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सत्ता में वापसी का जनादेश

असम का फिर से भारतीय जनता पार्टी और केरल का लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को मिला जनादेश साधारण नहीं है। केरल में तो हर पांच साल पर सत्ता बदलने की रवायत को धता बताते हुए एलडीएफ की वापसी हुई है। इसलिए ये विचार का मुद्दा जरूर है कि आखिर पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ सरकार ने ऐसा क्या चमत्कार किया कि इस बार राज्य में उसे फिर से शासन का जनादेश मिला। जाहिर है, इसमें एक पहलू महामारी से निपटने में राज्य सरकार की भूमिका रही होगी। अब ये साफ है कि स्वास्थ्य नीति के मामले में सिर्फ केरल ऐसा राज्य है, जो बाकी देश से अलग रास्ते पर चला है। वहां प्राथमिक और द्वितीयक स्तर पर की स्वास्थ्य सेवाओं में पिछले पांच साल में जो सुधार किया गया है, उसकी तारीफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई है। इस वक्त जबकि दुनिया भर में कोरोना महामारी के कारण स्वास्थ्य सबसे बड़ी चिंता है, केरल के शिक्षित मतदाताओं को एलडीएफ की सरकार को कायम रखना जरूरी महसूस हुआ होगा। असम में भाजपा के लिए इस बार चुनौतियां थीं।

असम अकेला राज्य है, जहां के बहुसंख्यक समुदाय नागरिकता संशोधन कानून से नाराज हुआ था। सर्वानंद सोनोवाल की सरकार आर्थिक या दूसरे मुद्दों पर भी ज्यादा सफल नहीं मानी जाती थी। हालांकि चुनाव से ठीक पहले नकदी सहायता देने की कुछ योजनाओं पर अमल शुरू किया था और कुछ नई ऐसी योजनाएं उसने घोषित की, जिसका असर हुआ हो सकता है। लेकिन मुख्य बात शायद यही मानी जाएगी कि भाजपा का अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी के मुद्दों से हटकर भावनाओं पर चुनाव लड़ने का जो फॉर्मूला है, वह इस राज्य में सफल रहा। बहरहाल, इन दोनों राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस के सामने जो अस्तित्व का सवाल खड़ा रहा है, वह और सघन हो जाएगा। अगर किसी पार्टी के पास एंटी इन्कबेंसी को भुनाने का मौका हो और उसके बावजूद वह सफल ना हो सके, तो उसकी संभावनाओं पर सवाल उठने जायज हैँ। संभवतः इस सवाल एक जवाब यह हो सकता है कि आज पार्टी किस चीज के लिए खड़ी है, यह लोगों के दिमाग में धूमिल हो गया है। मेलजोल और भाजपा की एंटी-थीसीस होने की बातें बौद्धिक हलकों में चाहे, जितनी अच्छी लगती हों, लेकिन मतदाताओं को वे नहीं रिझा पा रही हैं। तो फिर पार्टी क्या करे? यह उसे ही तय करना होगा, वरना मतदाताओं ने क्या तय कर रखा है, यह बार-बार सामने आ रहा है।

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