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मालचा महल और वाजिद अली

हाल में एक खबर पढ़ी कि दिल्ली में सरदार पटेल मार्ग के करीब स्थित 14वीं सदी के मालचा महल को सरकार अपने कब्जे में लेकर पर्यटन स्थील के रूप में बदल कर उसका उद्धार करने वाली है। इसके बारे में दिल्ली सरकार ने नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर से उसकी मरम्मत के लिए विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा है।

यह पढ़कर मुझे एक पुरानी घटना याद आ गई। जब दिल्ली प्रेस में था तो वहां के संपादक परेशनाथजी के साथ साप्ताहिक बैठक में हम लेखको की उनसे उन मुद्दो पर लंबी बहस होती थी जिन पर कि हम लोग लिखना चाहते थे। एक बार किसी जाने-पहचाने अभिनेता द्वारा मुंबई में फुटपाथ पर अपनी जिदंगी बिताने की खबर आई तो मैंने उस मामले पर बैठक में कुछ लिखने की इच्छा जताई।

जवाब में परेशनाथजी ने कहा कि अपने लेखन में इसके साथ जरा भी हमदर्दी मत जताना बल्कि खुलकर लोगों को चेतावनी देते हुए कहना कि जो लोग अच्छे समय में कमाए गए पेसे को बर्बाद करते हैं उनकी उस अभिनेता जैसी ही हालात होती है क्योंकि वह भी अपने समय का चर्चित अभिनेता था जोकि कभी लाखों रुपए कमाता था। मगर उसने उस पैसे को नहीं संभाला और अय्याशी पर बर्बाद किया। आज जो भी ऐसा करेगा। उसकी उस अभिनेता जैसी ही दुर्गति होगी।

मालचा महल का निर्माण 14वीं सदी में फिरोजशाह तुगलक ने करवाया था व वह उनकी शिकारगाह था। आजादी के बाद के दशकों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह जगह बेगम विलायत महल को रहने के लिए दी जोकि खुद को अवध के अंतिम नवाब वाजिद अलीशाह का वंशज होने का दावा करती थी। व कुछ दशक पहले उसने अपने दो बच्चो बेटी सकीना व राजकुमार अली रजा चंद नौकरो और फूलो के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी रेस्ट रूम पर कब्जा जमा लिया था।

वह सरकार से लगातार घर व पेंशन देने की मांग कर रही थी क्योंकि अवध के अंतिम नवाब का शासन तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने हड़प लिया था। उन्होंने वाजिद अली शाह को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। शुरुआत में कुछ वर्षों तक उसे सालाना 26 लाख रुपए पेंशन के रूप में देते रहे। जिसे वह खाने-पीने नौकरो को वेतन देने व दूसरे शौक पूरे करने पर उड़ा देता था। बाद में उन्होंने वाजिद अली शाह को पेंशन देना बंद कर दिया और उसने बेहद गरीबी में अपने दिन काटे और पैसे-पैसे का मोहताज होकर प्राण त्यागे।

बेगम विलायत महल का परिवार किसी से मिलता जुलता नहीं था व इस उजड़ी हुई शिकारगाह में रहता था जिसके न तो दरवाजे थे और न ही फर्श था। बेगम ने 1992 में हीरे निगल कर आत्महत्या कर ली। उनका शव घर में ही सड़ता रहा। बाद में उनकी बेटी व बेटे की भी मौत हो गई। वह लोग किसी से मिलते जुलते नहीं थे और उन्होंने अपने घर में हर व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। बेटे के भी मरने के कई दिनो बाद उसके शव से सड़ने की बदबू आने के बाद लोगों ने उसे दफन किया।

अवध (अब उत्तर प्रदेश) के 10वें अंतिम नवाब वाजिद अली शाह का जन्म 30 जुलाई 1822 को हुआ था और वे 1847 से 1856 तक नौ साल इस पद पर रहे थे। अंग्रेजो ने उनके राज्य पर एक संधि के तहत 1801 में ही लगभग कब्जा जमा लिया था व उन्हें अंग्रेज फौज का सारा खर्च उठाना पड़ता था। अंग्रेजो ने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि अवध पूर्व व दक्षिण में मौजूद मुगल शासको से बचाव करने वाला प्रदेश माना जाता व उनके पूर्वज हमेशा मुगलो के साथ टकराव लेते आए थे। उनमें एक अच्छे मुगल शासक का शौक था। वे नाचने गाने, खाने पीने के शौकीन होने के साथ ही महिलाओं के रसिया भी थे। उन्हें इतिहास में मोहम्मद शाह रंगीले के नाम से भी जाना जाता है। उन्हें शेरो शायरी व पढ़ने लिखने का बहुत शौक था व बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए ठुमरी उनकी ही लिखी हुई थी।

वे एक अच्छे कवि व लेखक भी थे। जब वे पैदा हुए तो ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन वह योगी बन जाएगा। ऐसा होने से रोकने के लिए उन लोगों ने उनके मां-बाप को सलाह दी थी कि वे उसके हर जन्मदिन पर उसे योगी की वेशभूषा में तैयार करे ताकि उनके योगी बनने का खतरा टल जाए। उन्होंने चर्चित परीखाना की स्थापना की जिसमें सुंदर युवतियो के शाही कलाकार संगीत व नृत्य सिखाते थे। लड़कियो को परी कहा जाता था व उनके नाम सुल्तान परी, हरमुख परी सरीखे थे।

अपने हर जन्मदिन पर वे भगवा कपड़ो में योगी की तरह तैयार होते व मोतियो की माला पहनकर जोगन बनी परियो के साथ दरबार में जाते थे। बाद में उन्होंने जोगिया जश्न नामक मेले की शुरुआत की जिसमें लखनऊ की हर जाति व धर्म के लोग आकर उनके साथ योगी बनकर खेल सकते थे। उन्होंने कैसरबाग बारादरी की स्थापना की जिसमें वे रास लीला करते थे उन्होंने कृत्थक नृत्य को काफी आगे बढ़ाया। उन्होंने बोलचल की भाषा अवध को काफी बढ़ावा दिया।

उनके वक्त पर शतरंज के खिलाड़ी व उमराव जान अदा सरीखी फिल्मे भी बनी। उनकी गिनती अपने समय के अमीरो में होती थी। उनकी जिदंगी के बारे में आचार्य चतुरसेन ने अपनी पुस्तक ‘अंतिम नवाब’ में एक रोचक किस्सा लिखा है। जब अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार करके कलकत्ता ले गए और जेल में डाल दिया तो दोपहर को एक सैनिक उनके लिए खाने की थाली लेकर आया। वाजिद अली शाह ने उस पर एक नजर डालने के बाद उसे दरवाजे के नीचे से बाहर कर दिया। जब इस बारे में सैनिक ने वजह जाननी चाही तो उनके साथ कैद नौकर ने कहा कि नवाब साहब ऐसा खाना नहीं खाते हैं। खाना बनाने के पहले उनके नमक के बहुत बड़े टुकड़े पर पानी डालकर उसे धोया जाता था। जब वे सेर भर का नमक धुलकर महज एक छटांक का हो जाता था तब खाना बनाने वाला उसे उनके खाने में डालता था। कहां उनकी यह ऐश थी और कहां उनके वशंज के शरीर खंडहर में सड़ते रहे।

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