जब जवाबदेही हो ही नहीं

ऐसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। इसका मतलब यह है कि हर पिछली घटना से आगे के लिए कोई सबक नहीं लिया जाता। ऐसा शायद इसलिए होता है, क्योंकि हर जवाबदेह अधिकारी यही मान कर चलता है कि उसकी कोई जवाबदेही नहीं है- या अगर हो भी तब भी अपने यहां सिस्टम ऐसा है कि उसे तय करने की फिक्र किसी को नहीं होगी। तो इस माहौल में जान की कीमत कोई अधिकारी नहीं समझता। यही बात महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल में रविवार को आग लगने की घटना के बाद आई जानकारी से जाहिर होती है। उस हादसे में दस नवजात बच्चों की मौत हुई थी। अब पता चला है कि अस्पताल में अभी तक फायर ऑडिट नहीं करवाया गया था। भंडारा जिला अस्पताल में 1.52 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित होने वाला फायर सेफ्टी सिस्टम का प्रस्ताव बीते सात महीनों से राज्य सरकार के पास लंबित पड़ा है। 2015 में बने अस्पताल के सिक नियोनेटल केयर यूनिट (एसएनसीयू) में 2016-2017 में सिर्फ एक बार मॉक फायर ड्रिल हुई थी। उसके बाद किसी ने इसकी चिंता नहीं की।

महाराष्ट्र के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक एन. रामास्वामी ने दिसंबर 2020 में सभी जिलों के सरकारी अस्पतालों में ऑडिट करवाने का आदेश दिया था। उसके बावजूद भंडारा जिला अस्पताल में अभी तक फायर ऑडिट भी नहीं हुआ है। नेशनल एक्रेडिएशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (एनएबीएच) के अग्नि सुरक्षा मानकों के तहत दो से अधिक मंजिल वाले हर अस्पताल में अग्निशमन यंत्र, होज़ रील (पानी डालने के रबर के लंबे पाइप), वेट रीजर, ऑटोमैटिक एवं मैनुअल फायर अलार्म सिस्टम होना अनिवार्य है। लेकिन चार मंजिले भंडारा जिला अस्पताल में हर फ्लोर पर सिर्फ एक अग्निशमन यंत्र था। कोई अलार्म सिस्टम, स्प्रिंकलर या होज़ रील नहीं था। जबकि नियमों का क्या फायदा होता है, यह भी इसी हादसे में जाहिर हुआ। वहां एसएनसीयू यूनिट में नियमों के अनुरूप निकासी द्वार था। इस वजह से सात शिशुओं को बचाया जा सका। अब जब हादसा हो गया तो आरोप- प्रत्यारोपों का दौर आना ही है। मसलन, राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे का कहना है कि पूर्व भाजपा सरकार ने बिना फायर ऑडिट के एसएनसीयू का उद्घाटन कर दिया था। मगर ये सवाल वर्तमान सरकार से पूछा जाएगा कि ऐसा था तो सत्ता में आने के बाद उसने जरूरी कार्रवाई क्यों नहीं की?

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