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महा विकास अघाड़ी का प्रयोग

Maharashtra government worried about

उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के साथ ही क्या यह माना जाए कि महा विकास अघाड़ी का प्रयोग असफल हो गया? अगर इस प्रयोग को सिर्फ इस नजरिए से देखा जाए कि विधानसभा चुनाव के बाद तीन पार्टियां एक साथ आईं और उन्होंने सरकार बना ली जो ढाई साल चलने के बाद गिर गई है तो जरूर लगेगा कि यह प्रयोग असफल हो गया। लेकिन सरकार बनाने और गिरने से इतर अगर राजनीतिक नजरिए से इसका आकलन किए जाए तो इसे किसी भी पहलू से असफल नहीं कहा सकता है। सो, सबसे पहले तो इसका आकलन व्यापक राजनीतिक परिदृश्य को ध्यान में रख कर करना होगा। दूसरा, इसका आकलन इस नजरिए से भी करना होगा कि क्या यह पहला या इकलौता प्रयोग था, जिसमें दो बिल्कुल अलग विचारधारा की पार्टियां साथ आई हों या एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली पार्टियों ने चुनाव के बाद गठबंधन करके सरकार का गठन किया हो?

इस लिहाज से यह कोई नया प्रयोग नहीं था। भाजपा के नेता भले इसे जनादेश के साथ विश्वासघात बताएं लेकिन वह भाजपा का अपनी सुविधा के लिए गढ़ा गया सिद्धांत है। असल में ‘कोएलिशन ऑफ एक्स्ट्रीम’ यानी दो अलग अलग ध्रुवों पर खड़ी पार्टियों का गठबंधन भारतीय  राजनीति में कोई नई बात नहीं है। आखिर भाजपा ने वामपंथी पार्टियों के साथ मिल कर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार का समर्थन किया था। बिहार में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद की पार्टी राजद की एंटी थीसिस के तौर पर अपनी पार्टी बनाई थी लेकिन एक समय उन्होंने उसी पार्टी के साथ तालमेल किया। खुद भाजपा ने महाराष्ट्र में 2014 में एनसीपी की मदद से सरकार बनाई थी, जिसका विरोध करके उसने चुनाव लड़ा था। उसी साल जम्मू कश्मीर में भाजपा ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार बनवाई थी, जबकि भाजपा ने उस पार्टी को देशद्रोही और अलगाववादियों का समर्थक बता कर चुनाव लड़ा था। सो, ‘कोएलिशन ऑफ एक्सट्रीम’ कोई नई बात नहीं है और न उस तरह का यह आखिरी प्रयोग था। आगे भी ऐसे प्रयोग होते रहेंगे। असल में इस नजरिए से देखेंगे तो यह एक तात्कालिक राजनीतिक प्रयोग की तरह दिखेगा, जिसका मकसद सरकार बनाना था। सो, इस प्रयोग को कई अलग अलग नजरिए से देखने की जरूरत है।

सबसे पहले तो यह एक कट्टर सांप्रदायिक और क्षेत्रवादी पार्टी के मुख्यधारा की राजनीति में उतरने का प्रयोग था। शिव सेना की शुरुआत दक्षिण भारतीयों के विरोध से हुई थी। बाल ठाकरे ने ‘बजाओ पुंगी हटाओ लुंगी’ के नारे के साथ शुरुआत की थी। तब मद्रास का नाम चेन्नई नहीं हुआ था। उस समय मुंबई से मद्रासियों को हटाने का आंदोलन चला। फिर शिव सेना कट्टर हिंदुवादी राजनीति में दांव आजमाने उतरी, जब बाल ठाकरे ने सीना ठोक कर कहा कि उनके शिव सैनिकों ने अयोध्या में मस्जिद गिराई। उसका तात्कालिक फायदा यह हुआ कि अगले ही चुनाव में 1995 में शिव सेना और भाजपा पहली बार महाराष्ट्र की सत्ता में आए। उसी समय मराठी मानुष की राजनीति के तहत शिव सेना ने उत्तर भारतीयों का विरोध शुरू किया। लेकिन महा विकास अघाड़ी के प्रयोग में शामिल होते ही शिव सेना का यह स्वरूप बदल गया। अयोध्या का श्रेय तो वह लेती रही लेकिन उसने मुख्यधारा की राजनीति के सारे तत्वों को अपनी राजनीति में शामिल किया। उद्धव ठाकरे ने समावेशी राजनीति की शुरुआत की। उन्होंने मुसलमानों, दक्षिण भारतीयों और उत्तर भारतीयों के प्रति द्वेष की भावना कम करने की दिशा में ठोस पहल की। देश की वित्तीय राजधानी में जिस तरह की सभ्य, सुसंस्कृत और समावेशी राजनीति होनी चाहिए थी वैसी राजनीति उद्धव ठाकरे ने की। यह बहुत बड़ा बदलाव था।

शिव सेना का कट्टर हिंदुवादी पार्टी से एक समावेशी पार्टी में बदलने का एक व्यापक परिप्रेक्ष्य भी है। ध्यान रहे भाजपा के अलावा इस देश में हिंदुवादी राजनीति करने वाली इकलौती बड़ी पार्टी शिव सेना है। कुछ और छोटे छोटे संगठन हैं। जैसे अब भी हिंदू महासभा का अस्तित्व है या कर्नाटक में श्रीराम सेने और उत्तर भारत के कुछ इलाकों में योगी आदित्यनाथ की बनाई हिंदू युवा वाहिनी काम करती है। लेकिन इनका राजनीतिक वजूद कुछ नहीं है। सो, भाजपा और संघ के संगठनों से इतर हिंदू राजनीति करने वाली इकलौती बड़ी पार्टी शिव सेना है, जिसका कायाकल्प हुआ है। शिव सेना ने खुल कर भाजपा पर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाया है और हिंदू हितों की बात करते हुए भी भाजपा से इतर राजनीति करने का एक मॉडल पेश किया है। इस बदलाव के दो पहलू हैं। पहला तो यह कि अब आरएसएस ब्रांड की राजनीति करने वाली सिर्फ एक पार्टी है भाजपा। सो, उसे अपनी इस स्थिति का फायदा मिलेगा। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि शिव सेना के कायाकल्प से भाजपा को अलग-थलग करने का मौका भी बनता है।

शिव सेना ने दो विपरीत विचारों वाली पार्टियों के साथ तालमेल करके भाजपा को ढाई साल तक देश के सबसे अमीर राज्य की सत्ता से दूर रखा तो उसका भी एक बड़ा मैसेज देश की दूसरी पार्टियों खास कर भाजपा की सहयोगी पार्टियों में गया है। शिव सेना ने यह दिखाया कि भाजपा भले सर्वशक्तिमान पार्टी हो लेकिन उसके सामने खड़े होकर उसे चुनौती दी जा सकती है। उसे सत्ता से बाहर रखा जा सकता है। शिव सेना ने यह भी दिखाया कि तमाम केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों के बावजूद भाजपा का मुकाबला किया जा सकता है। ध्यान रहे शिव सेना के एक दर्जन नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई चल रही है। इसके बावजूद उसने भाजपा के सामने सरेंडर नहीं किया। आज अगर बिहार में भाजपा के समर्थन से सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी भाजपा को तेवर दिखा रहे हैं तो उसका एक कारण महाराष्ट्र में हुआ महा विकास अघाड़ी का प्रयोग भी है।

इस प्रयोग का एक बड़ा हासिल यह है कि इसको असफल कराने के लिए भाजपा ने जितने उपाय किए हैं उससे भाजपा का सत्ता प्रेम और सत्ता हासिल करने के लिए कुछ भी करने की मानसिकता और भी जाहिर हुई है। इस नाते भाजपा कुछ और एक्सपोज हुई है। वह मध्य प्रदेश और कर्नाटक के घटनाक्रम से भी एक्सपोज हुई थी लेकिन महाराष्ट्र और शिव सेना का मामला जरा अलग है। महाराष्ट्र में भाजपा ने अपनी सरकार बनाने के लिए मुंह अंधेरे में अपने मुख्यमंत्री और एनसीपी के नेता को उप मुख्यमंत्री की शपथ कराई थी। वहां से शुरू करके शिव सेना में बगावत कराने और विधायकों को तीन भाजपा शासित राज्यों- गुजरात, असम और गोवा में छिपाने तक जो कुछ भी हुआ उससे भाजपा की ईमानदार और मूल्यों की राजनीति करने वाली पार्टी का मुखौटा कुछ और उतरा है। उसके कट्टर समर्थक भी मान रहे हैं कि इस ऑपरेशन में बहुत खर्च हुआ होगा। हालांकि राजनीति में सब जायज है, कह कर वे इसे न्यायसंगत ठहरा रहे हैं लेकिन उनको हकीकत मालूम हुई है। सो, इस प्रयोग को असफल नहीं कहा जा सकता है। भले महा विकास अघाड़ी की सरकार पांच साल नहीं चल पाई लेकिन इससे कई बड़े लक्ष्य हासिल हुए हैं या उस दिशा में ठोस पहल हुई है। शिव सेना अभी जो राजनीति कर रही है अगर उसे जारी रखती है तो यह महा विकास अघाड़ी के प्रयोग की बड़ी सफलता होगी।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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