कमलनाथ, शिवराज और कार्तिक का कृष्ण पक्ष

सेंधमारी के ज़रिए मध्यप्रदेश में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार को ख़ुद के बूते बने रहने के लिए 28 विधानसभा क्षेत्रों में हो रहे उपचुनावों में से 9 जीतने होंगे। और जो हो, इतना तय है कि इतनी सीटें वह नहीं जीत रही है। मेरे हिसाब से वह ज़्यादा-से-ज़्यादा चार जगह जीतेगी। यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी के फ़िलहाल हत्थे पर बैठे शिवराज सिंह चौहान को आसंदी की नाभि में धंसने के लिए पांच और विधायको को टांगा-टोली कर के अपने बैठकखाने में लाना होगा।

वहीं, अपनी भुजाओं के भरोसे सत्ता में लौटने के लिए कमलनाथ को 28 में से 27 सीटें जीतनी हैं। सो, कहां शिवराज की 9 की दरकार और कहां कमलनाथ की 27 की दरकार? पर, माहौल तो ऐसा है कि अगर कोई तकनीकी जुगाड़ आड़े न आए तो कांग्रेस 28 की 28 सीटें भी जीत जाए तो मुझे तो हैरत नहीं होगी। जिन 24 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं ने भाजपा को हर हाल में तारे दिखाने की ठान ली है, उनमें कांग्रेसी उम्मीदवारों की जीत के बाद कमलनाथ को सिर्फ़ तीन विधायकों की ज़रूरत होगी। यह अलग बात है कि छह महीने पहले वे अपनों पर ही अतिविश्वास के चलते गच्चा खा गए और अपने 22 विधायक गंवा बैठे, मगर जो कमलनाथ को ठीक से जानते हैं, वे मानते हैं कि छिंदवाड़ा से ले कर दिल्ली और डावोस तक की धड़कनें अपनी उंगलियों के पोरों की छुअन से तेज़-मद्धम करने वाले कमलनाथ इतने चमत्कारी तो हैं ही कि उन्हें चार-छह विधायकों के लिए तरसने को कभी मोहताज़ नहीं होना होगा।

सो, जब यह मौक़ा आएगा कि सरकार बचाने के लिए शिवराज को पांच और सरकार बनाने के लिए कमलनाथ को तीन विधायकों का सहारा लगेगा तो होगा क्या? मध्यप्रदेश की विधानसभा में इस वक़्त कांग्रेस और भाजपा के अलावा बहुजन समाज पार्टी के दो, समाजवादी पार्टी का एक और चार निर्दलीय विधायक भी हैं। झूलेलाली मौसम में इन सात विधायकों में से तीन या पांच की करवट राजनीतिक ऊंट का क़द तय कर देगी। इन विधायकों का फ़ैसला कुछ तो तात्कालिक कारणों पर निर्भर करेगा और कुछ दीर्घकालीन वज़हों पर।

मध्यप्रदेश में विधानसभा के चुनाव 2023 में होने हैं। प्रदेश में आज का माहौल भाजपा को पदा-पदा कर दौड़ाने का है। उपचुनाव की कबड्डी में किसी तरह सरहद छू कर भाजपा की सरकार बच भी गई तो अगले ढाई-पौने तीन साल वह ऐसी डगमग-डगमग चलेगी कि 2023 के चुनाव में भाजपा 60 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाएगी। इसलिए, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का ढहता तिलिस्म तब तक भाजपा को तक़रीबन पूरी तरह ले डूबेगा। मध्यप्रदेश में चुनाव के चंद महीने पहले शिवराज का चेहरा बदलने से भी भाजपा को प्राणवायु मिलने के आसार तब नहीं बनेंगे। और, कहीं केसरिया चोले के मस्तानों की टोली की विपरीत बुद्धि ने अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया को अगले चुनाव में भावी मुख्यमंत्री का चेहरा बनवा दिया तो 2023 में भाजपा 23 पर भी सिमट सकती है।

अभी हो रहे उपचुनावों के बाद कमलनाथ की वापसी किसी तरह फिसल भी गई तो भी कांग्रेस बराबरी की ऐसी पंजा-लड़ाऊ मुद्रा में आ जाएगी कि 2023 में उसकी घनघोर सेहराबंदी की इबारत सियासी आसमान पर नवंबर के दूसरे मंगलवार को ही चस्पा दिखेगी। साढ़े तीन दशक से कमलनाथ को देखते-देखते इतना तो मैं आप से कह ही सकता हूं कि अगर वे एक बार शतक बनाने के पीछे पड़ जाते हैं तो हर गेंद पर चौका-छक्का मारते भले न दिखें, पिच पर अनंत काल तक जमे रह कर शतक पूरा करना जानते हैं। अब वे मध्यप्रदेश में भाजपा के पीछे पड़ गए हैं, सो, अपनी विदाई का जवाब उसकी विदाई से दिए बिना मानेंगे नहीं।

तो, ये दो दृश्य हैं, जो गंगा-जमुनी विधायकों के निर्णय को प्रभावित करेंगे। जिन्हें कलियुगी नृत्यशाला का, गिरते-पड़ते ही सही, फटाफट आनंद लेना है, वे मौक़ा आने पर भाजपा की सरकार को बनाए रखने में मदद करने की तरफ़ प्रवृत्त होंगे। जिन्हें राजनीति में अपना दीर्घकालीन और संजीदा भविष्य सुनिश्चित करने का हवन करना है, वे शिवराज को बाहर तक छोड़ने जाएंगे और नई यजमानी के लिए कमलनाथ की फिर अगवानी करेंगे। उन्हें इतनी तो समझ है ही कि उपचुनाव के नतीजों के बाद शिवराज एक भी दिन स्थिर सरकार देने की स्थिति में नहीं होंगे और कमलनाथ हर दिन उनकी कुर्सी के पाए हिलाते रहने का लूडो क्यों नहीं खेलेंगे? जब कांग्रेस के बरसों पुराने और पारिवारिक परंपराओं से सराबोर विधायकों का टुल्लर भी मौक़ापरस्ती की हवस में 22 के आंकड़े पर पहुंच सकता है तो भाजपा के विधायक ही कौन से ऐसे सते-सावत्रे हैं कि कमलनाथ की ठुमरी पर फ़िदा हो कर आधा दर्जन का अंक छूने से भी मुंह फेर लेंगे? सो, बच भी गई तो पौने तीन साल में शिवराज की चरमराती चारपाई से उनके कितने हमजोली नीचे टपक पड़ेंगे, कौन जाने!

उपचुनावों की उत्तरगाथा के कैनवस पर चार आकृतियां अभी से तय हैं। एक, भाजपा की सरकार अगर बची तो कांग्रेस और उसके बीच का अंकगणित बेहद संकरा होगा। दो, कांग्रेस की सरकार अगर लौटी तो अंकगणित का दायरा कैसा भी हो, मनोबल के बीजगणित का फ़ासला ख़ासा चौड़ा होगा। तीन, कांग्रेस की दूसरी क़तार भाजपा की दूसरी क़तार से बहुत ज़्यादा वज़नदार बन कर उभर चुकी है। चार, शिवराज बचें या जाएं और कमलनाथ आएं या प्रतीक्षालय में रहें, सकल-समीकरण 2023 का मध्यप्रदेश कांग्रेस को ही सौंपेगा। इसलिए विवेकवान सियासतदां इस साल कार्तिक के महीने में कृष्ण पक्ष की दशमी और एकादशी के दरमियान भाजपा को अंगूठा दिखाते ही दिखाई देंगे।

अपने दरबानों का चंगुल चीर कर जिस तरह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने बृहस्पतिवार को हाथरस-कूच किया, उसने कांग्रेस के विजय-गान को सियासी गीतमाला की पहली पायदान से एकदम पांचवी पायदान पर कुदा दिया है। अगर भ्रमित करने वाली बलाओं को राहुल-प्रियंका इसी तरह दोनों हाथों से आगे भी परे करते चले तो लोकसभा के चुनावों से पहले होने वाले डेढ़ दर्जन प्रादेशिक चुनावों में कांग्रेस की कुंडली का गोचर इतना मजबूत हो जाएगा कि आप दांतों तले अपनी उंगलियां दबा लेंगे। चौपट हो चुकी अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारों की बिलबिलाती क़तारों, दिन दूनी रात सौ गुनी रफ़्तार से फूल रहे धन्ना सेठों, कौड़ियों के भाव निजी क्षेत्र की झोली में जा रहे सरकारी नवरत्नों और महामारी में हो रही मेडिकल-माफ़िया की डकैती ने पूरे मुल्क़ को ऐसा झिंझोड़ दिया है कि मर्यादा-पुरुषोत्तम भी अमर्यादा के प्रतीक-पुरुष को 2024 में अपना आशीर्वाद देने से पहले सरयू में समाधि लेना बेहतर समझेंगे।

मैं जानता हूं कि आप में से बहुत-से लोग अभी मेरी इस अवधारणा को अपने विचारों के कूड़ेदान में डालना चाहेंगे। मैं यह भी जानता हूं कि आप मेरी इन बातों के लिए मुझे इस-उस का एजेंट वग़ैरह कहेंगे। मगर मैं प्रभु से विनती करूंगा कि वह आपको माफ़ करे, क्योंकि आप नहीं जानते कि आप क्या कर रहे हैं। आप यह कर रहे हैं कि साढ़े छह-सात साल पहले शुरू हुई अपनी थोथी झौंक से बाहर आने को इसलिए तैयार नहीं हैं कि लोग आपको नकटा न कहने लगें। इसलिए आप ईश्वर के प्रत्यक्ष-दर्शन का दावा करते रहने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। अपनी नाक की ख़ातिर आप देश की नाक कटवाते रहे हैं, कटवा रहे हैं। समय की दुंदुभी की आवाज़ अनसुनी करने के इस ढोंग का समय अब समाप्त हो रहा है। आप मानें तो ठीक, न मानें तो ठीक। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।)

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