भाजपा का एनआरसी फितूर बहुत घातक!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा सहकारी संघवाद की बात करते हैं। गुजरात का मुख्यमंत्री रहते उन्होंने कांग्रेस विरोधी पार्टियों की राज्यों की सरकारों के साथ मिल कर भारतीय संविधान में वर्णित संघवाद की अवधारणा का पूरा इस्तेमाल केंद्र पर दबाव बनाने के लिए किया था। पर केंद्र में अपनी सरकार के बाद ऐसा लग रहा है कि भाजपा सहकारी क्या कैसे भी संघवाद के सिद्धांत को भूल गई है।

तभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एकतरफा अंदाज में राज्यसभा में ऐलान किया कि सरकार पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी लागू करेगी। यह ऐलान करने से पहले किसी भी राज्य सरकार से या विपक्षी पार्टी से इस बारे में बात करने की जरूरत नहीं समझी गई। संसद में जिस समय अमित शाह ने इसका ऐलान किया उसी समय भाजपा के चहेते पत्रकार रहे और अब राज्यसभा के सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने एक पूरक प्रश्न किया, जिसके जवाब में गृह मंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक भी लाने वाली है।

सो, अब देश के हर नागरिक की पहचान पूछी जाएगी। एक निश्चित तिथि तय की जाएगी और उनसे कहा जाएगा कि वे उस तिथि से पहले से भारत में रहने का दस्तावेज दिखाएं। सरकार तय करेगी कि लोग अपनी पहचान साबित करने के लिए कौन कौन से दस्तावेज दिखा सकते हैं। यह हर दस साल पर होने वाली जनगणना से अलग कवायद है। यह दुनिया के किसी भी देश में हुई किसी भी सरकारी कवायद से बड़ी होगी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से असम में नागरिक रजिस्टर बना है। हैरानी है कि खुद भाजपा अब इस एनआरसी को खारिज करने की मांग कर रही है। जब तीन करोड़ की आबादी वाले एक राज्य में करीब चार साल की मेहनत के बाद एनआरसी बनी है और उसके आंकड़ों में इतनी गड़बड़ी है तो 130 करोड़ की आबादी वाले देश में सटीक एनआरसी कैसे बनेगी?

असल में असम की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को अंदाजा नहीं था कि एनआरसी का अंतिम मसौदा आएगा तो उसमें इतनी बड़ी संख्या में हिंदू नागरिकों के नाम छूट जाएंगे। बड़ी संख्या में हिंदू नागरिक 24 मार्च 1971 से पहले भारत में रहने का सबूत नहीं पेश कर पाए। तो अब भाजपा ने कहना शुरू कर दिया है कि लोगों के नाम गलत तरीके से काटे गए हैं और गलत तरीके से जोड़े गए हैं। सत्तारूढ़ पार्टी ने इस कथित गलती की सजा एनआरसी के समन्वयक प्रतीक हजेला को दे दी है। उनका तबादला असम से बाहर हो गया है। अब सरकार चाहती है कि पूरे देश के साथ साथ असम में फिर से एनआरसी की कवायद हो ताकि नाम छूटने और जोड़ने की कथित गलती को ठीक किया जा सके।

एनआरसी बनाने में असम सरकार के 55 हजार कर्मचारी करीब चार साल लगे रहे। लंबी कवायद के बाद 30 जुलाई 2018 को इसका अंतिम मसौदा जारी हुआ। राज्य के 55 हजार कर्मचारी इस काम में लगे। असम सरकार ने एनआरसी बनाने पर 13 सौ करोड़ रुपए खर्च किए। कुल 6.6 करोड़ दस्तावेजों की जांच हुई। अनेक राज्यों के सरकारी कार्यालयों और स्कूल-कॉलेजों को ये दस्तावेज जांच के लिए भेजे गए थे। सोचें, तीन करोड़ की आबादी वाले राज्य में जांच के लिए साढ़े छह करोड़ से ज्यादा दस्तावेज आए, 55 हजार लोग लगे, 13 सौ करोड़ रुपए खर्च हुए और चार साल का समय लगा तो 130 करोड़ वाले देश में कितने लोग, कितना समय और कितना संसाधन लगेगा?

पर यकीन मानिए पाई-पाई के लिए तरस रहे और भटक रहे इस देश के करोड़ों लोग बावजूद इस सबके राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर या मुसलमान को ठीक कर दिए जाने के नाम पर इस विशाल कवायद का समर्थन करते मिलेंगे। उनके दिमाग में ‘हम’ और ‘वे’ या ‘अन्य’ की दशकों पुरानी ग्रंथि को खुरच कर ऐसे उभार दिया गया है कि जो ‘अन्य’ है उसे खत्म करने या उससे निजात पाने के लिए ‘हम’ कितनी भी बड़ी कुर्बानी देने को तैयार हैं। तभी ऐसा लग रहा है कि सरकार को लोगों के बीच इस मामले पर सहमति बनाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी होगी। लोग नोटबंदी से भी बड़ी मार और परेशानी झेलने के लिए सहज ही तैयार हो जाएंगे। थोड़े समय बाद ही पूरा देश फिर से लाइन में खड़ा मिलेगा, हाथ में अपनी पहचान प्रमाणित करने का दस्तावेज लिए!

मुश्किल यह है कि देश के आधे से ज्यादा हिस्से में विपक्षी पार्टियों की सरकार है। करीब 55 फीसदी आबादी ऐसे राज्यों में है, जहां गैर भाजपा सरकारें हैं। इनमें से ज्यादातर सरकारें इस आइडिया के खिलाफ हैं। उनको इसके पीछे का मकसद पता है इसलिए वे अपने यहां एनआरसी नहीं लागू करना चाहते। भाजपा के सहयोगी नीतीश कुमार से लेकर उसकी धुर विरोधी ममता बनर्जी तक इसके पक्ष में नहीं हैं। फिर भी भाजपा अपने फितूर में और बड़े राजनीतिक फायदे की उम्मीद में यह पहल कर रही है। अगर केंद्र सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो यह देश के लिए बेहद घातक होगा।

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