झीने कैनवस पर बिखरे हिम्मत के रंग

आप मानें तो ठीक, न मानें तो ठीक, मगर मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि हर तरह के बाहरी-भीतरी झंझावातों के बावजूद, पिछले एक साल में मध्यप्रदेश ने ख़ुद को जिस दिशा में जाने के लिए तैयार कर लिया है, वह 2021 ख़त्म होते-होते उसे भारतीय राज्यों का सिरमौर बना सकता है। पिछले एक-डेढ़ दशक से रेत-माफ़िया, भू-माफ़िया, अवैध-निर्माण माफ़िया, शिक्षा-माफ़िया और पता नहीं कौन-कौन से माफ़ियाओं के लिए मशहूर मध्यप्रदेश में माफ़िया-बुर्ज़ तेज़ी से ढह रहे हैं।

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपना-पराया देखे बिना हर रंग-तरंग के माफ़िया की मुश्क़ें कस डाली हैं। चार दशक से राजनीतिक संसार के ऊपरी बरामदों में लगे नियोन-साइन से ले कर उसकी भीतरी खोहों में जमी कालिख़ तक का जायज़ा लेने का मौक़ा मिलने के बाद इतना तो मैं कह ही सकता हूं कि ऐसे झीने बहुमत का मुकुट पहने बैठा कोई और मुख्यमंत्री कभी ऐसे बहुआयामी युद्ध का जोख़िम अपने सिर नहीं लेता। मगर कमलनाथ यह हिम्मत इसलिए कर पाए कि अपने सियासी दौर के अयोध्या-कांड में वे ‘जा को कछु ना चाहिए, सो ही शाहंशाह’ स्थिति को प्राप्त हो गए हैं।

उन पर मध्यप्रदेश की एक नई पहचान बनाने की धुन सवार हो गई है। वे इस बात से बेपरवाह हैं कि उनकी धुन से उनके अपने भी तालमेल बिठाने को तैयार हैं या नहीं। यह तो उनके धुर-विरोधी भी मानते हैं कि कमलनाथ के पास विकास की जैसी वैश्विक दृष्टि है, वैसी आज के कम राजनीतिकों के पास है। घनघोर पिछड़े छिंदवाड़ा को चालीस साल में कहां-से-कहां पहुंचा देने की मशक़्कत ने उन्हें गांव-देहातों की समझ से भी सराबोर कर दिया है। सो, वे भारतीय समाज में बापू के आर्थिक दर्शन की अहमियत भी खूब जानते हैं और सिंगापुर को सिंगापुर बनाने वाले ली कुआन यी की विकास-तकनीकों से भी पूरी तरह वाकिफ़ हैं।

कमलनाथ में दून-स्कूल और कोलकाता के सेंट ज़ेवियर कॉलेज की कुलीनता भी है और संजय गांधी के साथ बिताए दिनों से मिली सियासी-आक्रामकता भी। वे डावोस के विश्व आर्थिक मंच के सूट-बूट संस्कारों में भी पगे हुए हैं और भारतीय राजनीति की लुंगाड़-मंडली से भी दो-चार होते रहे हैं। जीवन के इस मारक-मिश्रण ने कमलनाथ को कमलनाथ बनाया है। इसलिए दिल्ली से जा कर भोपाल के ताल में कूदने के बाद वे लहरों पर राज कर रहे हैं। मगर उनकी व्यक्तिगत क्षमताओं की इस फ़ेहरिस्त के बावजूद मुझे लगता है कि बतौर एक मुख्यमंत्री उनके पास जिस भाव-भंगिमा के प्रशासनिक सहयोगी होने चाहिए, नहीं हैं। प्रशासनिक-माफ़िया की ये मीनारें गिरनी अभी बाक़ी हैं। मुझे लगता है कि अनमने और अपने-अपने मतलब में लीन प्रशासनिक चेहरों से निज़ात पाए बिना कमलनाथ के लिए अपने मन का मध्यप्रदेश रचना आसान नहीं होगा।

मैं अर्जुन सिंह के वक़्त से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों की कार्य-शैली देख-समझ रहा हूं। कमलनाथ उनके बाद पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें पत्रकारिता-जगत में एक-एक के साथ निजी तौर पर मिलनसारिता के अभाव के बावजूद, मीडिया ख़ुद-ब-ख़ुद पसंद कर रहा है। वह भी तब, जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार के पंद्रह साल में मीडिया के संस्कार को बदलने की कोशिशों में कोई कमी नहीं रही थी। कमलनाथ के प्रति मीडिया का बुनियादी सकारात्मक भाव न तो इसलिए है कि वे शिवराज सिंह चौहान की तरह सब के कंधे पर हाथ रखे घूमते हैं और न ही यह एक साल से मीडिया के संपर्क में रहने की ज़िम्मेदारी संभाल रहे प्रशासनिक-राजनीतिक समूह का कमाल है। यह कमाल तो स्वयं पत्रकारों के अर्थवान-भाव का है, जिन्हें डेढ़ दशक बाद अपने राज्य के बारे में यह उम्मीद जागी है कि अब उनका प्रदेश भी पूरे देश का विकास-मॉडल बन सकता है। सो, गिलहरी-भाव से वे इस राम-सेतु के निर्माण में अपने हिस्से की बालू लगा रहे हैं।

कौन नहीं जानता है कि किसी भी मुख्यमंत्री की व्यस्तताएं क्या होती हैं? फिर ऐसे मुख्यमंत्री की मसरूफ़ियत तो और भी दूसरे स्तर की होती है, जिसे अपने राज्य की पहचान में बुनियादी बदलाव लाने हों। लेकिन अगर अलग-अलग ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए आसपास बिठाए गए बाक़ी सारे प्रशासनिक-राजनीतिक सहयोगी भी मुख्यमंत्री-मुद्रा ओढ़ लें तो कैसे काम चले? चंद भले-मानस हैं, जो कमलनाथ के बनाए नक्शे को आकार देने के लिए पूरी निष्ठा के साथ ज़मीनी काम कर रहे हैं। मगर उनकी तादाद कम है। ज़्यादातर के सिर पर या तो यह भूत चढ़ा हुआ है कि वे ख़ुद मुख्यमंत्री हैं और वे चाय से भी ज़्यादा ग़र्म केतली की तरह डोल रहे हैं या पंद्रह साल से चढ़ा पुराना भूत उनके सिर से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है और वे अपनी बग़ल में छुरियां लिए नए ज़माने के साथ चलने का दिखावा कर रहे हैं।

किसी भी व्यवस्था में भारी काम जब हलके लोग हथिया लेते हैं तो, आज नहीं तो कल, बखेड़ा खड़ा होता ही है। व्यवस्था निजी हो, राजनीतिक या प्रशासनिक; ज़िम्मेदारियां और व्यक्तित्व एक-दूसरे के अनुरूप होने चाहिए। सरोद-वादन माइकल जैक्सनी लटकों-झटकों के साथ नहीं हो सकता। कोई करेगा तो कोई सुनेगा नहीं। लेडी गागा अपनी प्रस्तुति शुभा मुद्गल मुद्रा में देंगी तो कौन देखेगा? अगर किसी से सितार बजवाना है तो क्या उसे डिस्को में बैठा सकते हैं? जिससे गिटार बजवाना है, क्या उसे स्मृति-सभा में खड़ा कर सकते हैं? प्रबंधन का मूल-मंत्र सही व्यक्ति को सही ज़िम्मेदारी देने में और उसके लिए मौजूं कार्य-स्थल का चयन करने में ही छिपा है।

कमलनाथ चूंकि इन मंत्रों के अध्येता हैं, इसलिए मुझे उम्मीद है कि दो साल बीतते-बीतते उनका मध्यप्रदेश आपको पहचान में भी नहीं आएगा। अभी इस बात पर यक़ीन करना शायद आसान नहीं है, लेकिन वहां की नई सरकार का एक साल पूरा होने के बाद किया मेरा आकलन जिन आगामी संभावनाओं की तरफ़ इशारा कर रहा है, वे सचमुच बेहद उजली हैं। अगर कुछ गड्ढे और खंदकें कमलनाथ पाट पाए तो वे आपको अपनी राह पर सरपट दौड़ते दिखेंगे। गच्चा खाने वालों में वे हैं नहीं। गच्चा देने वालों में भी वे नहीं हैं। इसलिए मुझे तो भविष्य के मध्यप्रदेश से बड़ी उम्मीदें हैं।

लोकसभा के अगले चुनावों से ऐन पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की विधानसभाओं के चुनाव होंगे। अगले चार साल इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें चलेंगी तो खूब, मगर वे ऐसे चलें कि लौट आएं तो बात है। लौटेंगी तो अगली केंद्र सरकार की शक़्ल अलग होगी। नहीं लौटेंगी तो पता नहीं क्या सूरत बनेगी? इसलिए कमलनाथ, अशोक गहलोत और भूपेश बघेल के असली इम्तहान तो अभी बाक़ी हैं। इसलिए काम पर ध्यान के साथ यह भी ज़रूरी होगा कि लोग जानें कि काम हुए हैं। केंद्र में कांग्रेस की सरकार दस साल में किए अपने काम लोगों को बता नहीं पाई तो जाती रही। दिल्ली में पांच साल में किए कामों को बताने की सिफ़त रखने की वज़ह से ही अरविंद केजरीवाल की सरकार फिर आने को है। नरेंद्र भाई मोदी की तरह करें रत्ती और दिखाएं पसेरी तो भी अंततः नुक़सान होता है। और, करें पसेरी और बता न पाएं रत्ती भर भी तो भी नुक़सान होता है। योजनाओं पर अमल की रफ़्तार और उनके प्रचार के सुर का संतुलन तय करेगा कि कौन, कहां, कितना क़ामयाब रहा। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

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