वैक्सीन से सुर्खियों का प्रबंधन!

देश में अचानक कोरोना वायरस की वैक्सीन का हल्ला मच गया है। चारों तरफ सिर्फ वैक्सीन की बात है। प्रधानमंत्री ने एक दिन का ‘वैक्सीन टूर’ किया। अहमदाबाद के जायडस कैडिला की फैक्टरी से लेकर हैदराबाद में भारत बायोटेक और उसके बाद पुणे के सीरम इंस्टीच्यूट का उन्होंने दौरा किया और ऐसा आभास दिया कि अब कोरोना से मुक्ति मिलने वाली है। इसकी वैक्सीन आने वाली है। इसके दो दिन बाद सोमवार को प्रधानमंत्री ने वैक्सीन बना रही तीन और कंपनियों- जेनोवा बायोफार्मा, बायोलॉजिकल ई और डॉक्टर रेड्डीज लैब के वैज्ञानिकों व प्रबंधकों से बात की। अब उन्होंने चार अक्टूर को कोरोना वायरस पर सर्वदलीय बैठक भी बुलाई है, जिसमें निश्चित रूप से चर्चा का फोकस वैक्सीन की उपलब्धता, उसकी डिलीवरी, सप्लाई, कोल्ड चेन और लोगों को टीका लगवाने पर होगा।

असल में वैक्सीन का यह पूरा हल्ला सिर्फ एक पीआर एक्सरसाइज है, जिसका अभी कोई खास मतलब नहीं है। वैक्सीन का काम रूटीन की अपनी प्रक्रिया से चल रहा है और खुद प्रधानमंत्री ने दस दिन पहले ही कहा था कि कब तक वैक्सीन आएगी, उसकी कीमत क्या होगी, यह कुछ पता नहीं है। उन्होंने कहा था कि इस बारे में वैज्ञानिक ही बता सकते हैं। सवाल है कि जिसके बारे में कुछ पता ही नहीं है, उसका इतना बड़ा हल्ला मचाने का क्या मतलब है? अगर आप इस हल्ले की टाइमिंग को बारीकी से देखेंगे तो पता चलेगा कि यह असल में सुर्खियों के प्रबंधन का प्रयास है, जिसकी जरूरत अचानक कई कारणों से पड़ गई।

पिछले ही हफ्ते नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस यानी एनएसएसओ की ओर से अर्थव्यवस्था का आंकड़ा जारी होना था और सबको पता था कि लगातार दूसरी तिमाही में भी देश सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर निगेटिव रहनी है। उससे पहले कई राज्यों के किसान संगठनों ने ऐलान कर रखा था कि वे दिल्ली मार्च करेंगे और जब तक सरकार तीन कृषि कानूनों को रद्द नहीं करती है, तब तक प्रदर्शन करेंगे। ठीक उसी समय जब किसान दिल्ली के लिए चले और अर्थव्यवस्था का आंकड़ा आया, तभी प्रधानमंत्री ‘वैक्सीन टूर’ पर निकले और वैक्सीन का हल्ला मचाया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि अर्थव्यवस्था वाला मामला तो पूरा ही सुर्खियों से गायब हो गया, बल्कि उलटे यह माहौल बन गया कि महज साढ़े सात फीसदी की गिरावट आई है इसका मतलब है कि सब कुछ ठीक हो रहा है। हां, वैक्सीन के हल्ले के बावजूद किसान आंदोलन का मामला सुर्खियों से नहीं हट रहा है। इसका फ्रस्ट्रेशन प्रधानमंत्री के सोमवार को काशी में दिए भाषण में भी दिखा।

भले वैक्सीन का हल्ला किसान आंदोलन से कमजोर पड़ रहा है पर यह तय मानें कि अब इसका शोर थमने वाला नहीं है। अब सिर्फ इसी का शोर होगा क्योंकि यह सरकार के अनुकूल है। इससे कई चीजों से ध्यान भटकाने में आसानी हो रही है। इससे कोरोना वायरस के अब तक के प्रबंधन का सवाल खत्म हो गया है। यह कोई नहीं पूछ रहा है कि कोरोना काल में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए। अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए सरकार क्या कर रही है, यह भी नहीं पूछा जाएगा। पीएम केयर्स फंड की तो अब कोई बात ही नहीं करता। अभी भाजपा ने हैदराबाद में जम कर प्रचार किया, रैलियां हुईं और रोड शो हुए हैं। अगले कुछ दिन में यह सब कुछ पश्चिम बंगाल, असम और दूसरे कई राज्यों में होने वाला है। सो, वैक्सीन के हल्ले में यह बात भी दबी रहेगी कि आखिर राजनीतिक रैलियों से कोरोना क्यों नहीं फैल रहा है? सो, पूरा देश अब अगले दो तीन साल सिर्फ वैक्सीन की चर्चा में मगन रहेगा। यह प्रचार चलता रहेगा कि नरेंद्र मोदी देश के 130 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगवा रहे हैं। इसी योजना के तहत वैक्सीन की पूरी व्यवस्था को केंद्रीकृत किया गया है और सब कुछ केंद्र सरकार की कमान में रखा गया है ताकि राज्यों को इसका श्रेय नहीं मिल सके।

परंतु इस पूरे हल्ले में एक बड़ा सवाल यह है कि आखिर वैक्सीन आ जाएगी तो उससे क्या होगा? क्या सारे लोगों को सरकार हाथों हाथ टीका लगवा देगी? क्या सारे नागरिक कोरोना वायरस के खतरे से मुक्त हो जाएंगे? क्या देश और समाज पहले जैसा हो जाएगा? क्या देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी? असल में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है। कम से कम अभी अगले दो-तीन साल तक ऐसा कुछ नहीं होगा। वैक्सीन आने के बावजूद इस बात की गारंटी नहीं है कि कोरोना का वायरस नहीं फैलेगा क्योंकि 95 फीसदी सफलता का दावा करने वाली कंपनी भी यह नहीं कह रही है कि उसकी वैक्सीन जो एंटी बॉडी तैयार करेगी वह व्यक्ति के शरीर में कब तक रहेगी? इस वैक्सीन के सैकड़ों स्ट्रेन बताए जा रहे हैं तो कितने स्ट्रेन्स को पकड़ कर वैज्ञानिकों ने वैक्सीन बनाई है यह भी पता नहीं। इससे संक्रमित व्यक्ति के शरीर में अपने आप जो एंटी बॉडी तैयार हो रही है उसकी मियाद 90 दिन बताई जा रही है कि पर पूरी दुनिया में कम से कम दो दर्जन मामले ऐसे आए हैं, जिनमें 90 दिन के भीतर लोगों को कोरोना का दोबारा संक्रमण हुआ। सो, कोई भी वैक्सीन स्थायी रूप से कोरोना से बचाए रखने की गारंटी नहीं है। इसका मतलब है कि कोरोना रहेगा, अस्पतालों में कोरोना के वार्ड बने रहेंगे, वैक्सीन के साथ साथ महंगाई इलाज चलता रहेगा, लोगों को मास्क लगाए रखना होगा और धीरे धीरे सारी चीजों से हाथ धोते जाना होगा।

और वैसे भी जिस बीमारी में 90 फीसदी से ज्यादा लोग अपने आप ठीक हो रहे हैं, उस बीमारी के टीके का इतना हल्ला मचाने की क्या जरूरत है? आईसीएमआर ने खुद माना है कि 80 फीसदी लोगों में कोई लक्षण ही नहीं आ रहे हैं। जिनमें लक्षण आ रहे हैं उनमें से 80 फीसदी से ज्यादा लोग घर में रह कर ही ठीक हो जा रहे हैं। जिनमें लक्षण दिखते हैं उनमें से पांच फीसदी लोगों को ही अस्पताल जाने या किसी विशेष इलाज की जरूरत पड़ रही है। ऐसे में वैक्सीन की 90 फीसदी सफलता की तो वैसे ही गारंटी है। फिर किस बात का ढोल पीटा जा रहा है! इस हल्ले में कोई इसके साइड इफेक्ट की चर्चा नहीं कर रहा है। इससे पहले जितने टीके हड़बड़ी में आए हैं, उनसे बड़ा नुकसान हुआ है। पोलियो के शुरुआती टीके से हजारों लोग स्थायी रूप से विकलांग हुए थे, इस तथ्य को ध्यान में रखने की जरूरत है। बहरहाल, कुल मिला कर वैक्सीन के शोर से बाकी सारी सुर्खियों को दबाए रखना है और देश के 130 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगवानी है। यह हजारों या लाखों करोड़ रुपए का खेल है, जिसका फायदा कहने की जरूरत नहीं है कि कुछ गिनी-चुनी फार्मा कंपनियों को मिलने वाला है।

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