मल्लाह वोटों की नई ठेकेदारी!

किसी प्रदेश में चुनाव हो रहे हो तो परिवारवाद का मुद्दा नहीं गरमाए यह असंभव ही लगता है। खासतौर पर जब बात भारतीय राज्य बिहार की हो तो पूछना ही क्या! बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव, दिवंगत राम विलास पासवान से लेकर नेहरु परिवार की तीसरी पीढ़ी राहुल गांधी तक कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके होने की हैसियत से काफी महत्व रखते है। लालू यादव के दोनों बेटे तेजस्वी व तेज प्रसाद से लेकर दिवंगत रामविलास पासवान का बेटा चिराग पासवान चुनाव में छाए हुए हैं।

ऐसे में एकमात्र अपवाद मुकेश साहनी ही कहे जा सकते हैं जो किसी पारिवारिक राजनैतिक परिवार से सबंध न रखने के बाद भी इतनी ज्यादा अहमियत रखते है कि केंद्र में सत्तारुढ़ भाजपा तक उन्हें अपने साथ रखने के लिए लालयित है। जहां एक ओर भाजपा चाहती है कि वह गठबंधन के साथी जद (यू) से कहीं ज्यादा सीटें जीत कर चुनाव के बाद सरकार पर हावी रहे। वहीं भाजपा ने मुकेश साहनी की पार्टी विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के लिए अपने खाते में से 11 सीटें छोड़ दी है जबकि जद (यू) 115 पर, भाजपा 110 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

मुकेश साहनी की अहमियत का पता लगाने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटना पड़ेगा। उनका राजनीतिक इतिहास कोई लंबा चौड़ा नहीं है व उनका दल वीआईपी सिर्फ दो साल पहले अस्तित्व में आया था।  मुकेश साहनी का नाम सुनने से ऐसा लगता है कि जैसे कि वे पंजाबी होंगे। मगर असलियत यह है कि वे बिहार की नाविक या मल्लाह जाति से है।

मुकेश साहनी का जन्म बिहार के एक मल्लाह परिवार में हुआ था। वह मात्र 19 साल की उम्र में नौकरी की तलाश व अपनी किस्मत संवारने के लिए बिहार से मुंबई चला गया और उसने अपनी जिंदगी की शुरुआत पहले एक दुकान पर नौकरी करने से की व फिर वहां फिल्म की शूटिंग के लिए सेट तैयार करने लगा। देखते ही देखते उसने मुकेश सिनेवर्ल्ड नामक अपनी कंपनी खड़ी कर ली व देवदास से लेकर बजरंगी फिल्म तक के सेट तैयार किए व शाहरुख खान व अमीर खान के करीब होता चला गया।

उसने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए प्रचार किया व उसकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा बढ़ी कि अमित शाह ने अपनी 45 जनसभाओं में उसे अपने साथ रखा व अपने मंचों पर आने से पहले उसका भाषण करवाया। उसका दावा है कि तब उन्होंने भाजपा के सत्ता में आने पर मल्लाह जाति को आरक्षण प्रदान करने का वादा किया था मगर जब वह पूरा नहीं हुआ तो वह भाजपा से किनारा करके महागठबंधन में शामिल हो गया।

2019 में हुए लोकसभा चुनाव में उसने तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए मगर एक भी सीट नहीं जीत पाया। उसे बिहार में मल्लाह के बेटे के नाम से जाना जाता है। उसने अपनी जाति व समुदाय के लोगों के लिए काफी सामाजिक काम किए व साहनी समाज कल्याण संस्था की स्थापना की। उसने इन संस्थाओं के दरभंगा व पटना में दो दफ्तर भी खोले। वह संस्थान लोगों को पढ़ने व आगे बढ़ने के लिए जोर देने लगी।

उसने निषाद विकास संस्था की भी स्थापना की। अपने समाज के लोगों की जिला स्तर पर सभाएं करने लगा। वह 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा का साथ छोड़कर महागठबंधन में शामिल हो गया हालांकि उसकी राजनीति उपलब्धि कुछ खास नहीं थी। मगर इस युवा नेता की अपने समाज पर गजब की पकड़ देखते हुए ही भाजपा ने उससे संबंध बनाए रखे।

कहते है यह आठवीं पास युवक आज करोड़पति है। उनका दावा है कि बिहार में हर पार्टी को पूरी तरह यह विश्वास है कि वह मल्लाह समाज के वोटों के बिना चुनाव नहीं जीत सकती है। राज्य के मल्लाह समुदाय के लोगों की संख्या का कोई अधिकारिक डाटा नहीं है। इस समुदाय में तमाम उपजातियां आती हैं। वह अतिपिछड़ा वर्ग में गिने जाते है।

मुकेश साहनी का दावा है कि समाज में कम से कम 10 फीसदी वोटों पर उनकी मजबूत पकड़ है। बिहार के मुजफ्फरनगर, चंपारण, मधुबनी, खगड़िया, वैशाली व उत्तर बिहार के कुछ अन्य जिलों में यह जाति विशेष अहमियत रखती है। वहां के मतदाताओं में उनका हिस्सा छह फीसदी के लगभग है। पहले यह वर्ग जय प्रकाश नारायण का समर्थक होता आया था व बाद में पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद को अपना मानने लग। वे अब इस दुनिया में नहीं है। वे राजद व जद (यू) के टिकट पर मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से कई बार जीते थे। उनका बेटा 2019 में भाजपा के टिकट पर मुजफ्फरपुर से चुनाव जीता था।

उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए प्रचार किया था बाद में नीतीश के साथ संबंध ठीक करने में भाजपा में अहम भूमिका अदा की थी। उनका मल्लाह ही नहीं बल्कि अति पिछड़े वर्ग समाज के कुछ अन्य जातियों में भी अहम प्रभाव है जो उन्हें भाजपा के लिए वीआईपी बनाता है। लंबे अरसे तक इस वर्ग का कोई अहम नेता भी नहीं था जब कि भाजपा को सवर्णों की पार्टी माना जाता है जबकि नीतीश कुमार ने गैर यादव मतदाताओं को साथ लाने के लिए अति पिछड़े वर्ग की राजनीति शुरु की थी।

उस दृष्टि से मुकेश मल्लाह इस वोट बैंक में सेंध मार सकते है। भाजपा का दावा है कि उसने पंचायत चुनावों में अति पिछड़ा वर्ग के लिए 20 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया था। बिहार में आज 1600 मुखिया इसी जाति वर्ग से आते है। देखना यह है कि इस बिहार विधानसभा चुनाव में मुकेश साहनी की उपलब्धि कैसी रहती है व अपने 11 उम्मीदवारों में से कितने उम्मीदवार जीत कर विधायक बन पाते हैं। मल्लाह उनकी व भाजपा की चुनावी वैतरणी में नैय्या कैसे पार लगाते हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares