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फ्रांस में फिर मैक्रों

पांच साल बाद फिर उन दोनों के बीच ही फिर से मुकाबला होना फ्रेंच लोकतंत्र के लगातार बीमार होते जाने का संकेत है। इस बार संकेत यह मिला है कि ये बीमारी और गहरा गई है। 2017 में दूसरे दौर में मैक्रों 66-34 प्रतिशत मतों के अंतर से जीते थे। इस बार ये अंतर 58.5-41.5 प्रतिशत पर आ गया।

इमैनुएल मैक्रों फिर से फ्रांस के राष्ट्रपति चुन लिए जाएंगे, इस बाते में पहले से भी कोई शक नही था। खास कर जब पहले दौर के मतदान में वे सबसे आगे रहे और यह तय हो गया कि दूसरे दौर में उनका मुकाबला धुर दक्षिणपंथी मेरी ली पेन से होगा, तब उनकी जीत और पक्की मान ली गई। लेकिन पांच साल बाद एक बार फिर उन दोनों के बीच ही फिर से मुकाबला होना फ्रेंच लोकतंत्र के लगातार बीमार होते जाने का संकेत है। इस बार संकेत यह मिला है कि ये बीमारी और गहरा गई है। 2017 में दूसरे दौर में मैक्रों ने 66-34 प्रतिशत मतों के अंतर से ली पेन को हराया था। इस बार ये अंतर 58.5- 41.5 प्रतिशत पर आ गया। जाहिर है, पिछले पांच साल में फ्रांस का जनमत दक्षिण से धुर दक्षिणपंथ की तरफ और ज्यादा खिसका है। दरअसल, अगर आर्थिक मामलों को देखें, तो ली पेन का एजेंडा इस बार मैक्रों से अधिक वामपंथी नजर आता था। लेकिन नस्लभेद, उग्र राष्ट्रवाद और आव्रजन विरोध के मुद्दों पर मैक्रों अपेक्षाकृत उदारवादी नजर आते थे। इस बीच परंपरागत दक्षिणपंथ और वामपंथ की प्रतिनिधि पार्टियां मुकाबले से बाहर हो गई हैँ।

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इस बार पहले दौर में धुर वामपंथी माने जाने वाले ज्यां लुक मेलेन्शॉं ने जरूरत आश्चर्यजनक सफलता पाई। उन्होंने 22 प्रतिशत से ऊपर वोट हासिल किए। ली पेन से वे सिर्फ एक प्रतिशत वोट से पीछे रहे। अगर फ्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी ने पिछली बार की तरह इस बार उनका समर्थन किया होता, तो वे निश्चित रूप से दूसरे दौर में पहुंच गए होते। बहरहाल, उन्हें मिला समर्थन भी फ्रांस में लगातार तीखे हो रहे वैचारिक ध्रुवीकरण को जाहिर करता है। धुर दक्षिणपंथ और धुर वामपंथ दोनों मजबूत हुए हैँ। इनके बीच मैक्रों मध्यमार्गी नजर आते हैं, लेकिन पांच साल में उन्होंने अपना समर्थन आधार गंवाया है। इसीलिए जून में होने वाले संसदीय चुनाव में उनकी पार्टी इस बार बहुमत हासिल कर पाएगी या नहीं, इसको लेकर संदेह का आलम बन गया है। फ्रांस के संविधान के मुताबिक संसदीय बहुमत के आधार पर बनने वाली सरकार के पास भी काफी अधिकार होते हैँ। इस तरह अगर मैक्रों की पार्टी वहां हारी, तो उनका इस बार का कार्यकाल कांटों के रास्ते पर चलने जैसा हो सकता है। इसके अलावा यह भरोसा भी कमजोर पड़ा है कि मैक्रों का मार्ग लंबे समय तक फ्रांस को धुर दक्षिणपंथ से बचा पाएगा।

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