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कैसे दें सरकार का साथ?

ये व्यवस्था एक आम नागरिक की निजता के लिहाज से सही है या गलत? जाहिर है, नागरिक अधिकारों के लिए सचेत कोई व्यक्ति ऐसी और ज्यादा व्यवस्थाओं की मांग सोशल मीडिया कंपनियों से करेगा। और जब सरकार जो व्यवस्था है, उसे भी खत्म करना चाहती है, तो वह उसके विरोध में खड़ा होगा।

जिस समय सोशल मीडिया कंपनियां पूरी विकसित दुनिया में जांच-पड़ताल के दौर से गुजर रही हैं और उनके एल्गोरिद्म को लेकर सवाल गहराते गए हैं, उस समय भारत में नागरिकों अधिकारों के प्रति जागरूक कोई व्यक्ति इनमें से किसी कंपनी का समर्थन करे, यह विडंबना ही है। लेकिन भारत सरकार को जो रुख सामने है, उसके बीच ऐसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता। जब देसी मीडिया को पूरी तरह ‘वफादार’ बना लेने के बाद सरकार सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को भी उस मॉडल पर चलाने की जुगत में है, अगर किसी कंपनी ने इस कोशिश को चुनौती दी है, तो उसका समर्थन करने के अलावा और क्या रास्ता बचता है? मुद्दा सोशल मीडिया मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप और सरकार के बीच खड़े हुए तनाव का है।

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सोशल मीडिया मध्यस्थ कंपनियों के लिए केंद्र सरकार की तरफ से लागू किए गए नए नियमों में से एक प्रावधान को व्हाट्सऐप ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है। ‘ट्रेसेबिलिटी’ कहे जाने वाले इस प्रावधान के तहत व्हाट्सएप जैसी सेवाओं को कई बार भेजे गए संदेशों को सबसे पहले भेजने वाले की पहचान करनी होगी और जांच एजेंसियों को उसके बारे में बताना होगा। इस प्रावधान के जरिए सरकार किन्हें निशाना बनाना चाहती है, यह कोई पहेली नहीं है। हाल का तजुर्बा यही है कि जो सरकार विरोधी हैं, सोशल मीडिया पर उनके पोस्ट मौजूदा सरकार हटवाती है या हटवाने की कोशिश करती है। जबकि अगर कोई सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ऐसी कोई कार्रवाई सरकार समर्थक किसी व्यक्ति या समूह पर करता है, तो उस पर सरकारी एजेंसियों की गाज गिर पड़ती है। व्हाट्सएप ने अदालत को बताया है कि यह प्रावधान असंवैधानिक है और निजता के मूलभूत अधिकार के खिलाफ है। व्हाट्सएप “एन्ड-टू-एन्ड एन्क्रिप्शन” का इस्तेमाल करती है, यानी संदेश भेजने से लेकर पहुंचने की पूरी यात्रा के बीच पूरी तरह से कोड में बदला हुआ होता है। इसकी वजह से उसे सिर्फ या तो भेजने वाले उपकरण से या पाने वाले उपकरण से पढ़ा जा सकता है। बीच में कोई भी संदेश को पढ़ नहीं सकता। यहां तक की कंपनी खुद भी नहीं पढ़ सकती। सवाल यह है कि ये व्यवस्था एक आम नागरिक की निजता के लिहाज से सही है या गलत? जाहिर है, नागरिक अधिकारों के लिए सचेत कोई व्यक्ति ऐसी और ज्यादा व्यवस्थाओं की मांग सोशल मीडिया कंपनियों से करेगा। और जब सरकार जो व्यवस्था है, उसे भी खत्म करना चाहती है, तो वह उसके विरोध में खड़ा होगा।

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