महाराष्ट्र में नौटंकी और तमाशा!

पिछले दिनों महाराष्ट्र में सत्ता कब्जियाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलो के बीच जो कुछ हुआ उसे देखकर उत्तर प्रदेश में होने वाली नौटंकी व महाराष्ट्र में होने वाले तमाशे की याद ताजा हो गई। एक समय था मनोरंजन के साधन बहुत सीमित थे। उन दिनों नौटंकी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार व राजस्थान का ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिणी एशिया में मनोरंजन का मुख्य साधन माना जाता था। यह बहुत लोकप्रिय जन नाट्य मनोरंजन का साधन हुआ करता था।

इसके जरिए न केवल गांवों में रहने वाले लोगों का मनोरंजन किया जाता था व उन्हें धार्मिक व राजनीतिक संदेश भी दिए जाते थे। कहते हैं कि संगीत के कारण ही इसको यह नाम मिला। एक संगीत का नाम संगीत रानी नौटंकी का था। वह इतना लोकप्रिय हुआ कि उस कलाकृति के कारण नौटंकी नामक जन्म हो गया। नौटंकी एक तरह का भारतीय आपेरा नृत्य नाटक है। जिसमें रोमांटिक धर्म कथाओं, जीवन वृत्त से कहानियां लेकर उनका संगीतमय मंचन किया जाता है। दर्शको से मनोरंजन के लिए इसकी कहानियों में नृत्य व डायलॉग भी भरे जाते हैं।

यह इतनी ज्यादा लोकप्रिय हो गई कि 2002 में तो अमेरिका में एक नौटंकी कलाकार देवेंद्र शर्मा ने नौटंकी प्रस्तुत कर उसे अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ला दिया। उन्होंने अपनी नौटंकी में वहां रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के प्रवास संबंध में मुद्दे उठाए थे। उन्होंने भंजन के लिए यह दिखाया कि किस तरह से भारतीय वहां पढ़ाई के लिए आते हैं व फिर नौकरी तलाशने के बाद भारत लौटकर शादी करते हैं।

इसका एक बड़ा उद्देश्य उनके अभिभावको द्वारा अपने विदेश में नौकरी कर रहे बेटे के लिए मौटा दहेज हासिल करना होता है। जोकि शादी के बाद अपनी पत्नी को छोड़कर अकेला विदेश चला जाता है। यहां वे महिला मित्र बनाते हैं या कोई और पत्नी रख लेते हैं। समाजिक बुराईयां दिखाने वाली यह नौटंकी जिसका नाम मिशन सुहानी था बहुत लोकप्रिय हुई व पूरी दुनिया में इसका मंचन हुआ।

नौटंकी की तरह महाराष्ट्र में तमाशा लोककला नृत्य बहुत लोकप्रिय है। इसे मराठी नाट्य मंच का पारंपरिक स्वरूप भी कहा जा सकता है जोकि वहां के जनजीवन में सैकड़ो वर्षों से मंचित होता रहा है। एक समय था जब महाराष्ट्र में सैकड़ो तमाशा थियेटर थे जो पूरे राज्य में तमाशा के में न के लिए थे। इसमें एक कहानी को नाच गानो के साथ पिरोया जाता था। इसमें इस्तेमाल किए जाने वाले गानों को लवानी कहा जाता था व कई फिल्मो में इसके आधार पर गाने गाए गए।

इनमें पारंपरिक नृत्य जैसे कवेली, कथक से लेकर कीर्तन व गजले तक शामिल होती थी। जिन तमाशों में गाने ज्यादा होते थे उन्हें संगीत बारी व नौटंकी पर आधारित तमाशों की ढोलकी भारी तमाशा कहते हैं। मूलतः तमाशा शब्द फारसी से लिया गया है जिसका मतलब होता है कि मनोरंजन करने वाला नाटक। यह शब्द आर्पीनियन, हिंदी, उर्दू व मराठी भाषाओं में भी शामिल हो गया। कहते हैं कि सबसे पहले इसकी शुरुआत वहां के राजा की मां ने अपनी प्रजा के मनोरंजन के लिए की थी।

मराठा साम्राज्य के दौरान पेशवाओं के वक्त में इसके मंचन को बढ़ावा मिला। बताते हैं कि आज भी महाराष्ट्र में 18-20 तमाशा पार्टियां है जोकि महाराष्ट्र के अलावा पड़ोसी राज्यों कर्नाटक व गुजरात में साल के 210 दिनों तक अपना मंचन करती हैं। पहले तमाशों में औरतो की भूमिका व नाचने का काम युवा लड़के करते थे जिन्हे नाच्य कहते हैं। कहते हैं कि 1843 में तमाशा थियेटर ने जोर पकड़ा। जब मुंबई में 19वीं सदी में कपड़ा उद्योग पनपने लगा और बड़ी तादाद में देश के दूसरे हिस्सो से ग्रामीण वहां मजदूरी करने आने लगे तो उनके मनोरंजन के लिए तमाशा काफी सक्रिय हो गया।

पहले तमाशा में काम करने वाले लोग कोलहारी, महर, मांग सरीखी छोटी जातियों से हुआ करते थे। उसी दौरान जाति प्रथा की समस्या को लेकर ज्योतिराव फूले ने सत्य शोधक समाज की स्थापना व जाति प्रथा कि बुराई से लड़ने के लिए सत्य शोध को जल्से से मंचन किया करता था जोकि राजनीतिक एवं सामाजिक सुधारों पर जोर दिया करते थे।

तमाशा इतना लोकप्रिय हो गया कि 2006 में महाराष्ट्र सरकार ने विठाबाई नारायणवकर को लाइफ टाइम अवार्ड का ऐलान किया जोकि इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने के लिए एक दर्जन से ज्यादा लोगों को दिया जा चुका है। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि 1972 में शांताराम ने श्रलागू व संध्या को लेकर तमाशा पर आधारित बहुचर्चित फिल्म पिंजरा बनाई। पिछले दिनों महाराष्ट्र में सरकार बनने को लेकर जो तमाशा चला उससे इस तमाशे की याद आ गई। बस इसका मंचन कुछ अलग था। जिसे मंच की जगह खबरी चैनलो ने अपने मंच पर प्रस्तुत किया। इनमें सस्पेंस भरपूर था व हर मोड़ पर साजिश नजर आ रही थी। पूरे देश में लोग टीवी से चिपके रहे और सबने 78 घंटों तक बहुत लोकप्रिय तमाशा देखा। हालांकि इसके मंचन में शुरू से ही अटकले लगाई जाती रही।

लोग आपस में इस बात की शर्ते लगाते थे कि इसका असली निर्देशक कौन था। यह बात जोर मारती रही कि कहीं अजीत पवार अपने चाचा शरद पवार के कहने पर तो यह सब कुछ नहीं कर रहे हैं। तमाशा वहां की राजनीति में बहुत चर्चित रहा है। भाजपा के दिवंगत नेता व महाराष्ट्र के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मुंडे की वजह से भी तमाशा की एक जानी-मानी नृतकी चर्चा में आई थी।

जब वह मामला गरमाया तो शिवसेना के तत्कालीन प्रमुख व सरकार में भाजपा के सहयोगी शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे ने कहा था कि मैंने मुंडे से कहा है कि ‘प्यार किया तो डरना क्या’। मगर इस बार पूरे प्रकरण में केंद्र के नेताओं की जो भूमिका रही उसे देखकर आनंद फिल्म का वह संवाद याद आता है कि जहांपनाह हम सब तो उस रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में हैं। कब किसकी डोर कैसे खिच जाए कुछ पता नहीं है। मगर इस बार असली ऊपर वाले ने बहुत गजब की डोर खींचकर तमाशे का पर्दाफाश किया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares