Loksabha election 2024 चुनाव से पहले मोर्चा बनेगा क्या?
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चुनाव से पहले मोर्चा बनेगा क्या?

Loksabha election 2024

भारत में दोनों तरह के प्रयोग हुए हैं। चुनाव संपन्न होने के बाद सरकार बनाने के लिए भी पार्टियों का गठबंधन हुआ और चुनाव होने से पहले भी मोर्चा बना कर लड़ा गया है। 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए का गठन हुआ था। एनडीए का गठन भी अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए किया गया था। लेकिन नब्बे के दशक से पहले जब गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू हुआ तो उस समय चुनाव पूर्व गठबंधन हुआ था। इस तरह का पहला प्रयोग 1977 में हुआ, जब अनेक विपक्षी पार्टियों का विलय हो गया था और जनता पार्टी का गठन हुआ। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि सबने अपनी अपनी नौकाएं जला दी थीं और जनता पार्टी के जहाज पर सवार हो गए थे। बाद में वीपी सिंह के समय 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा बना था और 1996 में संयुक्त मोर्चा का गठन किया गया। Loksabha election 2024

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सवाल है कि ममता बनर्जी अगर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के बारे में कह रही हैं कि उसका अस्तित्व नहीं है तो क्या वे कोई नया मोर्चा बनाएंगी? क्या वे चुनाव से पहले कोई मोर्चा बना कर भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को चुनौती देंगी या सभी पार्टियां अपना-अपना चुनाव लड़ेंगी और चुनाव के बाद की स्थितियों के आधार पर मोर्चा बनेगा? अगर चुनाव बाद मोर्चा बनाना होता तो ममता बनर्जी इतनी मेहनत नहीं करतीं या इस तरह से कांग्रेस पर हमला नहीं करतीं। उनका प्रयास कांग्रेस की जगह खुद अपनी पार्टी को विपक्षी मोर्चे का केंद्र बनाने का है। इसमें कई और क्षेत्रीय पार्टियों के नेता उनकी मदद कर सकते हैं। कांग्रेस के साथ यूपीए में शामिल रहीं कुछ पार्टियां भी उनकी मदद कर सकती हैं। मुश्किल उन पार्टियों को होगी, जिनकी राज्य सरकारें कांग्रेस के समर्थन पर टिकी हैं। वे कांग्रेस को नाराज नहीं कर सकती हैं। शरद पवार अभी चाहे कुछ भी कहें लेकिन उनके लिए आसान नहीं होगा कि महाराष्ट्र में कांग्रेस का साथ छोड़ दें। महाराष्ट्र में ममता बनर्जी की पार्टी उनके किसी काम नहीं आएगी जबकि कांग्रेस का साथ जरूरी है।

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यह भी बड़ा सवाल है कि वामपंथी पार्टियों का क्या होगा? अब तक वामपंथी पार्टियां सत्तारूढ़ दल के खिलाफ मोर्चा बनाने के केंद्र में रही हैं। चाहे कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा बनाना हो या भाजपा के खिलाफ, लेफ्ट की बड़ी भूमिका रही है। अभी पश्चिम बंगाल में लगभग खत्म होने के बाद भी देश के कई राज्यों में उसका आधार है। केरल में लगातार दूसरी बार उसने सरकार बनाई है और बिहार के पिछले चुनाव में विपक्षी गठबंधन के अच्छे प्रदर्शन का एक बड़ा कारण यह रहा कि राजद और कांग्रेस ने लेफ्ट से तालमेल करके चुनाव लड़ा। तमिलनाडु में भी लेफ्ट पार्टियां स्टालिन के गठबंधन में शामिल हैं। तभी सवाल है कि क्या ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ साथ लेफ्ट पार्टियों की वजह से डीएमके, राजद आदि से मोर्चे में शामिल होने की बात क्या कर सकेगी? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर ये पार्टियां मोर्चा से अलग रहती हैं तो क्या कांग्रेस, लेफ्ट, राजद, डीएमके, जेएमएम आदि पार्टियों का अलग मोर्चा नहीं बनेगा? और अगर ऐसा हुआ तो क्या इसका फायदा भाजपा को नहीं होगा? सो किसी भी एंगल से सोचे ममता और प्रशांत किशोर का ऐकला उछलना ले दे कर 2024 में वापिस नरेंद्र मोदी को जीतवाना है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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