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Monday, April 19, 2021
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सेवा करना तो सरकार का काम है!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

सरकारी कंपनियों को बेचने के अभियान को अब तक केंद्रीय मंत्री जिस जुमले के जरिए सही ठहरा रहे थे वह फैंसी जुमला बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बोला। उन्होंने कहा ‘गवर्नमेंट हैज नो बिजनेस टू बी इन बिजनेस’। यानी कारोबार करना सरकार का काम नहीं है तो क्या सारे सरकारी बिजनेस को क्रोनी पूंजीपतियों को सौंप देना सरकार का काम है? असल में यह फैंसी लाइन समाजवादी और साम्यवादी सरकारों द्वारा चलाई जाने वाली सरकार नियंत्रित या मिश्रित अर्थव्यवस्था के विरोध में पूंजीवाद के पुरोधा जानकारों की गढ़ी हुई है। उन्होंने इस फैंसी लाइन के जरिए सरकार और कारोबार के बीच एक रेखा खींची और यह बताने का प्रयास किया कि कारोबार करना कोई बहुत अच्छा या जरूरी काम नहीं है, जो सरकार करे। इस लाइन में कहा नहीं गया है पर यह बात अपने आप ध्वनित होती है कि सरकार का काम सेवा करना है। वह कारोबार नहीं करे, सेवा करे, जन कल्याण करे, प्रशासन संभाले! याद करें कैसे प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपना पहला फैंसी जुमला बोला था- मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस! उनका ताजा बोला गया जुमला इसी पुराने जुमले की निरंतरता है।

अगर कोई यह समझ रहा है कि अचानक सब कुछ हो रहा है या समय के साथ गोलपोस्ट बदल रहा है तो वह गलतफहमी में है। असल में पहले दिन से जब ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिम गवर्नेंस’ कहा गया तभी समझ जाना चाहिए था कि इसका अगला कदम ‘गवर्नमेंट हैज नो बिजनेस टू बी इन बिजनेस’ होगा। हालांकि इन दो फैंसी लाइनों के पीछे कोई बहुत सुविचारित योजना नहीं है और न कोई तैयारी है पर इनके सहारे देश की सारी कंपनियों को और देश की सारी संपत्ति को बेच दिया जाएगा। कंपनियों की बिक्री को विनिवेश कहा जाएगा और संपत्तियों की बिक्री को असेट मोनेटाइजेशन यानी संपत्ति का मौद्रीकरण कहा जाएगा।

प्रधानमंत्री ने कहा है कि सरकार एक सौ कंपनियों को बेच कर ढाई लाख करोड़ रुपए जुटाएगी। भारत सरकार के पास कुल तीन सौ कंपनियां हैं, जिनमें कुछ रणनीतिक सेक्टर की हैं और बाकी सामान्य सार्वजनिक उपक्रम हैं। सरकार रणनीतिक सेक्टर में एक चौथाई हिस्सेदारी रखेगी यानी चार में से एक कंपनी सरकारी होगी और बाकी सार्वजनिक उपक्रम बेच दिए जाएंगे। अगर प्रधानमंत्री के आकलन को मानें तो सभी तीन सौ या पौने तीन सौ कंपनियों को बेच कर साढ़े सात लाख या 10 लाख करोड़ रुपए मिल जाएंगे। इससे कुछ ज्यादा पैसा भी मिल सकता है पर उससे देश की सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा? प्रधानमंत्री ने कहा कि गरीबों के कल्याण पर इसे खर्च किया जाएगा पर सवाल है कि 10-20 लाख करोड़ रुपए से देश के एक सौ करोड़ से ज्यादा गरीबों का क्या कल्याण हो जाएगा? जब ये रुपए खर्च हो जाएंगे तब क्या होगा? भारत का सालाना सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी दो सौ लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है, उसमें सब कुछ बेच कर अगर एक साल 10-20 लाख करोड़ रुपए आ भी गए तो उससे क्या हो जाएगा?

सरकारी कंपनियों को बेचने के मिशन को सही ठहराते हुए प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि निजी कंपनियां निवेश ले आएंगी और ‘बेस्ट ग्लोबल प्रैक्टिस’ यानी दुनिया में जो अच्छी चीजें होती हैं वह ले आएंगी। सवाल है कि जो निजी कंपनियां भारत में काम करती हैं क्या उन्होंने बेस्ट ग्लोबल प्रैक्टिस अपनाई है? क्या सरकार ने देश के नागरिकों के बीच कोई सर्वेक्षण कराया है, जिससे पता चला है कि देश के लोग निजी कंपनियों के कामकाज या उनकी बेस्ट ग्लोबल प्रैक्टिस से बहुत संतुष्ट हैं? असलियत यह है कि भारत में ज्यादातर निजी संस्थान और बहुराष्ट्रीय कंपनियां बहुत खराब काम करती हैं। सोशल मीडिया की सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने स्वीकार किया है कि वे प्राइवेसी से लेकर किसी भी मामले में यूरोप या अमेरिका वाले मानक भारत में नहीं लागू करती हैं। जो देशी कारोबारी हैं उनका मॉडल पूरी तरह से शोषण वाला है। उन्हें सरकारी कृपा से ठेके-पट्टे या प्राकृतिक संसाधन हासिल करने हैं और अपने कर्मचारियों का शोषण व देश के नागरिकों को लूटना उनका एकमात्र ध्येय है। देश के ज्यादातर निजी संस्थानों में वेतन, भत्ते और काम की स्थितियां अमानवीय हैं। सरकार ने दो तेजस ट्रेनें चलाने के लिए निजी कंपनी को दी थी। इस कंपनी ने हवाई जहाज की तर्ज पर लड़कियों को होस्टेस बनाया था पर उनका वेतन चपरासी के न्यूनतम वेतन से भी कम था और उन्हें 12 घंटे की ड्यूटी करनी पड़ रही थी। क्या यही बेस्ट ग्लोबल प्रैक्टिस है?

निजी कंपनियों का खराब कामकाज और उनकी लूट-बेईमानी ही वजह है कि दुनिया की तमाम बीमा कंपनियों के भारत के बड़े कारोबारियों के साथ मिल कर बीमा कारोबार चलाने के बावजूद लोगों का भरोसा भारतीय जीवन बीमा निगम पर है। वाहन और स्वास्थ्य बीमा के लिए भी लोग सरकारी कंपनियों पर भरोसा करते हैं क्योंकि निजी कंपनियों का दावा भुगतान का रिकार्ड बहुत खराब है। लोग निजी अस्पतालों में नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि निजी अस्पताल इलाज से ज्यादा लूट का अड्डा हैं। कोरोना वायरस की महामारी में उनकी पोल खुल गई है। निजी अस्पतालों की तरह की निजी शिक्षण संस्थान भी लूट का अड्डा हैं। इनमें कहां बेस्ट ग्लोबल प्रैक्टिस हो रही है? अगर हो रही होती देश भर के लोग इलाज के लिए एम्स के चक्कर नहीं काट रहे होते या दिल्ली यूनिवर्सिटी और जेएनयू में दाखिले के लिए मारामारी नहीं हो रही होती! छात्र आईआईटी में दाखिले के लिए दिन-रात एक नहीं करते। ये सारे सरकारी संस्थान हैं और इनका रिकार्ड दुनिया की किसी भी संस्थान के मुकाबले खराब नहीं है।

अगर देश के सरकारी संस्थानों में काबिल लोग नहीं होते तो ग्लोबल कंपीटिशन के बावजूद सरकारी कंपनियां मुकाबले में नहीं टिकतीं। बीमा से लेकर बैंकिंग और शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और इस्पात से लेकर स्पेस तक में देश की सरकारी संस्थाओं ने कमाल का काम किया है। टाटा और जिंदल को आज भी सेल का मुकाबला करने में मुश्किल आती है। भारत का इसरो अमेरिका के नासा के मुकाबले का संस्थान है और 1948 में बना परमाणु ऊर्जा आयोग भी दुनिया के किसी दूसरे देश के परमाणु संस्थान से कमजोर नहीं है। इसलिए यह कहने का कोई आधार नहीं है कि सरकारी संस्थान ठीक काम नहीं करते हैं और निजी संस्थान बेस्ट ग्लोबल प्रैक्टिस ले आएंगे तो उससे लोगों का भला होगा।

ध्यान रहे लोगों का भला करना कभी किसी निजी संस्थान का ध्येय नहीं हो सकता है। उसका एकमात्र ध्येय अधिकतम मुनाफा कमाना होता है। इसके लिए वे साम, दाम, दंड, भेद के सारे उपाय आजमाते हैं। इसके उलट सरकारी कंपनियां मुनाफा कमाते हुए भी लोगों की सेवा को ध्येय मानती हैं। सरकार को इस बात को समझना होगा कि उसका काम भले कारोबार करना नहीं है पर सेवा करना उसका मूल काम है। और लोगों की सेवा सिर्फ पुलिस, नगर निगम, आय कर विभाग, ईडी, सीबीआई, उत्पाद विभाग आदि यानी डंडा चलाने और कर वसूलने वाले विभागों से नहीं होती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि वे चाहते हैं कि लोगों के निजी जीवन में सरकार का न्यूनतम दखल हो इसलिए सरकारी कंपनियां बेची जाएंगी। सोचें, यह क्या तर्क है? क्या कोई समझा सकता है कि देश की जो कंपनियां बेची जा रही हैं, उनका देश के आम लोगों के जीवन में क्या दखल है? असल में सरकारी तेल कंपनी, स्टील कंपनी, शिपिंग या लॉजिस्टिक कंपनी, बिजली या गैस कंपनी का लोगों के निजी जीवन में कोई दखल नहीं है। जैसे कोई निजी कंपनी काम करती है वैसे ही ये भी काम करती हैं। उलटे इनके उत्पाद और सेवाएं अच्छी होती हैं और निजी कंपनियों से सस्ती होती हैं।

इसके उलट लोगों के जीवन में सरकारी कर्मचारियों के जरिए सबसे ज्यादा दखल सरकार का है। पुलिस, नगर निगम, आय कर विभाग, ईडी, सीबीआई, कस्टम, सेल्स टैक्स आदि का ज्यादा दखल लोगों के जीवन में है और लोगों की लगभग सभी समस्याएं इनकी वजह से हैं। सरकार को इनका दखल कम करना चाहिए। लोगों को इंडियन ऑयल के पंप से पेट्रोल खरीदने में कोई दिक्कत नहीं है पर पुलिस और नगर निगम के कर्मचारियों की मनमानी और रिश्वतखोरी से सबको समस्या है। सरकार डंडा चलाने वाले अपने कर्मचारियों को ठीक करे और इंडियन ऑयल को अपने तरीके से चलने दे।

घाटे और सरकारी खजाने पर बोझ का तर्क भी सरकारी कंपनियों को बेचने के लिए सही नहीं है क्योंकि सरकार जिन कंपनियों को बेचने जा रही है उनमें से ज्यादातर कंपनियां मुनाफा कमा कर दे रही हैं। दूसरी बात यह है कि सरकार की सारी कंपनियां मुनाफा कमाने के लिए नहीं बनाई गई हैं, बल्कि उनका पहला ध्येय लोगों की सेवा करना है। जैसे भारतीय रेलवे लोगों की सेवा के लिए है लेकिन सरकार उससे मुनाफा कमाने की सोचने लगी है। यह लोक कल्याणकारी सरकार की सोच नहीं हो सकती है।

असल में सब कुछ बेच देने के पीछे सरकार का मकसद कुछ और है, जो बुधवार को प्रधानमंत्री की बातों से जाहिर हो गया। उन्होंने कहा कि सरकार कंपनियों को सिर्फ इसलिए चलाती नहीं रह सकती है कि वे विरासत में मिली हैं या किसी की बहुत प्रिय परियोजना हैं। यहीं असली बात है। चूंकि विरासत कांग्रेस की सरकारों की है और ज्यादातर सरकारी कंपनियां देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू या उनके परिवार के लोगों की प्रिय परियोजना हैं। इसलिए इन सबको बेच कर खत्म करने की सोच है ताकि आने वाली पीढ़ियों को कोई यह नहीं बता सके कि नेहरू या आजादी के बाद बनी कांग्रेस सरकारों का देश में क्या योगदान था। हो सकता है कि आजादी और लोकतंत्र को कमजोर करने के पीछे भी यही सोच हो क्योंकि आजादी और लोकतंत्र में भी कांग्रेस और उसकी शुरुआती सरकारों का बड़ा योगदान रहा है।

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