Mahadevi verma death anniversary क्या स्त्रियों ने परंपरा का निर्माण नहीं किया?
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क्या स्त्रियों ने परंपरा का निर्माण नहीं किया?

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आज महादेवी देवी जी का पुण्यतिथि है। इस मौके पर इस विमर्श की कम से कम शुरुआत  होनी चाहिए कि जैसे प्रेमचंद ने परंपरा बनाई थी, वैसे इन लेखिकाओं ने भी अपनी एक परंपरा बनाई थी। ….महादेवी वर्मा इस रूप में अपवाद हैं कि छायावाद के दौर में उनकी चर्चा हुई और उन पर सुमित्रानंदन पंत ने एक अभिनंदन ग्रंथ निकाला। उस जमाने मे उस ग्रंथ के लिए पीवी नरसिंह राव ने भी एक लेख महादेवी वर्मा पर लिखा था जो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने। यह इस बात का सूचक है कि महादेवी जी की कीर्ति हिंदी प्रदेश से बाहर भी फैली थी। (Mahadevi verma death anniversary)

– विमल कुमार

हम साहित्य की दुनिया में अक्सर तुलसीदास की परंपरा और कबीर की परंपरा की बात करते हैं तथा उन दोनों की एक बाइनरी भी बनाते हैं। आधुनिक काल मे प्रेमचंद की परंपरा का भी अक्सर जिक्र करते हैं लेकिन हमने विमर्शों की दुनिया में कभी इस पदावली में बात नहीं की कि मीरा की भी एक परंपरा थी या फिर पंडित रमाबाई या सावित्री बाई फुले की भी एक परंपरा थी और आधुनिक काल में महादेवी वर्मा या सुभद्रा कुमारी चौहान की भी कोई परंपरा थी। आखिर ऐसा क्यों क्या? क्या परंपरा के निर्माण में केवल पुरुषों ने ही योगदान दिया था? क्या यह सच नहीं है कि सभ्यता का निर्माण स्त्री और पुरुषों की भागीदारी से हुआ? तो फिर संस्कृतियों के निर्माण में उनकी बराबर हिस्सेदारी क्यों नहीं मानी जाती और अगर बराबर हिस्सेदारी की तो फिर साहित्य और संस्कृति के इतिहास पर बात करते हुए हम केवल पुरुष लेखकों की ही परंपरा की बात क्यों करते हैं?

आज महादेवी देवी जी का पुण्यतिथि है। इस मौके पर इस विमर्श की कम से कम शुरुआत  होनी चाहिए कि जैसे प्रेमचंद ने परंपरा बनाई थी, वैसे इन लेखिकाओं ने भी अपनी एक परंपरा बनाई थी। प्रेमचंद के हिंदी लेखन से पहले राजबाला घोष ने कहानी लिखना शुरू कर दिया था और उनकी कई कहानियां प्रेमचंद की हिंदी में प्रकाशित कहानियों से पहले की कहानियां हैं, लेकिन इतिहास मैं वह हाशिये पर रहीं। हिंदी की दुनिया में शायद ही कभी राजबाला घोष पर कोई गोष्ठी या सेमिनार या चर्चा हुई हो और उन्हें उनकी जन्मशती वर्ष में याद किया गया हो। महादेवी वर्मा इस रूप में अपवाद हैं कि छायावाद के दौर में उनकी चर्चा हुई और उन पर सुमित्रानंदन पंत ने एक अभिनंदन ग्रंथ निकाला। उस जमाने मे उस ग्रंथ के लिए पीवी नरसिंह राव ने भी एक लेख महादेवी वर्मा पर लिखा था जो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने। यह इस बात का सूचक है कि महादेवी जी की कीर्ति हिंदी प्रदेश से बाहर भी फैली थी।

उनका संबंध पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी था और वे आनंद भवन आया जाया करती थीं और इस दौरान उनके निजी रिश्ते कमला नेहरू से भी हुए। वे मैथिली शरण गुप्त से लेकर निराला और पंत को राखी भी बांधती थीं। निराला का उन पर इतना विश्वास था कि जब उन्हें कहीं कुछ पैसे मिलते थे तो वह उन्हें सुरक्षित रखने के लिए महादेवी जी के हाथों में ही रख देते थे और उनसे लेकर उसका इस्तेमाल करते थे ताकि उनकी फिजूलखर्ची न हो लेकिन निराला अपने स्वभाव से फक्कड़ थे और महादेवी जी से अपने पैसे बीच-बीच में लेकर गरीबों में बांट दिया करते थे। महादेवी ने विश्वास यूं ही नहीं अर्जित किया था। ऐसा विश्वास तो शायद प्रेमचंद को भी नसीब न हुआ हो लेकिन फिर भी अपने बहुआयामी व्यक्तित्व और लेखन के बावजूद महादेवी जी की परंपरा की कोई चर्चा नहीं होती।

महादेवी जी मीरा की परंपरा की लेखक थी और उन्हें आधुनिक युग की मीरा भी कहा गया, लेकिन वह सिर्फ इस अर्थ में मीरा नहीं थीं कि उन्होंने एकाकी जीवन बिताया और अपने पति को छोड़कर वह अकेली रहने लगीं, बल्कि वह भी भीतर से विद्रोहिणी थीं और पति के साथ उनका अलगाव इस विद्रोही चरित्र का ही नतीजा था। उनका यह विद्रोह केवल पति से या परिवार से नहीं, बल्कि पितृसत्ता से था, जिसके कारण वे एकाकी जीवन व्यतीत करती रहीं और अपनी प्रतिभा तथा मेहनत के बल पर महिला विद्यापीठ की कुलपति बनीं, बल्कि उन्होंने साहित्यकार संसद जैसी संस्था भी बनाई, जहां उस समय लेखकों के रहने ठहरने की व्यवस्था थी और निराला भी जीवन के अंतिम वर्षों में उस साहित्यकार संसद में रहे।

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यह अलग बात है कि आज हिंदी समाज साहित्यकार संसद को भूल चुका है और वह अब  जर्जर अवस्था में है लेकिन महादेवी ने यह प्रयोग अपने जीवन में किया था। यह एक अभिनव प्रयोग था साहित्य की दुनिया में। महादेवी ने उस जमाने में लखनऊ में महिला चित्रकारों की एक प्रदर्शनी भी आयोजित की थी, जिसे देखने के लिए जयशंकर प्रसाद आए थे। उस जमाने को देखते हुए यह बड़ा ऐतिहासिक कदम था। इतना ही नहीं उन्होंने एक अखिल भारतीय कवियत्री  सम्मेलन भी आयोजित किया था, जिसमें उस समय की तमाम चर्चित महिला कवियों को आमंत्रित किया गया था। महादेव जी में साहित्य संस्कृति में नेतृत्व करने की क्षमता थी और छायावाद के चार स्तंभ के नहीं रहने के बाद साहित्य समाज  की वह मार्गदर्शक रहीं। 1980 में विश्व हिंदी सम्मेलन का उन्होंने उद्घाटन किया।

उन्हें जो मान सम्मान मिला वह कई पुरुष लेखकों को भी नहीं नसीब हुआ। तो फिर हम लोग साहित्य की दुनिया में प्रेमचंद की परंपरा की चर्चा करते हुए महादेवी या सुभद्रा कुमारी चौहान की परंपरा की चर्चा क्यों नहीं करते? क्या इसलिए कि इस परंपरा के मार्ग पर चलने वाले अब बहुत कम लोग हैं या उस रास्ते पर चलना एक जोखिम भरा काम है और उसमें त्याग और तपस्या की बहुत अधिक जरूरत है। उस परंपरा का निर्वाह करना बहुत आसान नहीं है। उस परंपरा के निर्माण में आदमी को बहुत कुछ खोना पड़ता है लेकिन महादेवी और सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने को खोकर उस परंपरा का निर्माण किया था। हिंदी साहित्य में लेखिकाओं ने जरूर उस परंपरा को बचाए रखा और बिना शोर-शराबे के उसके रास्ते पर वह चलती रहीं। उन्होंने कभी शिकायत नहीं की कि उनकी चर्चा क्यों नहीं की गई।

यह जानकर आश्चर्य होता है कि हिंदी साहित्य समाज में कभी शिवरानी देवी या रामेश्वरी नेहरू या उमा नेहरू या चंद्र किरण सोनरेक्सा को याद नहीं किया गया। क्या साहित्य के निर्माण में उनका योगदान नहीं था या पुरुष लेखकों ने हमेशा उन्हें हाशिये पर रखा था और आज भी हम साहित्य में परंपरा के नाम पर केवल प्रेमचंद को याद करते हैं जबकि उसी प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी  देवी  थीं, जिन्होंने ‘प्रेमचंद घर में’ पुस्तक लिखकर प्रेमचंद के अंतर्विरोधों पर भी प्रकाश डाला था। यह एक पत्नी कि नहीं, बल्कि एक लेखिका के साहस और बेबाकी का प्रमाण था, जो सच लिखने के पीछे हटीं। उन्होंने अपने पति को भी कई स्थानों पर कटघरे में खड़ा किया। क्या पितृसत्ता को स्त्रियों के साहस से डर लगता है? क्या उसे लगता है कि लेखिकाएं  जब सामने खुलकर आएंगी तो वह सच कह देंगी, जिससे पितृसत्ता नंगी हो जाएगी। संभव है यह कारण रहा हो पितृसत्ता ने स्त्रियों को हमेशा हाशिये पर रखा लेकिन अब हिंदी की दुनिया में बहुत बड़ी संख्या में लेखिकाएं सामने आ गई हैं। 21वीं सदी में तो उनकी संख्या और भी बढ़ गई है। कविता कहानी उपन्यास से लेकर आलोचना शोध कार्यों में ऐसी तेजस्वी लेखिकाएं सामने आई हैं कि उन्हें दरकिनार करना आसान नहीं है। आज भले ही हिंदी आलोचक या मठाधीश उनपर पर्याप्त रोशनी ना डाल रहे हों लेकिन उनकी उपस्थिति को महसूस जरूर कर रहे हैं। महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि पर ‘परिंदे’ का 21वीं सदी की 25 कवियत्रियों के कविता अंक का लोकार्पण हो रहा है, जो इस बात का सबूत है कि महादेवी वर्मा ने जिस रास्ते का निर्माण किया था उस पर लेखिकाएं चल रही हैं और यही महादेवी की परंपरा है, जिसका निर्वाह वे कर रही हैं। महादेवी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने का इससे बढ़िया तरीका और क्या हो सकता है!

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