तीन साल पहले ही राजनीति शुरू - Naya India
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तीन साल पहले ही राजनीति शुरू

पिछले महीने नरेंद्र मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल की दूसरी सालगिरह मनाई। सो, लोकसभा के चुनाव तीन साल के बाद होने हैं। लेकिन अभी से विपक्ष की राजनीति शुरू हो गई। यह कम हैरानी की बात नहीं है कि विपक्ष की राजनीति प्रादेशिक पार्टियां कर रही हैं। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस अभी केंद्र सरकार और भाजपा से ट्विटर पर लड़ने में लगी है। ऐसे में दो सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि तीन साल पहले लोकसभा चुनाव के नजरिए से विपक्ष के राजनीति शुरू करने का क्या मकसद है और दूसरा कि प्रादेशिक पार्टियों के पहल करने का क्या मतलब है?

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पहले सवाल का जवाब भाजपा की राजनीति से जुड़ा है। असल में इस समय देश भर में भाजपा के अंदर कलह की खबरें हैं। दूसरे, पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने भाजपा और नरेंद्र मोदी व अमित शाह के अब तक सफल होती रही चुनाव रणनीति की फॉल्टलाइन्स को जाहिर कर दिया है। तीसरे, कोरोना वायरस के संकट में नरेंद्र मोदी के गवर्नेंस मॉडल और संकट प्रबंधन की उनकी क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। तभी विपक्षी पार्टियों को ऐसा लग रहा है कि इस समय केंद्र सरकार, भाजपा और नरेंद्र मोदी तीनों कमजोर विकेट पर हैं। लोगों के मन में उनके प्रति नकारात्मक विचार आ रहे हैं और इस लिहाज से यह सही समय है कि उनके खिलाफ एकजुट होकर आम नागरिकों के मन में यह बात बैठाई जाए कि देश में एक राजनीतिक विकल्प उपलब्ध है।

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असल में पिछले सात साल में केंद्र सरकार और भाजपा ने यह धारणा बनवाई है कि नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है और मोदी हैं तो मुमकिन है। पांच राज्यों के चुनाव नतीजों और कोरोना प्रबंधन के बाद यह धारणा बदली है। यह धारणा भाजपा के अंदर भी बदली है तभी कई जगह भाजपा के पुराने क्षत्रप अपने को आगे लाने लगे हैं और कई राज्यों से यह मैसेज है कि मजबूत क्षत्रप नेता अपनी राजनीति कर रहे हैं। वे आलाकमान के दबाव में नहीं हैं। योगी आदित्यनाथ और बीएस येदियुरप्पा ने खासतौर से यह धारणा बनवाई है। चुनाव नतीजों, कोरोना, अर्थव्यवस्था की दुर्दशा आदि से संयोगवश यह स्थिति अभी बन गई है कि केंद्र सरकार और भाजपा बैकफुट पर हैं और विपक्ष की कोशिश उन्हें लगातार बैकफुट पर रखने की है। तभी अचानक जून के महीने में राजनीति तेज हो गई है। ध्यान रहे मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ भी तीन साल पहले ही माहौल बनना शुरू हुआ था। फर्क यह है कि मौजूदा सरकार और भाजपा का नेतृत्व कोर्स करेक्शन में विश्वास करते हैं। इसलिए आगे दिलचस्प राजनीति होने वाली है।

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दूसरा सवाल यह है कि कांग्रेस को छोड़ कर यह पहल दूसरी विपक्षी पार्टियां क्यों कर रही हैं? इसका सीधा कारण यह है कि भाजपा की तरह कांग्रेस भी बैकफुट पर है। पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा ने तो फिर भी असम और पुड्डुचेरी में जीत हासिल की और बंगाल में भी अपनी सीटें बढ़ाईं पर कांग्रेस तो हर जगह से खत्म हुई। केरल में भी उसे जीत नहीं मिली, असम में भी स्थिति कमजोर रही और बंगाल में तो वह एक भी सीट नहीं जीत पाई। दूसरे, कांग्रेस की अंदरूनी कलह खत्म नहीं हो रही है। पार्टी का आला नेतृत्व शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन में सिर गाड़ कर सही समय आने का इंतजार कर रहा है। सोचें, दो साल से अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी काम कर रही हैं और पार्टी एक पूर्णकालिक अध्यक्ष का चुनाव नहीं करा पा रही है। तीसरे, प्रादेशिक क्षत्रपों को अपने लिए मौका दिख रहा है।

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ममता बनर्जी लगातार तीसरी बार चुनाव जीती हैं और सबको पता है कि वे इस बार कार्यकाल पूरा करने से पहले भतीजे को मुख्यमंत्री बनाएंगी और खुद राष्ट्रीय राजनीति करेंगी। तभी उन्होंने अपने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को शरद पवार से मिलने भेजा और प्रशांत किशोर की कंपनी आई-पैक के साथ अपनी पार्टी का करार 2026 तक बढ़ा दिया। शरद पवार भी इसी मोड में हैं और चंद्रबाबू नायडू से लेकर के चंद्रशेखर राव तक दूसरे कई क्षत्रप अब प्रदेश की राजनीति अगली पीढ़ी को सौंपने वाले हैं। इन सबकी नजर 2024 के लोकसभा चुनाव पर है। इनको लग रहा है कि 1989 या 1996 का इतिहास दोहराया जा सकता है। यानी लोकसभा त्रिशंकु बन सकती है और तब किसी की भी लॉटरी खुल सकती है। इस उम्मीद में सभी प्रादेशिक क्षत्रप अपनी अपनी तैयारी कर रहे हैं। ध्यान रहे तैयारी सबकी है सिर्फ ममता बनर्जी की इसलिए दिख रही है क्योंकि वे अभी चुनाव जीती हैं और आमने-सामने के घमासान में नरेंद्र मोदी और अमित शाह को हराया है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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