खतरे की सामयिक चेतावनी

ये चेतावनी तो अत्यंत आवश्यक और सामयिक है, लेकिन सरकार इस पर गौर करेगी, उसकी संभावना नहीं है। ज्यादा संभव यह है कि सत्ताधारी पक्ष इसे वाद-विवाद का मुद्दा बना देगा। डॉ. सिंह ने यह जरूर कहा है कि उन्होंने द हिंदू अखबार में लेख विपक्ष के नेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक नागरिक और अर्थशास्त्र के विद्यार्थी के रूप में लिखा है, लेकिन सत्ता पक्ष इसे शायद ही स्वीकरा करे। बहरहाल, डॉ सिंह ने जो कहा है, वह हकीकत है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मानना है कि मौजूदा सरकार के दौरान देश का सामाजिक ताना-बाना टूटने की वजह से हम आर्थिक सुस्ती का सामना कर रहे हैं। मौजूदा आर्थिक सुस्ती के पीछे संस्थानों पर नागरिकों के घटते भरोसे और सरकार के विश्वास में कमी है। डॉ. सिंह ने लिखा है कि घटते-बढ़ते आंकड़े अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति के गवाह हैं और गहरी हो चुकी अव्यवस्था को दर्शाते हैं। मनमोहन सिंह ने कहा- किसी देश के लोगों और संस्थाओं के बीच आपसी संपर्क से ही अर्थव्यवस्था चलती है। ये आपसी भरोसा और आत्मविश्वास इस सामाजिक संपर्क की नींव होता है, जिसके बलबूते पर अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। इसी आत्मविश्वास में कमी के चलते आज हमारा सामाजिक ताना-बाना टूट गया है। डॉ. सिंह ने ध्यान दिलाया कि उद्योगपतियों में सरकार का डर है, बैंक नए कर्ज देने से घबरा रहे हैं, व्यवसायी लगातार प्रोजेक्ट्स की विफलताओं के बीच नए प्रोजेक्ट्स शुरू नहीं कर रहे हैं। दूसरी तरफ आर्थिक विकास में एजेंट का काम करने वाले नागरिकों में डर बढ़ा है और भरोसा घटा है। सिंह ने कहा कि जब इस तरह का माहौल होता है, तो आर्थिक लेन-देन प्रभावित होता है।

एडम स्मिथ से लेकर तमाम अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि सामाजिक विश्वास आर्थिक विकास का आधार है। अर्थव्यवस्था विकास की पटरी पर दौड़ती रहे, इसके लिए सामाजिक ताने-बाने का बना रहना जरूरी है। ये हकीकत है कि आज लोगों में निराशा है। मीडिया, न्यायपालिका, नियामक और स्वतंत्र संस्थाओं में लोगों का विश्वास काफी कम हुआ है। इस पृष्ठभूमि पूर्व प्रधानमंत्री ने नोटबंदी और नीति निर्माण पर सरकार के रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने ग्राणीम खपत में आई चार दशकों की सबसे बढ़ी गिरावट पर कहा कि वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था खतरनाक स्थिति में है। घरेलू खपत धीमी हो रही है। खपत के समान स्तर को बनाए रखने के लिए लोग अपनी बचत में कमी कर रहे हैं। जीडीपी वृद्धि का पूरा लाभ केवल क्रीमी लेयर को मिल रहा है। ये तमाम बातें खुद सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट हैं। मगर सरकार के लिए शायद अहम नहीं हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री या मंत्री चिंतित नजर नहीं आते।

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