mizoram assam border dispute राज्यों का विवाद बारूद का ढेर है
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राज्यों का विवाद बारूद का ढेर है

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mizoram assam border dispute असल में यह केंद्र और राज्य दोनों के स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व की विफलता है, जो आजादी के इतने बरस बाद भी राज्यों के बीच सीमा या भाषा का विवाद नहीं सुलझ सका है। इसकी वजह से कई राज्य खासकर पूर्वोत्तर के राज्य बारूद के ढेर पर बैठे हैं, जरा की चिंगारी वहां ऐसी आग भड़का सकती है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। असम और मिजोरम के बीच हुई हिंसा एक पूर्व चेतावनी है।

असम और मिजोरम के बीच जमीन विवाद को लेकर हुई हिंसक झड़प ने एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचा है। भारत के अनेक राज्य इस समस्या से ग्रस्त हैं, लेकिन आजादी के बाद से ही समस्याओं को सुलझाने की बजाय उसे दबाने की जो प्रवृत्ति बनी थी वह आज भी जारी है। आज भी समस्या को गहराई से समझने, उसकी बारीकियों को जानने, उसके समाधान के लिए राजनीतिक स्तर पर वार्ता शुरू करने और समस्या से जुड़े सभी हितधारकों, खास कर आम लोगों को वार्ता में शामिल करने की सोच नहीं दिख रही है। आजादी के बाद जब राज्यों की सीमाएं नए सिरे से खींची जा रही थीं उसी समय अगर राजनीतिक नेतृत्व ने आम सहमति बनाने की पहल की होती तो शायद एक संप्रभु राष्ट्र के भीतर राज्यों के बीच इतनी हिंसक लड़ाइयां नहीं हुई होतीं।

असम और मिजोरम के बीच हुई हिंसा कोई अपवाद नहीं है। पूर्वोत्तर के राज्यों में ही पहले कई बार ऐसी हिंसा हो चुकी है। असम पूर्वोत्तर के राज्यों का केंद्र है, जिसकी सीमा छह राज्यों से लगती है और लगभग सभी राज्यों के साथ उसकी सीमा का विवाद है। सोचें, एक राज्य का सीमा विवाद छह राज्यों के साथ है और कभी भी उसे सुलझाने का गंभीर प्रयास नहीं हुआ है। असम और नगालैंड के बीच 1985 में सीमा विवाद को लेकर हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें पुलिस के 28 जवान मारे गए थे। वृहत्तर नगालिम की मांग कर रहे नगालैंड के नेताओं ने हिंसा को उकसाया था। मणिपुर और नगालैंड के बीच भी दशकों से लड़ाई चल रही है, जिसमें अब तक हजारों बेकसूर लोग मारे जा चुके हैं। नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड यानी एनएससीएन के इसाक-मुइवा गुट पर आरोप है कि उसने 13 सितंबर 1993 को मणिपुर के 115 कुकी आदिवासियों की हत्या कर दी थी। 1992 से 1997 के बीच इस इलाके में सीमा विवाद और दो राज्यों के बीच जमीन के झगड़े में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए।

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अंग्रेजों के राज में पूर्वोत्तर का विवाद जमीन से ज्यादा अस्मिता का था और आदिवासी समूहों के बीच का था। आजादी के बाद जब 1950 में असम राज्य बना तब नगालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश इसी का हिस्सा थे। मिजोरम को असम के लुशाई हिल्स के रूप में जाना जाता था। सबसे पहले 1971 में पूर्वोत्तर के पुनर्गठन कानून के तहत असम से अलग करके नगालैंड, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश अलग राज्य बनाए गए। इसके 16 साल बाद 1987 में मिजो शांति समझौते के तहत अलग मिजोरम राज्य बनाया गया। जब इन राज्यों की सीमाएं खींची जा रही थीं तब किसी ने इन राज्यों के नागरिकों से बात करने और आम सहमति बनाने की जरूरत नहीं समझी।

प्रशासनिक जरूरत को प्राथमिकता देते हुए राज्य बांट दिए गए। मोटे तौर पर यह सुनिश्चित किया गया कि एक राज्य में एक खास जातीय समूह की बहुलता होनी चाहिए। लेकिन यह नहीं देखा गया कि ओवरलैपिंग का इलाका कितना बड़ा है यानी एक जातीय समूह के लोग दूसरी जातीय समूह वाले लोगों को मिले राज्य के अंदर कितनी संख्या में हैं। यह आगे चल कर बड़ा विवाद बना। इसी वजह से मिजोरम के लोग असम का कुछ हिस्सा अपने राज्य में शामिल कराना चाहते हैं तो नगालैंड वाले मणिपुर का कुछ हिस्सा अपने राज्य में लेना चाहते हैं। एक दूसरे की भौगोलिक सीमा में राज्यों का दावा भाषा के आधार पर ही ज्यादा है। नए राज्य बनाए जाने के बाद से यह विवाद चल रहा है लेकिन अंतरराज्यीय समूह बना कर इसे सुलझाने का संगठित प्रयास कभी नहीं किया गया।

ऐसा नहीं है कि यह संकट सिर्फ पूर्वोत्तर के राज्यों का है। कई राज्यों के बीच सीमा का यह विवाद चल रहा है। जिन राज्यों के बीच सीमा का विवाद नहीं है वहां नदी जल के बंटवारे का विवाद है। जिस तरह का विवाद असम और मिजोरम या असम और नगालैंड या असम और अरुणाचल प्रदेश या मणिपुर और नगालैंड के बीच है उसी तरह का विवाद महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच है। कर्नाटक के सात हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर महाराष्ट्र का दावा है। उनका कहना है कि कर्नाटक के बेलगावी, उत्तर कन्नड़, बिदर और गुलबर्गा के आठ सौ से ज्यादा गांव मराठी भाषी लोगों की बहुलता वाले हैं और इसलिए उन इलाकों को महाराष्ट्र में मिलाया जाना चाहिए। इसे लेकर दोनों राज्यों में कई बार विवाद हो चुका है। यह विवाद भी बांबे प्रेसीडेंसी के पुनर्गठन के समय से चल रहा है। जिस तरह से आज असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा कह रहे हैं कि उनके राज्य की एक इंच जमीन भी कोई नहीं ले सकता है उसी तरह कुछ समय पहले कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने कहा था कि वे अपने राज्य की एक इंच जमीन महाराष्ट्र को नहीं लेने देंगे। असल में पुनर्गठन के समय ही वस्तुनिष्ठ तरीके से या आम सहमति के तरीके से काम नहीं हुआ और उसके बाद राज्यों के अंदर सूई की नोक बराबर जमीन किसी को नहीं देने की धारणा प्रबल होती गई।

जिस तरह से कर्नाटक के मराठी भाषी लोगों की बहुलता वाले जिलों को महाराष्ट्र अपने में मिलाना चाहता है उसी तरह केरल के कन्नड़ भाषी इलाकों खास कर कासरगौड़ को कर्नाटक अपने में मिलाना चाहता है। इसे लेकर कर्नाटक और केरल के बीच बरसों से विवाद से चल रहा है। भाषा के अलावा भी भौगोलिक इलाकों को लेकर कई राज्यों के बीच विवाद चल रहा है। राजस्थान और गुजरात के बीच मानगढ़ पहाड़ी को लेकर विवाद है। गुजरात का कहना है कि इस पहाड़ी का आधा हिस्सा उसका है तो राजस्थान का दावा है कि पूरी पहाड़ी उसकी है। ऐसे ही ओड़िशा और पश्चिम बंगाल के बीच विवाद है। सीमा पर की जमीनों को लेकर चल रहे विवादों के बीच एक विवाद बंगाल की खाड़ी के एक द्वीप कनिका सैंड्स को लेकर है। कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट इस पर अपना अधिकार चाहता है तो पारादीप पोर्ट ट्रस्ट भी इस पर दावा कर रहा है। भौगोलिक सीमा के विवाद के अलावा नदी जल बंटवारे का विवाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच है तो पंजाब और हरियाणा के बीच और हरियाणा व दिल्ली के बीच भी है।

केंद्र और राज्यों के विवादों को सुलझाने के लिए कई मेकानिज्म बनाए गए हैं। अस्सी के दशक में जस्टिस राजेंदर सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में सरकारिया आयोग बनाया गया था। इसी तरह नई सदी के पहले दशक में जस्टिस मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में पुंछी आयोग बना था। एक अंतरराज्य परिषद के गठन का प्रावधान भी संविधान के अनुच्छेद 263 में किया गया है। एक राष्ट्रीय विकास परिषद भी है और राष्ट्रीय एकता परिषद भी है। इन सबका बुनियादी काम केंद्र व राज्यों के विवादों को सुलझाना है। लेकिन राज्यों के बीच आपसी विवाद को सुलझाने के लिए कोई स्थायी मेकानिज्म नहीं बनाया गया है। जब जब राज्यों के विवाद उभरते हैं तो वहां कोई आयोग या समिति बना दी जाती है या कोई वार्ताकार नियुक्त कर दिया जाता है, जो सालों तक काम करता रहता है। असल में यह केंद्र और राज्य दोनों के स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व की विफलता है, जो आजादी के इतने बरस बाद भी राज्यों के बीच सीमा या भाषा का विवाद नहीं सुलझ सका है। इसकी वजह से कई राज्य खासकर पूर्वोत्तर के राज्य बारूद के ढेर पर बैठे हैं, जरा की चिंगारी वहां ऐसी आग भड़का सकती है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। असम और मिजोरम के बीच हुई हिंसा एक पूर्व चेतावनी है। इसे समझते हुए केंद्र सरकार को तत्काल पहल करनी चाहिए और राज्यों के आपसी विवाद सुलझाने के लिए ठोस राजनीतिक कदम उठाने चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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