विदेश मंत्रालय की चिंता

एक ओर हमारी सरकार रायसीना डायलाग कर रही है, जिसमें दर्जनों विदेशी नेता दिल्ली आए हुए हैं और दूसरी ओर मलेशिया और श्रीलंका से ऐसी खबरें आ रही हैं, जिनसे हमारे विदेश मंत्रालय की चिंता बढ़ सकती है। मलेशिया के राष्ट्रपति महाथिर मुहम्मद कश्मीर, नागरिकता संशोधन कानून और जाकिर नाइक के मामले में साफ-साफ भारत-विरोधी रवैया अपना रहे हैं। उन्होंने इन तीनों मुद्दों पर न सिर्फ भारत की कड़ी आलोचना की है बल्कि इस्लामी राष्ट्रों का एक वैकल्पिक संगठन खड़ा करने की कोशिश भी की है। इसके जवाब में भारत सरकार मलेशिया को सबक सिखाना चाहती है। वह मलेशिया से खरीदे जानेवाले पाम आइल पर पाबंदी लगाने जा रही है और वह उससे माइक्रोप्रोससरों की खरीद पर भी पुनर्विचार कर रही है।

यदि ऐसा हो गया तो भारत-मलेशिया व्यापार जो कि 17 अरब डालर का है, आधे से भी कम रह जाएगा। इससे मलेशिया को ज्यादा नुकसान होगा। यह जानते हुए भी 94 वर्षीय महाथिर कह रहे हैं कि घाटे के डर से क्या वे सच बोलना बंद कर दें? महाथिर के इस तेवर की मैं जितनी तारीफ करुं, उतनी कम है लेकिन उनसे मेरा निवदेन है कि वे ‘अपने सच’ को अपने तक ही सीमित क्यों न रखें, क्योंकि उक्त तीनों मामले भारत के आंतरिक मामले हैं?

अपने विदेश मंत्रालय से मैं कहूंगा कि वह मलेशिया के खिलाफ बदले की कार्रवाई न करे। बुजुर्गवार महाथिर को अपनी सनक निकालने दे। उससे भारत का कुछ बिगड़नेवाला नहीं है। उससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी कल कोलंबो में थे और उन्होंने वहां बड़ा ही विचित्र-सा बयान दे डाला। उन्होंने कहा, भारत का नाम लिये बिना, कि ‘‘चीन किसी भी देश को श्रीलंका के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने देगा।’’

अब श्रीलंकाई राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्ष शीघ्र ही चीन-यात्रा भी करेंगे। चीन ने श्रीलंका में तरह-तरह के निर्माण-कार्य हाथ में ले रखे हैं और उसके प्रसिद्ध सामरिक बंदरगाह हंबनतोता को 99 वर्ष की लीज़ पर अपने कब्जे में ले रखा है। राजपक्ष नवंबर में भारत आए थे। तब उन्होंने काफी अच्छी-अच्छी बातें की थीं लेकिन ऐसा लगता है कि वे अब अपने भाई और पूर्व राष्ट्रपति के पद-चिंहों पर चल पड़े हैं।

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