nayaindia maharashtra political crisis shivsena शिव सेना के सब किए धरे पर पानी
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शिव सेना के सब किए धरे पर पानी

सचमुच देश और समाज ही उलटी दिशा में जा रहा है। इसलिए जो भी उसे सीधा करने की कोशिश करता है वह मारा जाता है। उद्धव ठाकरे इसकी मिसाल हैं। वे हिंदुत्व के सबसे बड़े आईकॉन रहे बाला साहेब ठाकरे के बेटे हैं और अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराने का खुल कर श्रेय लेने वाली पार्टी शिव सेना के प्रमुख हैं। उन्होंने अपने पिता और अपनी पार्टी की राजनीति के कुछ तत्वों को बदलने की कोशिश की। उन्होंने शिव सैनिकों की लड़ाकू और स्ट्रीट फाइटर होने की छवि को बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया। वे पुरानी गलतियों को तो ठीक नहीं कर सकते थे लेकिन उससे अलग हट कर समावेशी राजनीति के रास्ते पर चलने का प्रयास किया। शिव सेना कभी दक्षिण भारतीयों का विरोध करती थी तो कभी गुजरातियों की और कभी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का। वह धर्म और क्षेत्रीयता की राजनीति खुल कर करती थी। उद्धव ने इसे बदलने का प्रयास किया।

बदले में उनको क्या मिला? उनकी पार्टी टूटने की कगार पर है और हैरानी नहीं होगी अगर शिव सेना का नाम और चुनाव चिन्ह दोनों उनके हाथ से निकल जाएं। उनके शिव सैनिकों ने ही बगावत कर दी और ज्यादातर विधायक उनके विरोध में हो गए। पिछले ढाई साल से जो लोग उनकी सरकार में मंत्री रहे और सत्ता की मलाई खाते रहे वे भी अब हिंदुत्व को बचाने के नाम पर उनका विरोध कर रहे हैं। एनसीपी और कांग्रेस की साझा सरकार में शामिल रहे मंत्री या सत्ता का लाभ उठाते रहे विधायक उद्धव ठाकरे पर हिंदुत्व से धोखा करने के आरोप लगा रहे हैं। उन्हें शिव सेना और उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व से ज्यादा प्यार भाजपा के हिंदुत्व पर आ रहा है। क्या वे नहीं जानते हैं कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सत्ता में आने के लिए भाजपा कैसी कैसी हिंदू विरोधी पार्टियों से तालमेल कर चुकी है?

बहरहाल, इन दिनों बाल ठाकरे का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वे कह रहे हैं कि अगर कोई विधायक पार्टी छोड़ कर जाता है तो उसे मनाने की बजाय पकड़ कर उसकी कुटाई करो। सोचें, जब तक शिव सेना मारने-पीटने का काम करती थी, तब तक वह नहीं टूटी। जब तक वह धर्म व क्षेत्रीयता की राजनीति करती रही तब तक मजबूत बनी रही। लेकिन जैसे ही उसके नेता उद्धव ठाकरे ने विनम्रता की राजनीति शुरू की और शिव सेना की राजनीति को समावेशी बनाने का प्रयास किया वैसे ही उनकी पार्टी कमजोर हो गई और टूटने की कगार पर पहुंच गई। तभी क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि देश उलटी दिशा में जा रहा है और इसे सही दिशा में ले जाने का प्रयास करना घातक हो सकता है?

सोचें, शिव सेना ने हिंदुत्व के लिए कितना कुछ किया? बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब भाजपा के सारे नेताओं ने छह दिसंबर को इतिहास का काला दिन बता कर उस पूरे घटनाक्रम से पल्ला झाड़ना शुरू किया उस दिन बाल ठाकरे ने ऐलान किया था कि उनके शिव सैनिकों ने ढांचा गिराया है। कई दूसरे स्रोतों से भी यह प्रमाणित हुआ है। इसके लिए बाल ठाकरे को मुकदमा झेलना पड़ा। आज अगर अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है तो उसकी जमीन को समतल बनाने का काम बाल ठाकरे के शिव सैनिकों ने किया था। लेकिन आज देश का हिंदू ही बाल ठाकरे के बेटे और शिव सेना के नेता उद्धव ठाकरे को गद्दार घोषित कर रहा है क्योंकि उसकी आंखों पर दूसरे किस्म के हिंदुत्व का चश्मा चढ़ा हुआ है। उसकी नजर में शिव सेना का सब किया धरा पानी हो गया। वह मान रहा है कि शिव सेना या बाल ठाकरे ने हिंदुत्व के लिए कुछ नहीं किया। हिंदुत्व के लिए जो कुछ हुआ है वह अभी हुआ है।

महाराष्ट्र में शिव सेना को तोड़ने और सरकार गिरा कर नई सरकार बनाने के खेल में जो भी लोग शामिल हैं उनका अपना हित है। उन लोगों के हित से देश के किसी आम नागरिक का क्या लेना-देना हो सकता है, लेकिन आम नागरिक ने अपने को इस खेल से जोड़ा है और सार्वजनिक रूप से कहना शुरू किया है कि उद्धव के साथ अच्छा हुआ है। यह सही है कि उद्धव ठाकरे ने भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था और जनता ने दोनों को मिल कर बहुमत दिया था और एनसीपी-कांग्रेस को हराया था। लेकिन क्या शिव सेना पहली पार्टी है, जिसने चुनाव बाद गठबंधन करके सरकार बनाई? कितने ही राज्यों में भाजपा यह काम कर चुकी है। जम्मू कश्मीर में तो उसने पीडीपी से तालमेल कर लिया, जिसे वह देशद्रोही पार्टी बताती थी। जिस तरह से कश्मीर में भाजपा ने कथित तौर पर रणनीतिक तालमेल किया था क्या उसी तरह का तालमेल उद्धव का नहीं हो सकता है? लेकिन यह हिंदुत्व की नई धारा है, जिसमें बह रहा व्यक्ति भाजपा के हिंदुत्व से बाहर कुछ सोच ही नहीं सकता है। यह इस देश की राजनीति की बुनियादी बात हो गई है। लोगों ने अपना दिमाग लगाना बंद कर दिया है। भाजपा ने जो कह दिया या कर दिया वह सही है और हिंदुत्व की राह बनाने वाला है। क्या इस सोच से देश, समाज और हिंदुत्व का कुछ भला होगा?

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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