अब क्या होगा भाजपा का एजेंडा?

भारतीय जनता पार्टी अब आगे क्या करेगी? भारतीय जनसंघ के संस्थापकों ने जिस अनुच्छेद 370 को खत्म करने का मुद्दा बनाया था, उसे नरेंद्र मोदी की सरकार ने सुलझा दिया है।

अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी ने अयोध्या में राममंदिर के निर्माण का जो संकल्प बनाया था, वह भी पूरा हो गया है।

देश में समान नागरिक संहिता की दिशा में भी सरकार धीरे धीरे परंतु ठोस कदमों से आगे बढ़ रही है। तभी सवाल है कि उसके बाद क्या होगा? इसके आगे भाजपा क्या करेगी? जैसा कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मथुरा, काशी के बारे में पूछे जाने पर कहा कि संघ का काम आंदोलन करना नही होता है, वह व्यक्ति निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेगी, वैसे ही क्या भाजपा भी अब धार्मिक आंदोलनों या धार्मिक एजेंडे से तौबा करेगी और किसी भी दूसरे सामान्य राजनीतिक दल के तौर पर काम करेगी?

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भाजपा या इसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ का गठन जिस ऐतिहासिक भूमिका को निभाने के लिए हुआ था ये पार्टियां उसी भूमिका का निर्वहन करती रही हैं। यह ऐतिहासिक भूमिका पूरी होने के बाद धीरे धीरे उसकी प्रासंगिकता क्या खत्म नहीं हो जाएगी? कोई भी पार्टी, व्यक्ति या संगठन इसका अपवाद नहीं होता है। किसी जमाने में संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन दुनिया भर में शांति कायम रखने के लिए किया गया था पर आज इससे अप्रासंगिक संगठन और कोई नहीं है।

कांग्रेस भी आज अप्रासंगिक है तो यह अनायास नहीं हुआ है। आजादी की लड़ाई में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका थी, जिसका उसने बखूबी निर्वाह किया। आजादी के बाद उसे इसका प्रतिफल भी मिला। दशकों तक कांग्रेस के लिए भारतीय राजनीति में कोई चुनौती नहीं रही। उसने आजादी की लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी और इसलिए लोगों को उस पर भरोसा था। जब तक आजादी की लड़ाई लड़ने वाले नेताओं के हाथ में कांग्रेस का नेतृत्व रहा तब तक देश के लोगों ने उस पर भरोसा किया। इंदिरा गांधी उस कड़ी की आखिरी नेता थीं। इंदिरा गांधी के बाद नेतृत्व संभालने वालों ने कांग्रेस को रिइन्वेंट करके आगे के पचास-सौ साल की ऐतिहासिक भूमिका बनाने का प्रयास नहीं किया।

अलग अलग कालखंड में पार्टियां या नेता ऐसे ही अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाते हैं और नेपथ्य में चले जाते हैं। बिहार में सामाजिक न्याय का आंदोलन चलाने में लालू प्रसाद की ऐतिहासिक भूमिका थी। उन्होंने पिछड़े, वंचितों को राजनीतिक ताकत दिलाई। पर उसके बाद उनकी भूमिका खत्म हो गई और वे अप्रासंगिक हो गए।  आज उत्तर प्रदेश में मायावती अपरिहार्य नहीं हैं पर किसी समय दलित चेतना जागृत करने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही थी। ऐसे ही झारखंड राज्य के निर्माण में शिबू सोरेन ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई पर झारखंड बनने के बाद वे कभी भी अपरिहार्य नहीं रहे। ऐसी अनगिनत मिसालें भारत में और दुनिया के दूसरे देशों में मिल जाएंगी।

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नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी ऐसे ही अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा रहे हैं। वे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के अपने पूर्वजों के तय किए गए एजेंडे को पूरा कर रहे हैं। जब सारे एजेंडे पूरे हो जाएंगे तब वे क्या करेंगे? कहने को कहा जा सकता है कि वे आगे के लिए नया एजेंडा पेश कर देंगे। पर यह हथेली पर सरसों उगाने की तरह है।

किसी भी एजेंडे को लोगों के दिलदिमाग में स्थापित होने में समय लगता है और हमेशा उसे पूरा करने के लिए दूसरी पीढ़ी आगे आती है। सो, जरूरी नहीं है कि आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह कोई एजेंडा बनाएंगे उसका लाभ उन्हें ही मिले। यह भी जरूरी नहीं है कि जिस तरह अनुच्छेद 370. राम मंदिर और समान नागरिक संहिता भाजपा की विचारधारा का हिस्सा बन गए थे, उस तरह कोई और एजेंडा भी पार्टी की विचारधारा का हिस्सा बन जाए।

तभी अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने के बाद भाजपा के मौजूदा नेतृत्व के अप्रासंगिक होने का अंदेशा है। हालांकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह इतनी आसानी से नेपथ्य में नहीं जाने वाले हैं। उनके पास भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का एक वृहत्तर एजेंडा हमेशा मौजूद है।

अगर वे छोटे छोटे मुद्दों में उलझने की बजाय यह बड़ा एजेंडा तय करते हैं तो फिर बात अलग होगी। ऐसा लग भी रहा है कि वे जनसंघ व भाजपा के अपने पूर्ववर्तियों के तय किए एजेंडे को जल्दी जल्दी पूरा करके बड़े एजेंडे पर काम करेंगे। वे चुप होकर, शांत होकर बैठने वाले नहीं है। वे अंतिम सीमा तक जाएंगे। जैसा कि जयशंकर प्रसाद ने कहा- इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक जाना, किंतु पहुंचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं।

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