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कनाडा का मतलब और उसमें भारतीय

मैंने अपनी कनाडा यात्रा के बारे में लिखना तो शुरु कर दिया पर पाठकों को इस देश के बारे में यह नहीं बताया कि वह कहां है। अतः इस बारे में थोड़ी बहुत जानकारी देने की कोशिश कर रहा हूं। दरअसल उत्तरी अमेरिका का यह देश भारत से लगभग बिना रूके 14 घंटे की उड़ान उड़ने के बाद आता है। रूस के बाद क्षेत्रफल के हिसाब से यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है जहां दुनिया की सबसे ज्यादा मीठे पानी की झीले हैं वहां करीब 2 लाख झीले है।

दोबारा कॉलम लिखना शुरु करने के लगभग एक सप्ताह बाद रात को मेरी नींद टूटी। मुझे एक पुरानी बात याद हो आई। मेरे एक संपादक ने मुझे एक बार कहा था कि जब भी तुम किसी स्थान विशेष का जिक्र करो तो उसके बारे में कुछ जरुर लिख देना। जैसे कि त्रिरूचिरापल्ली नाम के स्थान का जिक्र करते हुए यह जरुर बता देना कि वह कहां है और वहां कौन सी भाषा बोली जाती है। उनका कहना था कि आम पाठक को हर चीज के बारे में जानकारी नहीं होती है और न ही तो वह इस बारे में किसी से कुछ जानने की कोशिश करता है, शायद यही वजह है कि मैंने जीवन में कभी भी टाई पहनना नहीं सीखी और न ही मुझे रेलवे का टाइम टेबल देखना आता है।

अब तो खैर रेलवे ने टाइम टेबल ही छापना बंद कर दिया है। मुझे लगा कि मैंने अपनी कनाडा यात्रा के बारे में लिखना तो शुरु कर दिया पर पाठकों को इस देश के बारे में यह नहीं बताया कि वह कहां है। अतः इस बारे में थोड़ी बहुत जानकारी देने की कोशिश कर रहा हूं। दरअसल उत्तरी अमेरिका का यह देश भारत से लगभग बिना रूके 14 घंटे की उड़ान उड़ने के बाद आता है। रूस के बाद क्षेत्रफल के हिसाब से यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है जहां दुनिया की सबसे ज्यादा मीठे पानी की झीले हैं वहां करीब 2 लाख झीले है।

कुछ का आकार तो छोटे मोटे देशों से भी बड़ा है। यहां लोकतंत्र है व उसकी प्रमुख ब्रिटेन की महारानी होती है जो कि अपने द्वारा नियुक्त गर्वनर-जनरल के जरिए राज करती है। देश का सबसे बड़ा प्रशासक प्रधानमंत्री होता है। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। वहां 10 राज्य व तीन केंद्र शासित प्रदेश हैं। अंग्रेजी व फ्रेंच यहां की मुख्य भाषाएं हैं क्योंकि कभी अंग्रेज व फ्रांसीसी इस देश पर शासन कर चुके हैं। यहां की मुद्रा डालर व सेंट है। नोटों पर महारानी की तस्वीर छपी होती है। यहां के अपने निवासियों की जनसंख्या 3.8 करोड़ है व बाहर से आए लोगों में भारतीय लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है।

कनाडा एक बहुत साफ सुथरा प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर देश है जहां बहुत जबरदस्त हरियाली है। भारतीय लोगों में हिंदुओं व सिखों की आबादी करीब 10 लाख है जो कि यहां का महज पांच फीसदी हिस्सा है। वहां जनसंख्या काफी कम होने के कारण एशियाई देशों से बहुत बड़ी संख्या में युवा वहां पढ़ने व नौकरी करने के लिए जाते हैं। हालात यह है कि 2019 के आम चुनाव में वहां भारतीय मूल के 20 सदस्य जीते थे व मौजूदा प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूडो ने उनकी मदद से अपनी सरकार बनायी व इनमें से एक सिख को उन्होंने अपना रक्षा मंत्री भी बनाया था।

यह देश प्राकृतिक संसाधनों से काफी संपन्न है। हां सोना, क्रोमियम, निकेल, कैडमियम से लेकर रेडियो एक्टिव धातुओं कोयले तक के विशाल भंडार वहां बड़ी तादाद में है। वहां गेहूं, अरंडी (कनोल) की भी खेती होती है। वहां बहुत बड़ी तादाद में हरियाली व ओक, चीड़ आदि के पेड़ बड़ी मात्रा में है। उसकी अर्थव्यवस्था बहुत अच्छी है व अमीरी के लिहाज से वह दुनिया में तीसरे स्थान पर आता है।

वहां आने वाला पहला भारतीय केसर सिंह था जो कि ब्रिटिश सेना के एक अधिकारी थे। शुरु में उनकी तरह आने वाले ज्यादातर भारतीय सिख ब्रिटिश सेना में विश्व युद्ध में काम कर चुके थे व उनकी मेहनत व स्वामीभक्ति से ब्रिटिश बहुत प्रभावित थे। शुरु में आने वाले ज्यादातर भारतीय पंजाब से थे जो कि यहां के लोगों की तुलना में कम मजदूरी पर यहां काम करने लगे और पैसा बचाकर अपने घरों को भेजने लगे ताकि उनके परिवार के लोग यहां आ सके। शुरु में आने वाले ज्यादातर भारतीय ब्रिटिश कोलंबिया से वेकूंवर शहर से सटे इलाके में बसे जो कि दिल्ली के तिलक नगर जैसे लगता है। वहां ये लोग यहां खेती करने का काम करते थे। मगर बाद में जापानी व चीनी लोगों के आने के बाद मजदूरी से लेकर अन्य बातों को लेकर उनमें आपस में टकराव पैदा होने लगा।

पहले सिख समेत सभी लोग भारत के हिंदू ही माने जाते  थे। दाढ़ी रखने के कारण अंग्रेज उनसे नाराज होने लगे। उनको लगता था कि पगड़ी बांधने व दाढ़ी व मूंछ रखने वाले ये गंदे लोग होते हैं। उनका कनाडा में विरोध शुरु हो गया व वहां के एक प्रधानमंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि भारतीय कनाडा में बसने के लायक नहीं है। वहां की सरकार ने एक कानून बनाकर वहां आने वाले विदेशी खासतौर से भारतीयों को प्रतिबंधित करने की कोशिश की। इसके तहत उनके लिए अपने शहर देश से कनाडा तक की बिना रूके यात्रा करने व साथ कम से कम 200 डालर पैसा लाना जरुरी कर दिया गया। ताकि वे लोग अपने देश से कनाडा न आ सके। मगर 1905 में वहां पहला गुरुद्वारा स्थापित किया जा चुका था व गुरुद्वारों का कामकाज देखने के लिए चीफ खालसा दीवान की भी स्थापना हो चुकी थी।

इसलिए जब 1914 में गुरुदीत सिंह नामक हांगकांग का एक व्यापारी जापान के एक जहाज कामागाटामारू को किराए पर लेकर उसमें 376 लोगों को लादकर कनाडा के वेंकूवर शहर पर पहुंचा तो वहां की सरकार ने वहां ठहरने की इजाजत नहीं दी। वह वहां दो माह तक रूका रहा तब वहां के दो हिंदुस्तानी नागरिकों हुसैन रहीम व सोहन लाल पाठक ने उन्हें देश में आने की अनुमति हासिल करने के लिए अदालत का दरवाजा खटकाया। उन्होंने सुरक्षा के रूप में सरकारी कोष में 22000 डालर तक जमा करवाए पर असफल रहे और अंततः सरकार ने जहाज को मुख्य समुद्र में ढकेल दिया।

जब उसी साल सितंबर माह में जहाज भारत पहुंचा तो कलकत्ता के तट पर पहुंचा तो वहां भी लोगों को उतारने की अनुमति नही दी गई। यूनियन उन्हें ट्रेन से जबरन पंजाब वापस भेजना चाहती थी। यह लोग जब जहाज से उतरने लगे तब उनमें व अंग्रेज पुलिस के बीच टकराव हुआ व पुलिस की गोलाबारी में 20 लोग मारे गए। जहाज लाने वाला गुरदीत सिंह लापता हो गया। कुछ सालों बाद उसने आत्म समर्पण कर दिया। उसे पांच साल की कैद हुई व वह जेल में ही मर गया। इस घटना के बाद तत्कालीन कनाडा सरकार को लोगों को न आने देने के लिए बनाए एक कानून में बदलाव करने पड़े। आज वहां सिखों की बहुत विशिष्ट स्थिति है।

मेरे दोस्त व कनाडा के कामागाटामारू प्रकरण में शहीद हुए लोगों को सम्मान देने के लिए संघर्ष करने वाले सिख नेता साहिब सिंह थिंद के अनुरोध पर पिछले दिनों कनाडा के प्रधानमंत्री ने इस कांड पर दुख जताते हुए संसद के अंदर सरकार के कृत्य के लिए माफी मांगी थी।

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