संरक्षणवाद कोई रास्ता नहीं

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने यह कहकर कि आईसीईपी में भारत के भविष्य में शामिल होने की संभावना बाकी है, नई अटकलों को को जन्म दे दिया है। वैसे तो नरेंद्र मोदी सरकार के इस करार से अलग रहने के फैसले की देश में तारीफ हुई, मगर एक हल्के से इसके खिलाफ भी आवाज उठी है। गौरतलब है कि उद्योगपतियों की संस्था सीआईआई की मांग थी कि भारत इस मुक्त व्यापार समझौते में शामिल हो। उधर भारत के इस फैसले वैश्विक व्यापार बनाम संरक्षणवाद की बहस छिड़ गई है। मोदी सरकार इसे किसानों और उद्योगों के हित में उठाया गया कदम बता रही है। तो आलोचक इसे वैश्विक व्यापार विरोधी संरक्षणवाद बता रहे हैं। आरसीईपी यानी क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी करार के विरोधियों में कई विपक्षी राजनीतिक पार्टियां भी थीं। जब सरकार ने इसे ठुकरा दिया, तो विपक्ष इसे अपनी जीत बताया। लेकिन वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो इस कदम से निराश है। उसके मुताबिक क्षेत्रीय व्यापारिक गठबंधन के भावी सदस्य राष्ट्रों ने दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार गुट बनाया हैं। इससे न जुड़ना विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से ही बाहर रहने के बराबर है। कुछ जानकारों के मुताबिक भारत मूलतः तीन चीजों का निर्यात करता है- पेट्रोल एवं लुब्रिकेंट्स, आभूषण और इंजीनियरिंग। इन तीनों में हमें फायदा होता।

बाकी सभी देश इन क्षेत्रों में आयातक हैं। अगर हम संधि में शामिल होते तो हमें कम शुल्क का फायदा मिलता और हमारा निर्यात बढ़ता। लेकिन आयात का क्या होगा? कई जानकारों का कहना है कि भारत के कुल आयात का लगभग 80 प्रतिशत तेल और सोने के आयात हैं। ये सब हम उन देशों से लेते हैं जो आरसीईपी में हैं ही नहीं। एक राय यह जताई गई है कि आर्थिक सुधारों के 28 साल बाद ये कहना कि हम प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार नहीं हैं, आत्मविश्वास में कमी को दिखाता है। आरसीईपी में शामिल नहीं होने के भारत के फैसले के पीछे भारत के बाजार पर चीन के कब्जे का डर रहा है। हकीकत ये है कि चीन के साथ भारत का मुक्त व्यापार करार नहीं होने के बावजूद भारत की चीन पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन ये इस वजह से नहीं है कि हमने चीन को कोई विशेष रियायतें दे रखी हैं। बल्कि वजह यह है कि हमारे उद्योग प्रतिस्पर्धात्मक नहीं हैं। बेहतर होता कि इस मुद्दे पर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने में जुटी सरकार इस दिशा में भी कदम उठाती।

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