• डाउनलोड ऐप
Saturday, April 17, 2021
No menu items!
spot_img

महाशय मसाले वाले की गजब दास्तां

Must Read

दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जोकि अपनी शिक्षा, मेहनत व लगन के बलबूते पर दुनिया में प्रगति करते हैं  और आगे बढ़ते हैं। चंद लोग ही ऐसे होते हैं जोकि यह मानते हैं कि वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं। हाल ही में दुनिया से गए व्योवृद्ध 98 वर्षीय मसाला किंग व महाशिया दी हट्टी के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी ऐसे ही लोगों में से थे। कुछ साल पहले उन्होंने अपनी जीवनी तांगेवाला कैसे बना मसालो का शहंशाह नामक पुस्तक प्रकाशित की थी। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि पुस्तक के रंगीन जैकेट के अंतिम पृष्ठ पर उन्होंने यह बात जोर देकर लिखी थी कि विश्व प्रसिद्ध एमडीएच मसाला कंपनी के इस चेयरमैन की शिक्षा महज पौनी पांचवी क्लास पास थी। पौनी पांचवी का मतलब यह लिखा था कि वे पांचवी क्लास का इम्तहान नहीं दे पाए थे व उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा था।

महाशय धर्मपाल गुलाटी 98 वर्ष के थे व उनका जन्म 27 मार्च 1923 को हुआ था। वे सियालकोट (पाकिस्तान) से थे व 1947 में देश के विभाजन के समय अपना सबकुछ वहीं छोड़कर खाली हाथ दिल्ली चले आए थे। वे कहते थे कि उन्होंने तांगे वाले से उद्योगपति बनकर यह साबित कर दिया कि जीवन में असंभव कुछ भी नहीं है व असंभव को हकीकत में बदल सकते है। मसाला उद्योग जगत में शहंशाह के नाम से जाने जाने वाले महाशय धर्मपाल का जीवन बहुत संघर्ष से गुजरा। उन्होंने अपनी एमडीएच मसाला फैक्टरी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी।

उन्होंने अपनी मां चानन देवी की याद में माता चानन देवी अस्पताल की दिल्ली में स्थापना की। खुद ज्यादा न पढ़ पाने के बावजूद उन्होंने लोगों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए एमडीएच परिवार की और से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान व उत्तर प्रदेश में दर्जनो स्कूल स्थापित किए। वे अनेक अनाथ आश्रमों, विधवा आश्रमो व ब्रह्माणों की आर्थिक मदद करते थे। वे कट्टर आर्य समाजी थे व उनकी फैक्टरियो में सुबह शाम भजन प्रार्थना होती थी। उनके पिता की सियालकोट में कपड़े धोने वाले साबुन व मसाले बेचने वाले पंसारी की दुकान थी। उनका पड़ोसी जिसने गाय पाल रखी थी वह दूध में पानी मिलाकर बेचता था व बहुत गाली गलौच करता था। महाशय के मुताबिक उन्होंने उससे गंदी-गंदी गालियां देना सीखा।

उस समय वे पांच आने की दर से कपड़ा धोने वाला साबुन बेचते थे। उन्हें यह सब इसलिए करना पड़ा क्योंकि उन्होंने बहुत जल्दी पढ़ना छोड़ दिया था। जब वे पांचवी कक्षा में पहुंचे तो उन्हें उर्दू के साथ अंग्रेजी भी पढ़ाई जाने लगी। वे अंग्रेजी में काफी कमजोर थे। एक बार उनके अध्यापक ने उन्हें अंग्रेजी का पाठ न सुना पाने पर बुरी तरह से पीटा। वह उस समय करीब साढ़े दस साल के थे। पढ़ाई में उनका मन लगना बंद हो गया। उनके पिता ने उनसे कहा कि बेटा तू स्कूल जाकर क्या करेगा आखिकार तुझे बैठना तो दुकान पर ही है कोई नौकरी तो करनी नहीं।

यह सुनकर उन्हें मानो मुंह मांगी मुराद मिल गई व उन्होंने दूसरे दिन से ही स्कूल जाना बंद कर दिया और पांचवीं क्लास का इम्तहान दिए बिना ही स्कूल छोड़ दिया व उनके पिता ने उन्हें मुनीमी का काम सीखने के लिए हिंदी मुनीमी स्कूल में डाल दिया। तब आज की तरह कैलकुलेटर, कंप्यूटर नहीं हुआ करते थे व छात्रों को दो से लेकर 50 तक की गिनती करना व तौल रेट निकालना व हिसाब किताब रखना सिखाया जाता था। वे मुनीमी सीखने के बाद दुकान पर बैठने लगे व आधा किलो तक की पुडि़या पहले से तौल कर तैयार करके रखते थे ताकि ग्राहक को ज्यादा देर तक इंतजार न करना पड़े।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वे अंग्रेजो की और से युद्ध लड़ने के लिए जर्मनी तक गए व वहां से वापस लौटने पर उनके पिता ने उनसे लकड़ी का काम सीखने को कहा क्योंकि उनका मानना था कि लकड़ी के बिना कोई घर बन नहीं सकता है और आगे चलकर उनका बेटा लकड़ी का ठेकेदार बन सकता है। वे मानते थे कि आदमी की अक्ल के साथ उसकी किस्मत का भी बहुत योगदान होता है।

दिल्ली आ कर उन्होंने पहले 750 रुपए में एक तांगा खरीदकर उसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बारा टुटी व सदर तक चलाना शुरू किया क्योंकि उन्हें इससे आमदनी भी हो जाती व मुफ्त में सैर करने का मौका भी मिल जाता था। उन्होंने पहले करोल बाग में एक पुराना घर खरीदा व पूरे परिवार को बुला लिया। तब वे सरकारी शौचालयो में अपनी बारी का इंतजार करते हुए घंटो तक खड़े रहते थे। उन्होंने पाया कि दिल्ली के चावड़ी बाजार में मसाला बेचना बहुत संभव नहीं है। पहले वे अपना मसाला बाहर पिसवाते थे। एक दिन उन्होंने पाया कि वहां मसाला पीसने वाले ने उनकी हल्दी में बेसन मिला रखा है। वहीं से उनके मन में अपना मसाले खुद तैयार करने का विचार आया।

उन्होंने एमडीएच नाम से कंपनी स्थापित कर मसाले तैयार करना शुरू कर दिया। आज वे अरबो रुपए के मालिक है व कनाड़ा, अमेरिका, ब्रिटेन समेत पूरे यूरोप में उनके मसाले बिक रहे हैं। दुबई व लंदन में उनके दफ्तर है। उन्हें माडलिंग व प्रचार का बहुत शौक था। वे टीवी पर अपने मसालो का प्रचार करते थे। एक बार उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की पुस्तक विमोचन समारोह में आए संजय दत्त को जोर से गले लगा लिया व तब तक उसे पकड़े रहे जब तक कि उनकी तस्वीरे नहीं खिच गई। यह तस्वीर उनकी आत्मकथा में छपी हुई है। सुबह जल्दी उठना व धूमना तथा नशे से दूर रहना उनकी पुरानी आदत थी।

वे कहते थे यही उनकी लंबी व स्वस्थ जिदंगी का राज भी है। वे योग करने के बहुत शौकीन थे व खुद फोटोग्राफी भी करते थे व बारिश में भी नियमित बरसाती पहनकर टहलने जाया करते थे। वे अपने ही उत्पादन की माडलिंग करने वाले देश के एकमात्र वयोवृद्ध व्यक्ति थे। वे दूल्हे की तरह पगड़ी लगाकर चूडी़दार पायजामा व शेरवानी पहनकर मसालों की माडलिंग करते हुए जब असली मसाले सच सचः एमडीएच एमडीएच कहते तो यह शब्द दिमाग में बैठ जाते थे। बाद में वे एमडीएच का पूरा नाम महाशिया दी हट्टी की जगह ‘मिर्च, धनिया, हल्दी’ बताने लगे।

यह उनकी मेहनत व दूरदर्शिता थी जिसके चलते बंटवारे के समय मात्र 1500 रुपए लेकर भारत आए धर्मपाल गुलाटी महाशय बन गया। क्योंकि पंजाब में सफल लोगों को आदरपूर्वक महाशय कहा जाता था। और वे एचडीएच के मालिक बन गए। उन्होंने 750 रुपए तांगा खरीदने पर खर्च कर दिए थे व बाद में अपनी कमाई से पैसे जोड़कर महाशियां दी हट्टी (महाशय की दुकान) खोली। उनका कारोबार 2000 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका था। कभी महज दो आना सवारी लेकर लोगों को पहाड़गंज से करोलबाग तक ले जाने वाला यह महाशय हर साल अपनी कंपनी के रूप में सालाना 25 करोड़ रुपए का वेतन ले रहा था।

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest News

West Bengal Election Phase 5 Live Updates : सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त के बीच 45 सीटों पर डाले जा रहे वोट

कोलकाता। West Bengal Election Phase 5 Live Updates : कोरोना संक्रमण के फैलते प्रसार के बीच पश्चिम बंगाल (West...

More Articles Like This