लंदन में अकेला ‘दुश्मन’

लंदन में आजकल ‘ब्रेक्सिट’ यानि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से ‘एक्सिट’ (निकलने) की धूम मची हुई है। नेता लोग एक-दूसरे पर प्रहार कर रहे हैं। बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। जब 11 अक्तूबर को हम ब्रिटिश संसद भवन में आयोजित कार्यक्रम में गए थे तो सड़कें बंद थीं। लंबा चक्कर लगाना पड़ा था।

अब भी हम लंदन के पिकेडिली सर्कस, बकिंघम पेलेस, हाइड पार्क और आक्सफोर्ड पर घूमे। 50 साल पहले भी जब मैं लंदन में रहता था, तब भी मैं इन सब स्थानों पर जाता रहता था लेकिन इस बार मुझे इन स्थानों पर अंग्रेजों की बजाय यूरोपीय एशियाई और अफ्रीकी लोग ज्यादा दिखे। भीड़-भाड़ भी ज्यादा रही।

ज्यादातर विदेशियों को मैंने हाड़-तोड़ शारीरिक काम करते देखा। इस बार की यात्रा में अपने भारतीय मित्रों के अलावा नेपाली, भूटानी, श्रीलंकाई और पाकिस्तानी मित्रों के साथ जमकर भेंट हुई। पाकिस्तानी साथियों को मुझे बार-बार कश्मीर के बारे में संतुष्ट करना पड़ रहा था। जब मैं उन्हें बताता था कि कश्मीर के पूर्ण विलय से कश्मीरियों को क्या-क्या फायदे हैं और मेरे परम मित्र सत्यपाल मलिक (कश्मीर के राज्यपाल) कश्मीरी जनता की कितनी सक्रिय मदद कर रहे हैं तो वे शांत हो जाते थे। मुझे कुछ मित्र आग्रहपूर्वक एक पाकिस्तानी कवि सम्मेलन में ले गए। वहां पाकिस्तान के प्रसिद्ध शायर अमजद इस्लाम अमजद और अनवर मसूद का कलाम और सुल्ताना अंसारी का गायन सुना।

प्रो. मसूद ने हंसा-हंसाकर श्रोताओं के पेट में बल डाल दिए। वहां पाकिस्तानी राजदूत और लंदन-निवासी बड़े-बड़े वकीलों, डाक्टरों, व्यापारियों और प्रोफेसरों से भी भेंट हुई। लगभग सभी कश्मीर के बारे में मुझसे पूछते रहे। मैंने कहा कि मैं दक्षिण एशियाई राष्ट्रों का महासंघ खड़ा करना चाहता हूं तो कई लोगों ने सहर्ष हिस्सेदारी का वायदा किया। कुछ प्रबुद्ध लोगों ने मेरा नाम सुना तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि उस मुशायरे में कैसे आ गया ?

पूरे सभागृह में यह अकेला दुश्मन कैसे आ गया ? लेकिन ‘दुश्मन’ ने पाया कि उसके साथ लोगों का बर्ताव अत्यंत सभ्य और विनम्र रहा। कहे कहे लगते रहे। कई लोगों ने पूछा कि क्या आप वही डा. वैदिक हैं, जो लाहौर के लोकप्रिय अखबार ‘दुनिया’ में रोज उर्दू में लिखते हैं ?

मेरे ‘हां’ कहने पर तारीफ का अंबार लग गया। लोग मेरी साफगोई का बखान करने लगे। मैंने उनसे कहा कि यह तो ‘दुनिया’ अखबार के संपादक कामरान खान और मलिक मियां आमेर महमूद की हिम्मत है कि वे एक हिंदुस्तानी बुद्धिजीवी के लेख बेझिझक छाप देते हैं।

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