मलेशिया से भारत की ठनना और..

एक पुरानी कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। पाकिस्तान पहले से ही हमारे दुश्मन रहे चीन के साथ विशेष दोस्ती अपनाता आया था। अब जब मलेशिया द्वारा भारत सरकार के कश्मीर में 370 समाप्त करने व नागरिकता कानूनों के विरोध करने का मामला सामने आया तो भारत ने उसे कड़ा संदेश देने के लिए उससे पाम आयल का आयात कम कर देने का ऐलान किया ताकि उसके आयात पर रोक लगे।

भारत काफी पहले से ही मलेशिया को सबक सिखाने की फिराक में था क्योंकि भारत का मानना है कि मलेशिया सरीखा जरा-सा देश उसके आंतरिक मामलों में बयानबाजी करके हस्तक्षेप करता आया था। मालूम हो कि मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर बिन मोहमद ने पिछले कुछ माह पहले ही जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने व नए नागरिकता कानून बनाए जाने का विरोध किया था।

मालूम हो कि इस देश में भारत द्वारा मनी लांड्रिंग के व भड़काऊ भाषण देने के आरोपों में वांछित इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक को 2017 से शरण दे रखी है। उस पर आतंकवादियों के साथ संबंध रखने का शक है। भारत मलेशिया समेत अनेक देशों से पाम ऑयल खरीदता है। जब मलेशिया की इस टिप्पणी पर भारत ने उसके पाम आयल खरीदने में दिलचस्पी न दिखाने की पहल की तो पाकिस्तान तुरंत सक्रिय हो गया।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि वे भारत द्वारा तेल न खरीदने के कारण मलेशिया को होने वाले नुकसान की भरपाई करेंगे। उससे ज्यादा पाम आयल खरीदेंगे। मालूम हो कि पाकिस्तान ने मलेशिया से पिछले साल 1.1 लाख टम पाम आयल खरीदा था जबकि भारत ने 4.4 लाख टन पाम आयल खरीदा था।मुझे याद है कि हम लोग बचपन में खाने में वनस्पति घी का व सरसो का तेल ही इस्तेमाल करते थे। देसी घी जोकि दूध से तैयार किया जाता था दाल में तड़का लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। जब सब्जियां, पराठे, पूरी, वनस्पति घी में ही बनाए जाते थे। जब भी रसोई में वनस्पति घी के पराठे सेंके जा रहे होते थे तब इसकी खशबू ही सबसे अलग होती थी।

हलवाई भी मिठाई बनाने के लिए वनस्पति घी का इस्तेमाल करते थे। तब डालडा व रथ सबसे अच्छे वनस्पति घी माने जाते थे। जमे हुए वनस्पति घी को हाईड्रोजोनीकृत वनस्पति तेल कह सकते हैं। फिर बाद में हमारे देश में बटर आयल आया जो कि गाय के दूध से तैयार किया जाता था। सरकार ने इसे मदर डेरी की दुकानों पर सस्ते दामों पर बेचना शुरू कर दिया।फिर हमारे देश में पाम आयल का निर्यात किया जाने लगा। इसका इस्तेमाल सीधा खाना बनाने की जगह वनस्पति घी बनाने में ज्यादा किया जाता है। दूसरो शब्दों में यह वनस्पति घी का कच्चा माल कहा जा सकता है जोकि घी की तुलना में काफी सस्ता होता है। इसकी वजह यह है कि यह स्वादहीन, गंधहीन तेल होता है व उससे घी तैयार किए जाने पर उसमें किसी तरह की कोई बदबू नहीं आती है। आमतौर पर हलवाई इसका इस्तेमाल खाने का सामान तलने व मिठाइयां बनाने के लिए करते हैं। ब्रिटिश इसका इस्तेमाल साबून, शैंपू के उत्पाद में करते थे।

सबसे पहले लीवर ब्रदर्स (यूनीलीवर) ने साबून व अमेरिका ने पामोलिव शेव क्रीम बना के इसका इस्तेमाल शुरू किया था। दुनिया का 85 फीसदी पाम आयल मलेशिया व इंडोनेशिया में पैदा होता है। पहला नंबर इंडोनेशिया का है जबकि भारत दुनिया से पाम आयल का सबसे बड़ा खरीददार है। मलेशिया में जितना तेल पैदा होता है उतनी उसकी रिफाईनिंग क्षमता है। इसे फैटी एसिड काफी कम होते हैं व इसे दिल व दिमाग के लिए सही तेल माना जाता है।

पाम आयल पैदा करने में लागत काफी कम आती है। अर्थात यह इस देश की अर्थव्यवस्था के लिए काफी अच्छा माना जाता है। मलेशिया की सरकार इसके उत्पादन पर बहुत ध्यान देती है व वहां हर साल 90 लाख टन पॉम आयल तैयार किया जाता है। पाम आयल पैदा करने के लालच में मलेशिया में बहुत तेजी से वन काट डाले गए व वहां पाम आयल के पेड़ लगाकर उनकी खेती की जाने लगी। पहले पाम के पेड़ का इस्तेमाल सुंदरता बनाने वाले पेड़ के रूप में किया जाता था मगर 1917 में अंग्रेजो के शासन काल में इससे तेल तैयार किया जाना शुरू हो गया।

यूरोपियन यूनियन ने बड़े पैमाने पर मलेशिया में पाम आयल पैदा किए जाने का विरोध करते हुए कहा था कि इससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। मगर प्रधानमंत्री महातिर ने इसे व्यापारिक युद्ध करार देते हुए कहा था कि यूरोप के अमीर देश का गरीब देशों के खिलाफ एक षड़यंत्र है। जब भारत व मलेशिया के बीच तनातनी बढ़ी तो भारत सरकार ने अपने व्यापारियो से कहा कि वे मलेशिया की जगह इंडोनेशिया से पाम आयल खरीदे। भारत इंडोनेशिया से जो तेल खरीद रहा है व मलेशिया की तुलना में 10 डालर प्रति टन ज्यादा महंगा है।माना जा रहा है कि मलेशिया के इस्लामी देश होने के कारण सऊदी अरब के दबाव में पाकिस्तान ने यह ऐलान किया है। इससे मलेशिया को ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। मलेशिया का 23 फीसदी तेल भारत खरीदता है। कुछ साल पहले हुए एक समझौते के बाद भारत में सस्ते तेलो के आयात पर लगने वाला शुल्क 40 फीसदी से घटाकर 37.5 फीसदी कर दिया था। अब इसे बढ़ाकर 5 फीसदी कर दिया गया है। इससे आयातित तेल महंगा हो गया है व मलेशिया को अब नए खरीददार ढूंढ़ने पड़ेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares