बेतुकेपन पर आक्रोश वाजिब

नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्री बेतुकी बात करें, अब इसमें कोई हैरत नहीं होती। लेकिन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने हाल में जो कहा, उस पर लोगों में हिकारत के बजाय आक्रोश ज्यादा पैदा हुआ। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस पर आपत्ति जताई है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि काश प्रदूषण की वजह से लोगों की मौत न होती, लेकिन अफसोस की ऐसा ही होता है।

जावड़ेकर ने बीते हफ्ते संसद में कहा था कि किसी भी भारतीय अध्ययन से नहीं दिखता कि प्रदूषण का लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। उनके इस बयान की देश के पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी कड़ी आलोचना की।

कहा कि यह बिना सोचा-समझे दिया गया बयान है। स्पेन के मैड्रिड चल रहे कॉप 25 में डब्ल्यूएचओ के निदेशक (पब्लिक हेल्थ) डॉ. मारिया नीरा ने कहा कि इस बात के बेहद पुख्ता वैज्ञानिक साक्ष्य हैं। उनके मुताबिक प्रदूषण की वजह से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। डब्ल्यूएचओ ने कहा कि अब प्रभावी कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि कि भारत के कई शहरों में प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ गया है।

डब्ल्यूएचओ से जुड़े कुछ अधिकारियों ने भी कहा है कि इस संगठन ने विश्व के हर हिस्से से प्रदूषण की वजह से स्वास्थ्य पर पड़ने वालें प्रभावों पर तैयार किए गए सैकड़ों हजारों अध्ययनों का आकलन किया है। उसे अभी तक ऐसा कोई अध्ययन नहीं मिला है जो ये दिखाता हो कि प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव नहीं पड़ता। 2015 में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में खुद जावड़ेकर ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और चितरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट द्वारा दिल्ली में बच्चों पर प्रदूषण के प्रभाव पर तैयार की गई रिपोर्ट का हवाला दिया था।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदूषण की वजह से स्कूल जाने वाले दिल्ली के 43.5 फीसदी बच्चों के फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी आती है। तब जावड़ेकर ने कहा था कि पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) प्रदूषण की मात्रा बढ़ने से श्वसन और हृदय संबंधी कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ब्रिटिश पत्रिका लांसेट, विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र तथा अन्य संगठनों की तरफ से कराए गए कई अध्ययनों से पता चलता है कि देश में प्रदूषण के कारण मौतें हो रही हैं। इसके बावजूद जावडेकर ने ऐसा क्यों कहा, इस पर कयास ही लगाए जा
सकते हैं।

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