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भारत झूठ से इस स्थिति में पहुंचा!

कोरोना वायरस की महामारी से लड़ाई में भारत असहायता, बेचारगी और दयनीयता की मौजूदा स्थिति में कैसे पहुंचा? भारत को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए कौन जिम्मेदार है? तीन महीने पहले भारत में ‘दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान’ शुरू हुआ था तब प्रधानमंत्री ने एक-एक कर दुनिया के देशों को वैक्सीन अनुदान के तौर पर भेजनी शुरू की थी और अनेक देशों को वैक्सीन का निर्यात किया गया था। देश इस बात पर खुश था कि बारबाडोस या एंटिगा के किसी पूर्व क्रिकेटर ने ट्विट करके प्रधानमंत्री का आभार जताया कि उन्होंने उसके देश को वैक्सीन भेजी। सरकार के मंत्री कई दिनों से बता रहे थे कि भारत ने सौ मिलियन यानी 10 करोड़ लोगों को सबसे कम समय में वैक्सीन लगाई है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब संख्या की बजाय इस बात पर जोर देने को कहा कि कितनी फीसदी आबादी को वैक्सीन लगाई गई, तो सरकार इतनी नाराज हो गई कि स्वास्थ्य मंत्री ने उनको चिट्ठी लिख कर बेहद सख्त लहजे में कहा कि आपकी पार्टी भी तो यह बता रही है कि कितने लाख लोगों को कोरोना हो गया, वे कौन सा प्रतिशत में बता रहें हैं कि कितने प्रतिशत आबादी को संक्रमण हुआ है।

सोचें, एक अच्छे सुझाव के प्रति सरकार का कैसा हिकारत भरा व्यवहार है!

असल में सरकार के इसी झूठे अहंकार ने आज भारत को इस स्थिति में ला दिया है, जहां वैक्सीन अनुदान में बांटने और निर्यात करने वाला देश वैक्सीन आयात करने की स्थिति में आ गया है। आज भारत दुनिया भर के देशों से और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से आग्रह कर रहा है कि वे भारत को वैक्सीन बेचें। उन्हें भारत में वैक्सीन बेचने के लिए आयात शुल्क पर 10 फीसदी छूट देने का ऐलान किया है। रूस की वैक्सीन स्पुतनिक-वी का जल्दी ही भारत में आयात शुरू होगा। दुनिया की इकलौती महाशक्ति अमेरिका ने अपने यहां वैक्सीन स्टोर करके रखा, जो वैक्सीन नहीं लगाई जा रही थी उसकी भी करोड़ों डोज वहां रखी रही यहां तक वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के निर्यात पर भी अमेरिका ने पाबंदी लगा दी। इस वैक्सीन राष्ट्रवाद के लिए दुनिया भर में राष्ट्रपति जो बाइडेन की आलोचना हुई। लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। उन्होंने वैक्सीन की एक डोज देश से बाहर नहीं जाने दी। लेकिन किसान आंदोलन और देश में प्रतिरोध की आवाजों को दबाने की खबरों से बिगड़ी अपनी छवि ठीक करने के चक्कर में प्रधानमंत्री ने भारत से न सिर्फ वैक्सीन का निर्यात होने दिया, बल्कि लाखों डोज अनुदान में बांट दी।

कह सकते हैं कि भारत में वैक्सीन बनाने वाली निजी कंपनियों का पहले से करार था, जिसकी वजह से उन्हें वैक्सीन निर्यात करनी पड़ी। लेकिन अब क्या हो गया, जो ब्रिटेन को ही वैक्सीन का निर्यात रोकने का फैसला हो रहा है! भारत के सीरम इंस्टीच्यूट में जो वैक्सीन बन रही है उसका फॉर्मूला ब्रिटेन ने दिया है लेकिन भारत अब उसी को मैन्यूफैक्चरर करार के तहत वैक्सीन की आपूर्ति रोक रहा है। इस से नाराज ब्रिटेन ने करार तोड़ने के खिलाफ नोटिस दिया है और लाइसेंस रद्द करने की चेतावनी दी है। सोचें, तीन महीने पहले ‘दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान’ शुरू करके और दुनिया को वैक्सीन निर्यात करके या अनुदान में बांट कर गर्व से सीना तानने वाला देश आज वैक्सीन आयात पर निर्भर हो गया है और दुनिया के देशों और कंपनियों से मनुहार कर रहा है वे उसे वैक्सीन आयात करें!

यह दुर्भाग्य है कि देश के प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि अपनी रैलियों में आने वाले लोगों की दूर-दूर तक फैली भीड़ को ही देख पाती है। नेता की दूरदृष्टि ऐसी होनी चाहिए, जिसमें उसे पूरा देश दिखे, कतार में खड़ा आखिरी नागरिक दिखे, उसे वह दिखाई दे जो बाकी लोग नहीं देख पा रहे हैं। लेकिन अफसोस की बात है, जो बाकी लोग देख रहे थे, राहुल गांधी जिस निकट भविष्य को देख कर भविष्यवाणी कर रहे थे वह भी प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के किसी मंत्री को नहीं दिखा। देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों को वैक्सीन लगा कर ही कोरोना को रोका जा सकता है, यह बात दुनिया के अनुभव से सबको पता थी पर भारत सरकार ने ‘दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान’ शुरू करने के बाद वैक्सीन का बंदोबस्त ही नहीं किया। अब सरकार ने वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को साढ़े चार हजार करोड़ रुपए एडवांस दिए हैं। अगर यह काम पिछले साल किया गया होता तो कई कंपनियां इस समय वैक्सीन का उत्पादन कर रही होतीं या जो दो कंपनियां वैक्सीन बना रही हैं उन्होंने ही अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाई होती।

जिस तरह से स्वच्छ भारत और डिजिटल इंडिया आदि की योजनाओं में प्रचार के जरिए वाह-वाही कराई गई उसी तरह के झूठे प्रचार के जरिए सरकार ने कोरोना से लड़ाई में भी अपनी वाह-वाही कराई। पिछले साल अक्टबूर-नवंबर में गर्व के साथ ऐलान कर दिया गया कि भारत ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई जीत ली। सरकार के मुखिया से लेकर सारे मंत्रियों और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के नेताओं तक ने कहना शुरू कर दिया कि भारत ने दुनिया के किसी दूसरे देश के मुकाबले बेहतर ढंग से कोरोना को हैंडल किया है। इस झूठे या अधूरे प्रचार के आधार पर देश के लोगों से कहा जाने लगा कि वे अपनी किस्मत को धन्य मानें कि उन्हें नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसने उन्हें कोरोना के कहर से बचा दिया। लेकिन आज क्या स्थिति है? आज पूरे देश में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचा है। कहां तो अपनी बौद्धिक क्षमता और मेधा के गर्व का प्रचार हो रहा था कि हम दुनिया को वैक्सीन और दवाएं देकर उन्हें बचा रहे हैं और कहां आज ऑक्सीजन जैसी बुनियादी चीज की कमी से अस्पतालों में लोगों की मौत हो रही है! लगभग हर राज्य ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा है और देश के प्रधानमंत्री को ऑक्सीजन की कमी से निपटने के लिए मोर्चा संभालना पड़ रहा है। मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति बहुत बुनियादी स्वास्थ्य जरूरत है। कम से कम इसकी कमी नहीं होनी चाहिए थी और इसकी कमी पूरी करने के लिए प्रधानमंत्री को जोर लगाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी।

कोरोना के खिलाफ जंग जीत जाने, विश्व गुरू हो जाने, दुनिया को मदद पहुंचाने के झूठे या अधूरे नैरेटिव का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि लोग लापरवाह हुए। लोग अपने नेता की बातों पर भरोसा करते हैं, उसके आचरण को देखते हैं और उस हिसाब से काम करते हैं। जब उन्होंने देखा कि नेता रैलियां कर रहे हैं, लाखों की भीड़ को संबोधित कर रहे हैं, भीड़ देख कर गदगद हो रहे हैं, कुंभ का आयोजन हो रहा है, दूसरे सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन हो रहे हैं तो उन्होंने भी मान लिया कि खतरा टल गया। ऐसा नहीं है कि सिर्फ आम लोग इससे लापरवाह हुए। सरकार खुद भी लापरवाह हुई। उसने वायरस की महामारी की एक बुरी लहर झेलने के बाद भी प्रीवेंटिव हेल्थकेयर सिस्टम को बेहतर करने का कोई उपाय नहीं किया। न कहीं अस्पताल बने, न डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों की बहाली हुई और न दवा व वैक्सीन के लिए अनुदान या अग्रिम भुगतान किया गया। यही कारण है कि आज देश के सामने ऑक्सीजन का संकट है, वैक्सीन का संकट, भले सरकार कहे कि रेमडेसिविर जीवनरक्षक नहीं है, फिर भी उसका संकट है, अस्पताल में बेड्स खत्म हो गए, आईसीयू और वेंटिलेटर वाले बेड्स नहीं मिल रहे हैं, श्मशान में जगह कम पड़ रही है और यहां तक कई जगह अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां खत्म हो गई हैं। इन सबके लिए जनता को दोष देने से न तो सरकार की जिम्मेदारी कम होती है और न उसका अपराध कम होता है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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