सिर्फ चुनाव शिगूफा है

असम के मंत्री और भाजपा नेता हिमंता बिस्वसर्मा ने ये होड़ शुरू की। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा अगले साल दोबारा चुनाव जीत कर आई, तो वह ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाएगी। उनसे यह सवाल किसी ने नहीं पूछा कि अगर सचमुच लव जिहाद कुछ होता है और यह समाज के लिए खतरा है, तो फिर कानून बनाने के लिए भाजपा सरकार अगले चुनाव के बाद तक क्यों इंतजार कर रही है? जाहिर है, मंशा इस शिगूफे पर अगला चुनाव लड़ने की है। बिस्वसर्मा के बाद भाजपा की राज्य सरकारों में ऐसा इरादा जताने की झड़ी लग गई। जिन मुख्यमंत्रियों ने यह एलान किया उनमें उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ भी हैं। लेकिन ये खबर इन सबके इरादे पर पानी फेर देती, अगर बात तथ्यों और तर्क की रोशनी में होती। खबर यह है कि उत्तर प्रदेश में कथित लव जिहाद के मामलों की जांच करने के लिए बनाए गए विशेष जांच दल (एसआई) ने 14 मामलों की जांच के बाद उनके पीछे कोई साजिश होने की संभावना का खंडन कर दिया है। एसआईटी ने कहा कि उसे इस बात के कोई सबूत नहीं मिले, जिन मुस्लिम लड़कों ने हिंदू लड़कियों से शादी की उन्हें कहीं विदेश से धन दिया जा रहा था। तो सारी बात यहीं खत्म हो जाती। लेकिन ऐसा नहीं होगा, क्योंकि तब वो चुनावी शिगूफा खत्म हो जाएगा, जिसे अयोध्या में मंदिर, धारा 370 और त्रिपल तलाक कानून के बाद गढ़ा गया है। इस संदर्भ में इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक फैसला भी पर्याप्त रोशनी डालता है।

अदालत ने एक अंतर-धार्मिक विवाह के बाद दुल्हन के परिवार द्वारा दूल्हे के खिलाफ दायर किए गए मामले पर सुनवाई की। सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार ने पिछले साल अगस्त में शादी की थी। तब प्रियंका के परिवार वालों ने सलामत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी थी, जिसमें उस पर अपहरण और जबरन विवाह करने जैसे आरोप लगाए थे। लेकिन पूरे मामले को सुनने के बाद अदालत ने सारे आरोप हटा दिए और एफआईआर को रद्द कर दिया। अपने फैसले में अदालत ने कहा कि अपने पसंद के साथी के साथ जीवन बिताने का अधिकार जीवन के अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार में ही निहित है। अदालत ने कहा कि अगर दो बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं तो इसमें किसी दूसरे व्यक्ति, परिवार और यहां तक कि सरकार को भी आपत्ति करने का अधिकार नहीं है।

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