकसभा के हर चुनाव में तक़रीबन पांच प्रतिशत युवा मतदाता सूची में शामिल होते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची में 18 साल पूरे कर लेने वाले साढ़े चार करोड़ युवा जुड़े थे।… मुझे तो लग रहा है कि तीस महीने बाद के चुनावी समर से गुज़रने के बाद भाजपा लोकसभा में पौने दो सौ के आंकड़े पर झूल रही होगी। विपक्ष एक हो-न-हो, मिल कर लड़े-न-लड़े, भाजपा का हाल यही होना है। loksabha election BJP Modi

हिंदू हृदय सम्राट होने के अहसास से लबरेज़ और मौक़ा पाते ही फ़ौजी वर्दी पहन कर घूमने के शौक़ीन हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का मौजूदा कार्यकाल आधा बीत गया है। तीस महीने चले गए, तीस बचे हैं। तीस महीने पहले वे भारतीय जनता पार्टी के तीन सौ तीन सदस्यों के कंधे पर सवार हो कर सत्रहवीं लोकसभा में पहुंचे थे। अब उन के अनुचरों का यह आलाप शुरू हो गया है कि अगले साल जब अयोध्या में राम मंदिर बन जाएगा तो पूरा देश नरेंद्र भाई के चुनाव-यज्ञ में एक सौ एक सदस्यों का अतिरिक्त शगुन अर्पित कर अठारहवीं लोकसभा में भाजपा को चार सौ के पार पहुंचा देगा।

अनुचर किसी के भी हों, तर्कों से परे होते हैं। सो, अगर आप नरेंद्र भाई को भगवान मानने वाले किसी दास से पूछेंगे कि ऐसा कैसे होगा और कहां से होगा तो वह आप के गणितीय सवालों के जवाब में अपनी आस्था के आसन पर विराजित हो जाएगा और चाकर-भाव से अपना श्लोक-वाचन प्रारंभ कर देगा। आप को सुनना है तो सुनें, वरना उसे तो कुछ गुनना है नहीं। भैंस खड़ी पगुराए की उसकी मुद्रा से आजिज़ आ कर आप को ही पीठ फेर कर जाना होगा। नरेंद्र भाई के ऐसे अर्चकों की तादाद पहले से कम तो बहुत हुई है, लेकिन अभी भी वे इतनी संख्या में बाकी हैं कि माहौल बनाए रख सकें।

पिछले एक दशक में आधा दर्जन से ज़्यादा भारतीय राजनीतिकों को अपनी झक्कूगिरी का शिकार बना लेने वाले चुनावी आंकड़ेबाज़ी के एक सटोरिए ने अपना मटका फूट जाने से कुंठित हो कर पांच-सात दिन पहले कह दिया कि राहुल गांधी ग़लतफ़हमी में हैं और भाजपा अभी बीस साल कहीं नहीं जाने वाली। तब से नरेंद्र भाई के प्रति मेरे तो गिरधर गोपाल भाव से भरी चंपू-मंडली चने के झाड़ पर चढ़ी हुई है। चारण तब से फूल कर और कुप्पा हैं। मर्कट मुद्रा में डाल-डाल कूद चुके इस फ़रेबी ने फ़तवा दिया है कि जिस राजनीतिक दल के पास 37 फ़ीसदी वोट हों, वह अजर है, अमर है।

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अब इस छद्म चुनाव विशेषज्ञ को कौन समझाए कि भाजपा के पास देश में 37 प्रतिशत बुनियादी वोट नहीं हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे येन-केन-प्रकारेण सवा 37 फ़ीसदी वोट मिल ज़रूर गए, लेकिन यह मत भूलिए कि 63 प्रतिशत मतदाता उसके ख़िलाफ़ वोट दे कर आए। 2014 में जब नरेंद्र भाई का सितारा तकनीक, तिलिस्म और तक़रीर के बूते राजनीतिक आसमान छू रहा था, तब भी 69 फ़ीसदी मतदाताओं ने उन्हें वोट नहीं दिया था। लोकसभा के ये दोनों चुनाव देश के सियासती परदे पर कृत्रिम रंगों की बौछार करने से निर्मित असामान्य परिस्थितियों के साए तले हुए थे। वरना असलियत कुछ और है।

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असलियत यह है कि 2014 से तीन दशक पहले 1984 में भाजपा का वोट प्रतिशत सिर्फ़ साढ़े सात था। 1989 आते-आते संघ-ग़िरोह हिंदुत्व की अपनी कार्यावली पर बहुत कुछ काम कर चुका था और उस साल हुए चुनाव में भाजपा की सीटें दो से बढ़ कर 85 हो गई थीं। मगर वोट-प्रतिशत तब भी साढ़े ग्यारह फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं था। 1991 का चुनाव राम जन्मभूमि विवाद के चरम तनाव की बिसात पर हुआ था और भाजपा के वोट बढ़ कर 20 प्रतिशत हो गए थे। 1996 के चुनाव होने तक कारसेवक अयोध्या में अपना कारनामा कर चुके थे और भाजपा की सीटें बढ़ कर 161 हो गईं, मगर उसका वोट सवा 20 प्रतिशत पर ही रहा। 1998 में उसे साढ़े 25 प्रतिशत वोट मिले। 1999 का चुनाव करगिल युद्ध की यादों की बारात बना तो भाजपा को सवा 28 प्रतिशत वोट मिल गए। 2004 में भाजपा के वोट पौने 24 फ़ीसदी पर आ गए और 2009 में गिर कर पौने 19 प्रतिशत रह गए।

इस तर्क-श्रंखला से यह अर्थ निकलता है कि अगर थोथे हिंदुत्व और फ़र्जी राष्ट्रभक्ति के पत्ते भाजपा के पास न हों और भावविभोर मतदाता इस जालबट्टे के ताने-बानों में न उलझें तो उसका पारंपरिक वोट 20 प्रतिशत के आसपास ही है। पारंपरिक यानी पारंपरिक। और, यह पारंपरिक वोट अब हर अगले चुनाव के साथ बढ़ना नहीं, घटना है। इसलिए कि लोकसभा के हर चुनाव में तक़रीबन पांच प्रतिशत युवा मतदाता सूची में शामिल होते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची में 18 साल पूरे कर लेने वाले साढ़े चार करोड़ युवा जुड़े थे। सो, इन पांच प्रतिशत मतदाताओं में एकाध फ़ीसदी को तो छोड़ दीजिए, मुझे नहीं लगता कि आने वाले चुनावों में बाकी कोई नरेंद्र भाई के मनगढ़ंत गोलगप्पों के खोमचे पर हाथ में दोना लिए कभी भी खड़ा मिलेगा। इस मतदाता वर्ग को रोज़गार और मुल्क़ के सूरतेहाल की फ़िक्र पहले होगी।

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पिछले चुनाव में भाजपा ने आधा दर्जन राज्यों की क़रीब-क़रीब सभी सीटों पर कब्ज़ा कर लिया था। कोई आधा दर्जन और प्रदेशों की नब्बे फ़ीसदी सीटें भी वह जीत गई थी। चार बड़े प्रदेशों में भी भाजपा को आधी सीटें हासिल हो गई थीं। गुजरात की सभी 26, हरियाणा की सभी 10, उत्तराखंड की सभी 5, दिल्ली की सभी 7, हिमाचल की सभी 4, त्रिपुरा की दोनों और अरुणाचल की दोनों सीटों पर भाजपा जीती थी। राजस्थान की 25 में से 24, मध्यप्रदेश की 29 में से 28, कर्नाटक की 28 में से 25, झारखंड की 14 में से 12 और छत्तीसगढ़ की 11 में से 9 सीटें उसे मिली थीं। उत्तर प्रदेश की 80 में से 63 सीटें भाजपा की झोली में गई थीं। महाराष्ट्र की 48 में से 23, पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 और बिहार की 40 में से 17 सीटें भाजपा का मिली थीं। यह वज़ह है कि इस वक़्त लोकसभा में तक़रीबन 56 प्रतिशत सदस्य भाजपा के हैं।

यह समझने के लिए बड़ा भारी चुनाव विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है कि 2024 के चुनाव में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और झारखंड से भाजपा को 2019 की तरह 254 सीटें तो मिलने वाली हैं नहीं। इन 11 राज्यों से 2024 में उसे कम-से-कम 121 सीटों का घाटा होगा। 2019 के चुनाव में नौ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। आंध्र प्रदेश में भाजपा को 25 में से एक भी सीट नहीं मिली थी। तमिलनाडु में भी वह 39 में से एक भी जगह नहीं जीती थी। केरल की 20 सीटों पर भी उसका खाता नहीं खुला था। अगले लोकसभा चुनाव तक भाजपा इन तीन राज्यों की 84 में से आख़िर कितनी सीटें जीतने लायक हो जाएगी?

तो और कोई समझने को तैयार हो-न-हो, आप चूंकि समझदार हैं, इसलिए समझ लीजिए कि भाजपा 2024 में कहां जाने वाली है? जिन्हें लग रहा है कि अभी बीस-तीस साल भाजपा कहीं नहीं जाने वाली, उनके कल्पवयन को मेरा नमन! मगर मुझे तो लग रहा है कि तीस महीने बाद के चुनावी समर से गुज़रने के बाद भाजपा लोकसभा में पौने दो सौ के आंकड़े पर झूल रही होगी। विपक्ष एक हो-न-हो, मिल कर लड़े-न-लड़े, भाजपा का हाल यही होना है। कांग्रेस के पास तो लोकसभा की अभी साढ़े नौ फ़ीसदी सीटें ही हैं, इसलिए आज उसकी कोई बात करूंगा तो आपकी ठहाका वाज़िब होगा। मगर थोड़ा समय बीतने दीजिए, तब आपको वह बीजगणित बताऊंगा, जो 2024 में कांग्रेस की डेढ़ शतकीय बारहखड़ी को आकार देगा। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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