loksabha election Narendra modi 2024 तक लोक लुभावन राजनीति
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2024 तक लोक लुभावन राजनीति

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प्रधानमंत्री का हर कदम अब 2024 की राह में उठ रहा है। असली चिंता 2024 की है। उसी चिंता में कृषि कानून वापस हुए हैं और उसी चिंता में श्रम सुधारों के कानूनों पर अमल टल रहा है। प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक सब दावा करते थे कि सरकार सुधार  जारी रखेगी। लेकिन अब कोई बड़ा सुधार नहीं होना है। अगले दो साल सिर्फ लोक लुभावन राजनीति होगी। कृषि कानून वापस लेकर सरकार ने इसकी शुरुआत कर दी है। सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत कम करने के लिए उत्पाद शुल्क भी घटाया है और युद्ध जैसी आपात स्थिति के लिए भंडार किए गए तेल में से भी 50 लाख बैरल तेल निकाल रही है ताकि कीमत कम की जा सके। आने वाले दिनों में सुधार ठप्प रहेंगे या सरकार उनसे पीछे हटेगी। नए भावनात्मक मुद्दे उठाए जाएंगे ताकि लोगों का ध्रुवीकरण कराया जाए। तभी संभव है कि संशोधित नागरिकता कानून को लागू करने की दिशा में आगे बढ़े या जम्मू कश्मीर में परिसीमन के बाद चुनाव करा कर हिंदू मुख्यमंत्री बनाने का दांव चला जाए या समान नागरिक संहिता जैसा कोई कानून बने लेकिन यह संभव नहीं है कि कोई ऐसा आर्थिक सुधार हो, जिससे किसी भी समूह के नाराज होने की जोखिम हो।

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ध्यान रहे केंद्र सरकार ने कृषि कानून को बड़ा आर्थिक सुधार बताते हुए पास किया था और दावा किया जा रहा था कि इससे देश के ज्यादातर किसानों को फायदा होगा। कानून वापस लेने के बाद भी सरकार की ओर से यहीं कहा जा रहा है कि देश के ज्यादातर किसान इन कानूनों से खुश थे लेकिन सरकार थोड़े से किसानों को इसके फायदे नहीं समझा पाई। खुद प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारी ही तपस्या में कोई कमी रह गई होगी, जो थोड़े से किसानों को इसका फायदा नहीं समझा पाए। सोचें, कथित तौर पर इतना क्रांतिकारी सुधार और थोड़े से किसानों को नहीं समझा पाए तो वापस ले लिया! ऐसे में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि दूसरे आर्थिक सुधार होंगे और उन्हें लागू किया जाएगा?

Pm modi on bank

केंद्र सरकार ने कृषि कानूनों के साथ ही श्रम सुधार कानून बनाए थे लेकिन इन कानूनों को भी लागू करने के लिए अभी तक नियम अधिसूचित नहीं किए हैं। इस साल जून में तब के श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने कहा था कि कोरोना वायरस की महामारी और राज्यों सरकारों की लापरवाही के चलते इन कानूनों को नहीं लागू किया जा सका है लेकिन सरकार इसे एक अक्टूबर से हर हाल में लागू करेगी। लेकिन एक अक्टूबर की सीमा भी निकल गई और सरकार ने इन कानूनों के नियम अधिसूचित नहीं किए। सोचें, इन कानूनों को कितनी हड़बड़ी में पास कराया गया था। उस समय संसद में इस पर कोई बहस नहीं हुई और न अलग से विचार हुआ और कानून पास हो गया। लेकिन उसके एक साल बाद भी इसे लागू नहीं किया जा सका है। माना जा रहा है कि सरकार को मजदूरों की नाराजगी की चिंता है और इसलिए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले इसे नहीं लागू किया जाएगा। उसके बाद भी इसका लागू होना कई दूसरी चीजों पर निर्भर करेगा।

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सरकार किस तरह से लोक लुभावन राजनीति की चिंता में है कि अभी तक जनगणना का काम शुरू नहीं हुआ। हर 10 साल पर होने वाली जनगणना इस साल 2021 में पूरी होनी थी लेकिन संभवतः 1881 के बाद  पहली बार ऐसा हो रहा है कि सरकार जनगणना नहीं करा पा रही है। पिछले साल कोरोना वायरस की महामारी के कारण जनगणना का काम शुरू नहीं हो सका था। लेकिन अब सब कुछ लगभग सामान्य हो गया है फिर भी सरकार जनगणना नहीं करा रही है क्योंकि कई क्षेत्रीय पार्टियां जातियों की गिनती कराने की मांग कर रही हैं। बिहार में भाजपा की सहयोगी जनता दल यू ने भी जाति जनगणना कराने की मांग की है। राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा सहित अनेक पार्टियां इसके पक्ष में हैं। लेकिन केंद्र सरकार इसका विरोध कर रही है क्योंकि इससे हिंदुत्व की राजनीति का तिलिस्म टूट सकता है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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