Vaccination in India : समस्याएं सुलझ नहीं, बढ़ रही हैं! - Naya India
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Vaccination in India : समस्याएं सुलझ नहीं, बढ़ रही हैं!

Vaccination in India Narendra modi

Vaccination in India : इस सप्ताह दो दिन योग दिवस-टीकाकरण महाअभियान का हल्ला था। अगले तीन दिन कश्मीर की हेडलाइंस! दोनों से क्या रियलिटी उभरी? क्या लगा देश टीकाकरण में जुट गया है? क्या माना जा सकता है कश्मीर ‘नॉर्मल’ होने की दिशा में है? टीकाकरण भी अब घसीटता हुआ तो अगले सप्ताह कश्मीर भी ठंडे बस्ते में। ले देकर मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दफ्तर का हर सप्ताह दो-तीन बातों का नैरेटिव-हेडलाइंस बनवाने भर का है ताकि लोग मूर्ख बने रहें कि देखो कितना काम हो रहा है। प्रधानमंत्री लगातार फोकस में कभी कश्मीर, कभी कोरोना, कभी स्कूली परीक्षा का मसला सुलझाते हुए! …. यह सिलसिला सात सालों से चला आ रहा है! लेकिन ईमानदारी से, दिल पर हाथ रख कर सोचें कि 140 करोड़ लोगों के जीवन में समस्याओं के सुलझने का तनिक भी सुख या चैन बना है?

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उलटे समस्याओं का अंबार बनता जा रहा है, समस्याएं इतनी जटिल-रामभरोसे होती जा रही हैं कि पूरी व्यवस्था, सभी सरकारें लाचार-बेबस हैं। तभी महामारी के भारत अनुभव को देख वैश्विक राय में भारत अब ‘असफल राष्ट्र’ (failed State) करार है! ‘अव्यवस्था’ याकि केहोस (chaos) का वह आलम है, जिसके आगे अधिकांश नागरिक लाचार हैं। समस्याओं की संख्या इतनी बढ़ गई है और कोई भी समस्या सुलझ नहीं रही है तो वायरस के डर में जीना है, महंगाई में भी जीना है और वक्त रामभरोसे काटना है।

गिनती करें कि मौजूदा वक्त में किन-किन समस्याओं में लोग घिरे हैं? नंबर एक संकट महामारी है। नंबर दो आर्थिकी का संकट। नंबर तीन सीमा पर चीन के साथ ठनी हुई होने का सकंट। नंबर चार संकट देश के भीतर कलह का है। मतलब देशभक्त बनाम देशद्रोही, राजनीतिक टकराव, किसान-मुस्लिम-अल्पसंख्यक-दलित-वंचित-गरीबों की असहजता और चुपचाप सुलगी बेचैनी का है। यह संकट चुपचाप पकता और फैलता हुआ है। अभी समझ नहीं आ रहा है कि देश की मनोदशा में बड़ी आबादी का मोहभंग और नाराजगी का जो लावा बन रहा है वह भले  फूटे नहीं लेकिन धरातल के नीचे की हलचल से ऊपर के जनजीवन में न भरोसा, न आत्मविश्वास बन सकता है और न वह जज्बा, जिसकी सामूहिकता से देश बना करते हैं।

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Narendra modi

इन चार संकटों को मानवीय, आर्थिक, विदेश नीति और सामाजिक-अंदरूनी नीति के किसी भी छाते के नीचे रखें इनके नीचे कैटेगरी विशेष की समस्याओं का अंबार मिलेगा।

नई समस्या के नाते स्वास्थ्य ढांचे का सुपरफास्ट विकास जरूरी है। साल भर में तीन अरब टीकों की खरीद और उन्हें लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए। महामारी में मरे-अधमरे गरीब-लाचार परिवारों के पुनर्वास, मदद के मानवीय संकट में दायित्व सरकार का है। क्या सरकार का कोई ध्यान है? जान लें यदि तीनों पहलुओं पर समान फोकस से सरकार ने काम नहीं किया तो कोरोना की महामारी सन् 2023-24 तक खींच जाएगी। कल्पना करें यदि चार साल लगातार लोग वायरस की चिंता में, संक्रमण लहर के उतार-चढ़ाव के चक्र में उलझे रहे तो होगा क्या?

Vaccination in India

इतनी ही गंभीर समस्या आर्थिकी की है। इसी में बेरोजगारी, महंगाई, छोटे काम-धंधों-व्यापारियों की बरबादी और विकास गति के गिरने की कई नई पेचिदगियां बनी हैं, जिसमें न सरकार कुछ करती हुई लग रही है और न उसके बस में कुछ है। आर्थिकी के दायरे में ही किसान और गांव-देहात का सकंट पेंडिंग है तो निजी उद्यमियों का नया निवेश नहीं होना, मांग न होना, सरकार का वित्तीय प्रबंध घाटे में जाना, विनिवेश की बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद कोई बिक्री नहीं होना, बैंकों का दिवालिया होना और लोगों के छोटे-छोटे कर्ज में वित्तीय कंपनियों की बरबादी के कई पहलू हैं जो अपने-आप में गंभीर समस्याओं का ढेर हैं। लेकिन सरकार को न सुध है और न समय। ये तमाम समस्याएं दिनोंदिन विकट होती जाएंगी क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के अलावा किसी को ध्यान देने का अधिकार नहीं है।

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सीमा पर चीन के साथ टकराव और चीन की दादागिरी के आगे लाचारगी विदेश नीति का वह नंबर एक संकट है, जिसे सुलझाने की साल भर से कोशिश है लेकिन ढाक के तीन पांत। यहीं स्थिति पाकिस्तान-आंतकवाद की समस्या में है तो अब नई समस्या तालिबान को पटाने की है। नेपाल हो या श्रीलंका या बांग्लादेश, ईरान सभी पड़ोसियों में भारत का ग्राफ नीचे है और चीन का बढ़ता हुआ।

शिक्षा ठप्प है और नई शिक्षा नीति पर अमल ठंडे बस्ते में। केंद्र-राज्य संबंधों में सभी गैर-भाजपाई सरकारों की केंद्र से नाराजगी है। हाल में इतने तूफान आए लेकिन बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र के प्रति क्या रवैया रहा और गुजरात के प्रति क्या, इस अनुभव के अलावा जीएसटी के पैसे व योजनाओं को लेकर केंद्र-राज्य में जो है वह कामचलाऊ है। लोकतंत्र, संस्थाओं, चुनाव और उसमें पैसे, भ्रष्टाचार जैसे मामलों का जिक्र न करें तो अच्छा। अकेले लोकतंत्र के दायरे में भारत जितनी नई समस्याओं, अविश्वास और कमजोरियों का शिकार है उसकी फेहरिस्त बनाएंगे तो निष्कर्ष बनेगा कि ‘फेल देश’ कहलाने का नंबर एक कारण तो लोकतंत्र और उसकी व्यवस्थाओं की नई समस्याओं से है। Vaccination in India Vaccination in India : 

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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