मोदी सरकार, कृषि बिल और अकाली

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर राज कर रहे जिस प्रधानमंत्री का हर दिन उनके जन्मदिन जैसा ही होता है उन्हें अपने 70वें जन्मदिन पर ऐसी सौगात मिलेगी इसकी उन्होंने स्वयं में भी कल्पना नहीं की होगी। उस दिन लोकसभा में दो कृषि बिल को ले कर अकाली दल ने खुलकर उनका जो विरोध किया और अकाली नेता व सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर ने मोदी सरकार से जैसे इस्तीफा दिया वह बेहद चौकाने वाला है। यह वह अकाली दल है जो पहले जनसंघ व फिर भाजपा के साथ दशको तक साथ रहा और दोनों मिल-जुलकर पंजाब में चुनाव लड़ते व सरकारे बनाते रहे।

सदन में सरकार की और कृषि से जुड़े दो बिल पेश किए गए। वे आसानी से ध्वनिमत से पास हो गए। एक बिल किसानों की उपज का, दूसरा बिल उत्पादन की कीमत से जुड़ा है। मगर अब इन नए विधेयकों के खिलाफ कई जगह  किसान विरोध में सड़को पर उतर आए है। इस बिल का लोकसभा में ही विरोध करते हुए अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने कह दिया था कि हरसिमरत कौर मंत्री पद से इस्तीफा दे देंगी।

अकाली दल इन बिलो का सख्त विरोध करता है क्योंकि इन बिलो से पंजाब के 20 लाख किसान प्रभावित होने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इनके कारण 30,000 आढतियो, 3 लाख मंडी मजदूरों व 20 लाख खेतिहर मजदूरों को नुकसान झेलना होगा। अकाली दल किसानो की पार्टी है व इन बिलो पर किसानो के हितो से समझौता नहीं कर सकती हैं।

यहां याद दिला दू कि एक तीसरा बिल आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक मंगलवार को ही पास किया जा चुका हैं। भाजपा की सहयोगी अकाली दल इसका अध्यादेश लाए जाने के समय से ही विरोध करते आए है। इनके बारे में इनके विरोधी कह रहे हैं कि कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक पारित होने के बाद मंडिया खत्म हो जाएंगी व किसानों से न्यूनतम समर्थक मूल्य पर अनाज नहीं खरीदा जाएगा। उनकी मांग हैं कि एक देश एक एमएसपीपर पूरे देश को काम होना चाहिए। जबकि सरकार सफाई दे रही है कि इसके कारण किसान अपना अनाज कहीं भी बेच सकेंगे।

इससे उनकी ऑनलाइन बिक्री हो सकेगी व उन्हें अपनी उपज का अच्छा दाम मिलेगा। जबकि दूसरे बिल मूल्य आवश्यक तथा कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता विधेयक का विरोध इसलिए किया जा रहा है कि किसानों की उपज की कीमत तय करने के लिए कोई प्रणाली ही नहीं हैं। उन्हें डर है कि इससे निजी कंपनियां किसानो का शोषण करने लगेंगी और किसान जमींदार की जगह मजदूर बनकर रह जाएगा। जबकि सरकार का दावा है कि इसके कारण बिचौलिए खत्म होंगे व आपूति चेन तैयार होगी जिसके कारण किसानो की आय बढ़ेगी।

वहीं तीसरा बिल आवश्यक वस्तु (संशोधन) के विरोध की वजह किसानो को यह डर है कि इसके कारण कारोबारी जमाखोरी करेंगे। इससे अनाज की कीमतो में अस्थिरता आएगी व खाद्य सुरक्षा खत्म हो जाएगी। इसके कारण आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी बढ़ जाएगी। वहीं सरकार की दलील है कि यह बिल पारित होने क बाद खाद्य तेल, अनाज, दालें, आलू प्याज सहित तमाम वस्तुएं अनिवार्य वस्तुओं की सूची में से निकल जाएगी। इनका भंडारण होगा व कृषि के क्षेत्र में विदेशी निवेश आकर्षित होगा।

ये सब कुछ उसी तरह की बाते हैं जैसे कि पिछली सरकारे लोगों को लुभाने के लिए करती आई हैं। मनमोहन सरकार ने इसी तरह के वादे अमेरिकी सरकार से परमाणु करार पर करते हुए कहा था कि इसके बाद देश में बहुत सस्ती  बिजली उपलब्ध होगी। जब बाद में भारत ने व्यापार, सैन्य करार, जीएटीटी पर इस्ताक्षर किए थे तब यह कहा गया था कि इसके आने के बाद देश में किसान ही नहीं आम आदमी की जिदंगी में बदलाव आएगा। बाहर से आने वाली मुरगे की टांगे समोसे के भाव पर मिलने लगेगी। मगर कुछ नहीं हुआ। बिजली महंगी होती चली गई। मुर्गा तो सस्ता नहीं हुआ पर समोसा जरूर महंगा हो गया।

प्रधानमंत्री विपक्ष पर किसानो व लोगों को गुमराह करने के आरोप लगा रहे हैं। क्योंकि इस मुद्दे पर विपक्ष एकजुट होकर किसानों के साथ आ खड़ा हुआ है। संसद से लेकर सड़क तक विपक्षी दल व किसान इन बिलों का विरोध कर रहे हैं। भाजपा शासित हरियाणा में भी किसान जमकर विरोध कर रहे हैं। कुछ भाजपाईयों का दावा है कि पूरे देश के किसान इसका सड़क पर उतर कर विरोध नहीं कर रहे हैं। यहां उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आपातकाल के दौरान भी लोग सड़कों पर उतर कर अपना मुखर विरोध नहीं कर रहे थे मगर मौका मिलने पर उन्होंने अपना विरोध जाहिर कर दिया। दलील है कि सरकार ने तो इस सिलसिले में 5 जून को ही अध्यादेश जारी कर दिए थे। मगर तब विपक्ष व कांग्रेसी क्यों चुप रहे? उनका आरोप है कि उनके विरोधी लोगों को बरगलाना चाहते हैं।

अपना मानना है कि इसकी वजह यह है कि लोगों की नजरों में सरकार अपनी साख व विश्वसनीयता खोती चली जा रही है। जो सरकार नोटबंदी से लेकर लॉकडाउन तक के लिए थाली व ताली बजाकर अपना ढि़ढोरा बनवाती आई हो वह इतना बड़ा कदम इतनी चुप्पी से उठा लेगी, लोगों को यह बात हजम नहीं हो रही हैं। इन अध्यादेशों तक की भाषा इतनी मुश्किल  है कि उसके लिए पढ़े लिखे आदमी तक का समझना मुश्किल है। सरकार आम बोलचाल की भाषा में यह समझाने में नाकाम रही है कि यह कानून किस तरह से उसकी रक्षा करेंगे।

अकाली दल ने कहा है कि भले ही उनकी मंत्री ने इस्तीफा दे दिया हो मगर वह राजग सरकार को अपना समर्थन जारी रखेगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पंजाब में अकाली दल सत्ता से बाहर है व वह अपने ही परिवार के कुछ सदस्यो के खिलाफ नशीली दवाओं के मामले की जांच के चलते केंद्र से टकराव नहीं ले सकता है। वैसे भी केंद्र में भाजपा सरकार ने उसके कहने पर ही पंजाब में अपने दल का खुद सफाया करने के कदम उठाए थे व अमृतसर से नवजोत सिंह का टिकट काटकर दिवंगत अरूण जेटली को वहां से उम्मीदवार बनाया था जोकि मोदी की आंधी में भी चुनाव हार गए थे।

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