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Wednesday, April 14, 2021
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सुशांत, मलाना क्रीम और मलाना गांव

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एक चर्चित गीत के बोल है कि ‘बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी’। कुछ माह पहले जब बॉलीवुड का चर्चित सुशांत सिंह राजपूद आत्महत्या कांड हुआ था तो किसी ने इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि  उसकी मौत का मामला सुदूर हिमाचल तक पहुंच जाएगा। कुछ दिनों पहले इस आत्महत्या कांड में नशीले पदार्थों की भूमिका की जांच कर रही एजेंसी ने एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया जिसने बताया कि सुशांत राजपूत नशीली दवा ‘मलाना क्रीम’ का इस्तेमाल करते थे। उस व्यक्ति के पास से बरामद मलाना क्रीम की कीमत कई करोड़ रुपए थी।

माना जाता है कि मलाना क्रीम दुनिया की सबसे महंगी व सबसे अलग तरह का मजा देने वाली नशीली दवा है। हालांकि इसका सदियो से इस्तेमाल होता आया है। इस कांड के तार हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में स्थित मलाना गांव से जुड़ गए। बताते है कि पूरी दुनिया में यह वो जगह है जहां इसकी पैदावार होती है। हम भारतीय भले ही इस नशे व जगह से अपरिचित हो मगर पूरी दुनिया में करोड़ो लोग इससे भलीभांति परिचित है। मलाना हशीश को मलाना गांव से अपना नाम मिला है।

मलाना कुल्लू घाटी में सुदूर स्थित एक छोटा-सा गांव है। यह हिमाचल प्रदेश में दूर-दराज 8701 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक छोटा सा गांव है। यहां की भाषा व रीति-रिवाज बाकी हिमाचल से एकदम अलग हैं। यहां के लोगों के मुताबिक पहले यहां जमलू ऋषि रहते थे। उन्होंने ही यहां रहने वालो लोगों के लिए अलग नियम व कानून बनाए। उन्होंने ही यहां दुनिया में सबसे पहले संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की थी। ऐसी मान्यता है कि आर्यकाल से पहले से ही जमलू ऋषि की यहां भगवान की तरह से पूजा होती रही है।

गांव वालो का दावा व ऐसा मानना है कि वे लोग सिकंदर महान के वशंज है जोकि शुद्ध आर्य है। इस गांव में दो सदनो की संसदीय व्यवस्था है। उच्च सदन को जयेशथांग व निचले सदन को कनिष्थांग कहते हैं। यहां रहने वाले लोग कनाशी बोली बोलते हैं जोकि आसपास में बोली जाने वाली बोलियों से एकदम अलग है व तिब्बती भाषा का मिश्रण मानी जाती हैं। यहां रहने वाले लोग यहां पैदा होने वाली झाडि़यों, झाड से टोकरियां, रस्सी, चप्पले आदि बनाकर अपनी आजीविका कमाते हैं।

वे लोग शुरू से यहां पर गांजा-भांग की खेती करते आ रहे हैं। वैसे वे लोग आलू और मक्का भी उगाते हैं। यहां मिलने वाली हशीश के काफी लोकप्रिय होने के कारण यह छोटा-सा सुदूर गांव 1980 में अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर आया था जब बड़ी तादाद में विदेशी लोग यहां आकर नशे का आनंद लेने लगे। यह गांव मुख्य सड़क से 20 किलोमीटर दूर है व वहां तक पहुंचने के लिए लोगों को मीलों पैदल चलना पड़ता है। लोगों को नशीले पदार्थों के धंधे से बचाने के लिए स्थानीय प्रशासन में यहां बने सारे होटल व गेस्ट हाउस बंद करवा दिए व यहां आने वालो को किसी स्थानीय व्यक्ति के घर में ही रूककर अपनी रात गुजरानी पड़ती है।

गांव का प्रशासन एक परिषद द्वारा संचालित होता है व उसके लिए 11 सदस्य चुने जाते हैं। वे जमलू देवता के प्रतिनिधि माने जाते हैं व उनके नाम पर गांव का प्रशासन चलाते हैं। इस परिषद के फैसलो को सब लोग बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लेते हैं। यहां पैदा होने वाली भांग से जो गांजा पैदा हाता है वह मलाना क्रीम कहलाती है। इसका नशा उच्च कोटि का होता है। ऐसा माना जाता है कि यह हशीश बेहद शुद्ध होती है। इसे तैयार करने के लिए अफीम के फूलो व फलो को रगड़ा जाता है उनसे एक विशेष प्रकार का चिपचिपा पदार्थ निकलता है जो हशीश या चरस कहलाता है।

यहां के निवासी सैकड़ो वर्षों से यह चरस तैयार करके उसे बेचते आए हैं। यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि 1985 में भारत सरकार ने भांग व उससे तैयार किए जाने वाले नशीले पदार्थों पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते रोक लगा दी थी व उन्हें अवैध करार दिया था। यहां के स्थानीय लोगों की दलील है कि सैकड़ो सालो से यह चरस ही उनकी आय का एकमात्र साधन रही है व यहां के वातावरण में और कुछ पैदा ही नहीं होता है। पूर्व सांसद व यहां के राज परिवार के सदस्य महेश्वर सिंह के अनुसार भारत में नशीली दवाओं संबंधी कानून बनने से काफी पहले यहां चरस की खेती कर उसे तैयार किया जाता रहा है।

सर्दियो में यह गांव पूरे देश व दुनिया से कट जाता है। यहां गेंहू व अनाज नहीं उगता है। ऐसा माना जाता है कि तमाम प्रतिबंधों के बावजूद यहां काफी जमीन पर इसको उगाया जाता है व उसकी फसल से 12000 किलोग्राम हशीश मिलती है। ये काफी ऊंची जगह पर पहाडि़यो पर उगते हैं व इसकी खेती तक पुलिस का पहुंच पाना लगभग असंभव होता है। इस नशीली दवा की दुनिया में बढ़ती मांग के कारण जहां एक और इसका अवैध धंधा करने वालो की आय बढ़ी है वहीं पुलिस के छापे व दौड़-भाग भी काफी बढ़ गई हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक सांठ-गांठ से चल रहे इस धंधे में पुलिस उनसे गांव की जगह सुदूर जंगलों में इसकी खेती करने को कहती है ताकि सरकारी जमीन होने के कारण किसी को उसका मालिक न ठहराया जा सके।

स्थानीय लोगों की दलील है कि जब तक उनकी आय का वैकल्पिक साधन नहीं मिलेगा वे लोग यह धंधा करते रहेंगे। मलाना क्रीम मटमैला चिपपचिा सा पदार्थ होता है। उसमें काफी मात्रा में नशा पैदा करने वाला पदार्थ टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल (टीएचसी) पाया जाता है जोकि एक अलग तरह का ही नशा पैदा कर नशेडि़यो को अलग आनंद देता है। पूरी दुनिया में यह हशीश कुल्लू में ही पैदा होती है। भारत में मलाना हशीश की कीमत 1500 से 8000 रुपए 10 ग्राम बताई जाती हैं। विदेशो में बिकने वाली यह सबसे नशीली दवा मानी जाती है। अमेरिका व जर्मनी तक पहुंचते-पहुंचते यह चरस करोड़ो रुपए किलो की दर पर बिकती है।

मलाना गांव के निकट पारवती घाटी को इसके लिए काफी कुख्यात जगह माना जाता है। मगर दिक्कत यह है कि कुछ लोगों की जो अजीविका का एकमात्र सहारा है उसे देश व दुनिया ने अवैध घोषित कर रखा है। इस नशीली दवा का उत्पादन अपराध माना जा रहा है। इसके बाद केरल की हशीश का नंबर आता है जिसे केरल गोल्ड के नाम से दुनिया में जाना जाता है। यह नशीली दवा इतनी प्रसिद्ध है कि 1994 व 1998 में विश्व प्रसिद्ध ताइरस मैनजी ने इसे दुनिया की सबसे अच्छी हशीश का खिताब दिया था। इसमें पाया जाने वाला तैलीय टेट्राहाइड्रोकेनेबिनॉल आयल टीएचसी इसे तैलीय व इतना अहम बनाता है। यहां मिलने वाली मलाना हशीश में इसकी मात्रा संसार में सबसे ज्यादा 30-40 फीसदी तक होती हैं। जबकि पूरी दुनिया में मिलने वाली किसी भी हशीश में टीएचसी 5.70 फीसदी से ज्यादा नहीं होती है। इसके फूल से बनने वाली बोंडी को दोनों हाथों से रगड़ने पर उससे तेल जैसा पदार्थ या मलाना क्रीम निकलती है। एमसटरडम  की कई दुकानो पर वह बहुत आसानी से मिल जाती है। अर्जेंटीना, कोलंबिया ने मलाना को नशीली दवाओं की सूची से बाहर कर रखा है मगर भारत में यह प्रतिबंधित है।

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