कटहल बहुतों के लिए मनभावन!

वैसे तो मैं लगभग हर तरह की सब्जी खा लेता हूं मगर कटहल की सब्जी देखते ही मुझे कुछ होने लगता है। एक बार बचपन में मैं कटहल की सब्जी खाने के बाद बुरी तरह से बीमार पड गया था। उसके बाद मुझे कटहल की सब्जी से नफरत हो गई।

हालांकि हमारे देश में इसे चाव से खाया जाता है और यह फल तो शाकाहारी लोगों का मीट भी कहलाता है। जब मैं1970 के दशक में मुंबई गया तो मैंने पहली बार वहां पका हुआ कटहल बिकते हुए देखा जिसके बीज को लोग चाव से खरीदकर खाते थे। तब सब्जी वाले ने बताया कि इसे जैक फ्रूट कहते हैं व दक्षिण भारत में पका हुआ कटहल बहुत चाव से खाया जाता है। असल में कटहल भारत में करीब 6,000 सालों से पैदाकिया जा रहा है। यह यहां मिलने वाला सबसे बड़ा फल होता है जोकि काटने पर बहुत चिपचिपा दूध छोड़ता है। जिसे किसी भी तरह से साफ नहीं किया जा सकता है। अतः हमारे सब्जी वाले प्लास्टिक की थैली पहनकर इसे काटते हैं। इसका दूध तो सरसो के तेल से भी नहीं साफ होता है।

तंजानियामें तो सब्जी वाले इसके दूध को मिट्टी के बेल से साफ करते हैं। यह अंजीर की प्रजाति का ऐसा फल है जो 55 किलो तक वजन लिए होता है। इसका पेड़ 3 मीटरतक ऊंचा होता है व उसमें साल में दो बार फल आते हैं व एक पेड़ पर करीब 200-300 फल तक लगते हैं। भारत में यह दक्षिण भारत में बहुत चाव से खाया जाता है।

इसकी लकड़ी को बहुत उपयोगी माना जाता है। इससे वाध्द यंत्र बनते है तो इंडोनेशिया में इसका इस्तेमाल घर खासतौर पर उनकी छत बनाने के लिए किया जाता है। इसकी लकड़ी में दीमक नहीं लगती है। पिछले साल हमारे देश में 15 लाख टन कटहल पैदा हुआ था जिसे सब्जी व फल के रूप में खा लिया गया। अहम बात तो यह है कि शहतूत और अंजीर की प्रजाति का यह फल काफी बड़ा 55 किलोग्राम तक भारी व तीन फुट तक लंबा हो सकता है। यह पूरे विश्व में तटीय इलाको में पाया जाता है।

यह बांग्लादेश व श्रीलंका का राष्ट्रीय फल है व केरल और तमिलनाडु का राज्य फल है। इससे नूडल्स, चिप्स बनते हैं और इसका रस तक बेचा जाता है। बताते हैं कि जब पुर्तगाली भारत आए तो वे कालीकट (कोजीकोड) व मलाबार में 1498 में कटहल लेकर आए थे। धीरे-धीरे पूरे दक्षिण एशिया में इसे उगाया जाने लगा। एक फल में 100 से 500 तक बीज हो सकते हैं। इसको काटने पर इसमें बहुत चिपचिपा दूध-सा निकलता है।

तंजानिया में इसको बेचने वाले ग्राहको का हाथ साफ करने के लिए अपने ठेले पर एक कटोरी में मिट्टी का तेल रखते हैं। इसके पकने पर इससे तेज गंध आती है जोकि कभी आम जैली तो कभी अनानास जैसी मानी जाती है। इस बनाने पर यह मांस जैसा लगता है। कुछ लोगों का कहना है कि इसका स्वाद भी मांस जैसा होता है मगर मेरा मानना है कि अगर किसी को मांस जैसा ही कुछ खाना है तो उसे मांस ही खाना चाहिए। उससे मिलती-जुलती कोई चीज नहीं है। जैसा कि सोयाबीन चाप या कटहल।

बांग्लादेश में इसका व इसके बीजो को अलग-अलग पकाकर खाते हैं। वहां कटहल की तरी वाली सब्जी बनती है। फिलीपींस में कटहल को नारियल के दूध में पका कर स्वाद से खाते हैं। थाईलैंड में इसका जूस तैयार करके उसे अमेरिका व यूरोप में बेचा जाता है। अफ्रीका में कटहल को सुअर के मांस के साथ पकाकर खाते हैं। वहां उससे आइसक्रीम व जैम भी बनातेहैं।

इसकी लकड़ी काफी अच्छी मानी जाती हैं। उसके रेशे व दाने काफी अच्छे होते हैं। श्रीलंका से इस लकड़ी का बड़ी तादाद में यूरोप निर्यात किया जाता है। जहां इससे घर की छत व फर्नीचर बनाया जाता है। इंडोनेशिया में इसके वाद्य जैसे तबला, वीणा बनाए जाते हैं। इतिहास बताता है कि भारत में भले ही इस फल को लाने का श्रेय पुर्तगालियो को दिया जाता रहा हो मगर आज से 6000 साल पहले इसकी यहां खेती हुआ करती थी।

केरल में पुजारी इसकी लकड़ी से बनी कुर्सी पर बैठकर पूजा करते थे जिसे अवनि पलाका कहा जाता था। बोद्ध भिक्षु इसकी लकड़ी से अपने कपड़े रंगते थे। कटहल पृथ्वी का सबसे बड़ा फल है व साल भर में एक पेड़ पर करीब तीन टन कटहल लगते हैं। गरीब देशों में तो यह भूख शांत करने के काम आता है। हमारे देश में केरल में इसके उत्पादन पर बहुत ज्यादा जोर दिया जा रहा है। पिछले साल विश्व पर्यावरण दिवस पर 5 जून को वहां कृषि मंत्री ने इसे अधिकारिक फल घोषित करने के साथ राज्य में इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए 5 लाख पौध लगाने का ऐलान किया।

वहां की तमाम सहकारी समितियां अपने सदस्यो को सस्ते दामों पर पौधे दे रही है। राज्य सरकार का कहना है कि जहां इस समय कटहल के जरिए राज्य को 30 करोड़ रुपए सालाना की आय होती है वहीं अगर इसकी खेती को बढ़ावा दिया गया तो यह राशि 15,000 करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच सकती है। वहां के वायनाड इलाके में तो एक किसान ने इसके उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अभियान ही छेड़ दिया है। इसके कारण अनेक ग्रामीणों की आर्थिक हालात काफी बदल गई है। अब तक मुझे पता नहीं था कि जिस कटहल से मैं घृणा करता हूं वह इतना उपयोगी भी हो सकता है।

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