nayaindia Modi Subhash Bose Savarkar मोदी के सुभाष बोस न की सावरकर!
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मोदी के सुभाष बोस न की सावरकर!

उफ! संघ परिवार और उसके हिंदू। कैसे मनुष्य! ये धारे हुए हैं सावरकर को और मूर्तियां लगा रहे हैं सरदार पटेल व सुभाष चंद्र बोस जैसे कांग्रेस अध्यक्षों की! कैसे हिंदू हैं, जो सोचते कुछ हैं और करते कुछ हैं। अमित शाह अपने घर के ड्रांईग रूम में सावरकर की तस्वीर लगाए हुए हैं न की सुभाष बोस की। लेकिन इंडिया गेट पर बोस की मूर्ति के अनावरण पर तालियां बजाते हैं। सोचते होंगे मोदीजी का पॉपुलिस्ट पैंतरा यूपी में वोट डलवाएगा। सोचें, संघ परिवार का दिन-रात सेकुलरों के खिलाफ प्रलाप और ठीक विपरीत घोर सेकुलरवादी, लेफ्टिस्ट सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति इंडिया गेट की उस जगह पर, जिसे लेकर पचास-साठ साल से बहस थी कि वहां गांधी की मूर्ति लगनी चाहिए या नहीं? उस नाते भले संघ परिवार का हिंदू सोचे कि गांधी की जगह सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति का फैसला मास्टरस्ट्रोक! आखिर इंडिया गेट और वहां का सैनिक स्मारक आधुनिक भारत राष्ट्र-राज्य, उसकी आत्मा की लौ का स्थान है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों का नमन केंद्र है। अब आगे हर पर्व के दिन राष्ट्र गांधी की नहीं, बल्कि सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति को नमन करते हुए होगा! Modi Subhash Bose Savarkar

नरेंद्र मोदी ने प्रतिमा अनावरण के वक्त यह जो तर्क दिया है वह सामान्य नहीं कि आजादी के बाद महान व्यक्तित्वों के योगदान को मिटाने का काम हुआ और अब डंके की चोट गलतियों को सुधारा जा रहा है। जाहिर है इंडिया गेट पर गांधी की जगह सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाना योगदान का नया बैलेंस बनाने का फूहड़पना है। क्यों? पहली बात सुभाष चंद्र बोस को देश ने वीर सावरकर की तरह डंप, हाशिए में नहीं डाला हुआ था। सरदार पटेल और सुभाष चंद्र बोस दोनों लोगों के दिल-दिमाग में मिटे हुए नहीं थे। ये दोनों उतना ही मान पाए हुए थे जो कांग्रेस और उसके नेताओं के योगदान के क्रम में था। गांधी नंबर एक पर, नेहरू नंबर दो, सरदार पटेल नंबर तीन और नंबर चार पर सुभाष चंद्र बोस देश की आजादी की लड़ाई की कहानियों, पुराण, इतिहास और लोकमान्यता में स्थापित थे और हैं व रहेंगे। बेतुकी बात है और यह कभी नहीं होगा कि कांग्रेस देश के इतिहास में गांधी की बजाय सुभाष चंद्र बोस या नेहरू की जगह सरदार पटेल ऊपर-नीचे हों। चारों मूर्तियों का अपना स्थान व मान है तो वह कांग्रेस के कारण और इतिहास के सत्य से है।

तब भला नरेंद्र मोदी और संघ परिवार क्यों इतिहास और मूर्तियों के मान-सम्मान को ऊपर नीचे करने की जुगत में हैं? इसके बजाय वह क्यों अपनी मूर्तियों मसलन सावरकर, डॉ. हेडगेवार, गुरू गोलवलकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी या हिंदू राजनीतिक दर्शन के पूर्वज चाणक्य की मूर्तियां स्थापित नहीं कर रहा है? सोचें कि संघ परिवार, नरेंद्र मोदी, अमित शाह और मोहन भागवत के लिए प्रातःस्मरणीय चाणक्य, वीर सावरकर हैं या गांधी व सुभाष चंद्र बोस? राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पदाधिकारियों, प्रचारकों, स्वंयसेवक हिंदुओं की परम पूजनीय मूर्तियों में, इनके कार्यालयों में रखी किताबों में, इनके बौदि्धक प्रमुखों, विचारकों-लेखकों-स्तंभकारों के दिल-दिमाग को गांधी-बोस की मूर्तियों, किताबों और उनके धर्मनिरपेक्ष व्यवहार से प्रेरित किया हुआ है या सावरकर, गुरू गोलवरकर के विचारों ने? तब यह सब क्यों?जवाब में समझ आएगा कि संघ परिवार दोहरा जीवन जीते हुए हैं। कथनी क्या और करनी अलग!

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इसलिए सात साल के मोदी राज का सत्व-तत्व है कि भाजपा अपने आपको कांग्रेस में बदलने के मिशन मोड में काम करते हुए है। कांग्रेस के खिलाफ सात साल के प्रोपेंगेडा में भाजपा जहां गांधी-नेहरू परिवार का खूंटा खत्म करने की हरसंभव कोशिश में हैं वही खुद अपने आपको कांग्रेस में बदलती हुई है। इसलिए क्योंकि कांग्रेस मोटा-मोटी हिंदुओं के जीने का सहज प्रतिनिधि स्वभाव है। तभी मोदी-अमित शाह हेमंता बिस्वा से अमरेंदर सिंह आदि असंख्य कांग्रेसियों के सहारे भिन्नताओं के झंझट का रास्ता तलाशे हुए हैं। ये माने हुए हैं कि कांग्रेस बन कर और उसकी गांधी-पटेल से सुभाष चंद्र बोस की विरासत पर कब्जा करके राजनीति को टिकाऊ बनाना आसान होगा। दशकों की उन कुंठाओं और बदनामी से बाहर निकला जा सकेगा, जिसमें संघ परिवार जीता आया है।

नोट रखें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत से ले कर संघ परिवार का हर हिंदू इस कुंठा और भय में जीता हुआ होगा कि हमने यदि अपने प्रणेता सावरकर की मूर्ति लगाई तो बदनाम होंगे। मन की भीरूता के हिंदू चरित्र का यह वह संकट है, जिसके चलते सात साल की हिंदूशाही में सावरकर, गुरू गोलवलकर आदि किसी भी संघ प्रणेता की नई दिल्ली में मूर्ति का साहस नहीं हुआ!

Subhash Chandra Bose truth

अपना मानना है सदियों की गुलामी ने हिंदू चरित्र को ऐसा भयाकुल बनाया है कि राजा हो या रंक हर व्यक्ति सत्य से मुंह चुराता है। तभी संघ परिवार और नरेंद्र मोदी, अमित शाह में हिम्मत नहीं जो वे सपने में ख्याल बनाएं कि 75 वर्षों में यदि महान व्यक्तित्वों के योगदान को मिटाने का काम हुआ तो उसकी नंबर एक मिसाल सावरकर हैं। जैसे संघ परिवार, नरेंद्र मोदी और अमित शाह दशकों खलनायक और अछूत माने गए तो वैसे ही हिंदू, हिंदुत्व राजनीति के प्रणेता सावरकर भी अछूत रहे।  

मैं सावरकर और सुभाष चंद्र बोस की तुलना नहीं कर रहा हूं। दोनों के प्रति मेरे मन में सम्मान के भाव का मूल आधार इनके निर्भयी-साहसी जीवन का है। बतौर नस्ल हिंदुओं की दुर्दशा, गुलामी और तमाम तरह की दुर्बलताओं का जड़ कारण मैं, क्योंकि भयाकुलता का समझता हूं तो इसलिए सुभाष चंद्र बोस और सावरकर दोनों साहस व निर्भयता के महानायक। लेकिन सुभाष चंद्र बोस से अधिक सावरकर की वीरता इसलिए भारी है क्योंकि बोस ने समझ की दुर्बलता में हिटलर की संगत बनाई थी। भारत के हम लोगों को अनुमान नहीं है कि मानवता के इतिहास के दुसरे महायुद्ध में हिटलर के नात्सी विचार की कैसी वैश्विक भर्त्सना है। हिटलर और सुभाष चंद्र बोस का संग और उनके फोटो भी कारण थे, जिनके चलते पंडित नेहरू या आजाद भारत उनको ले कर संकोच में रहा। प्रधानमंत्री मोदी और उनके सलाहकार अभी नहीं बूझ रहे हैं कि इजराइल-यूरोप-अमेरिका आदि के राष्ट्र नेता दिल्ली आएंगे तो इंडिया गेट पर सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा पर कैसे सकुचाएंगे। इतिहास का सत्य याकि हिटलर-सुभाष चंद्र बोस की तस्वीरें, उनका संग मिट नहीं सकता है। तभी असंभव है जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भारत सरकार जर्मनी, यूरोप में सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगवाना चाहें तो वहां उसे माना जाए।

ऐसा कोई कलंक सावरकर के वीर व्यकित्व में नहीं है। सरकार उनकी मूर्ति फ्रांस या लंदन में लगवाना चाहे तो वहां एलर्जी नहीं दिखेगी लेकिन सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति के साथ क्योंकि हिटलर से रिश्ते का सत्य है तो वह इंडिया गेट पर मूर्ति लगने से मिट नहीं सकता। न ही यह सत्य मिटेगा कि सुभाष चंद्र बोस लेफ्टिस्ट, सेकुलर थे और सांप्रदायिक राजनीति के घोर विरोधी!

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तब हिंदू राजनीति के बूते वोट पकाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए क्यों सुभाष चंद्र बोस ऐसे पूजनीय हुए? जवाब एक ही है और पोपुलिस्ट राजनीति का है। जो लोगों को रूचे, जो लोगों के दिमाग में जादू बनाए, जिससे लोग दिवाने हों वह नरेंद्र मोदी की राजनीति का ब्रह्म मंत्र है। उन्हें आज वोट चाहिए, उन्हें यूपी जीतना है, 2024 जीतना है तो चौबीसों घंटे हिंदू कैसे पटे रहें इसका जादू-टोना बनाना है। हिंदू चरित्र इतिहास और भविष्य की नहीं सोचता है, बल्कि वह आज, वर्तमान को जीने की लोक आस्था की हवा में जीता है। हवा माफिक कभी संतोषी माता की हवा में, कभी साईबाबा की और कभी गांधी और कभी सुभाष चंद्र बोस की किंवदतियों में तो संघ परिवार और नरेंद्र मोदी के लिए यह आसान है कि जो बने बनाए लोकमान्य चेहरे हैं, मूर्तियां हैं उन्हीं का टेकओवर करके उनका नया मंदिर बना दें। रामजी का मंदिर बनाएं या सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति स्थापित हो, यह इसलिए पॉपुलिस्ट राजनीति में सटीक है क्योंकि लोक विश्वास में चेहरे पहले से ही स्थापित हैं। सोचें, यदि मोदी-शाह इंडिया गेट पर सावरकर की मूर्ति लगाते तो उनकी लोक मान्यता बनवाने के लिए उन्हें कितने पापड़ बेलने पड़ते। और इतना साहस और ऐसी प्रतिबद्धता यदि हिंदू चरित्र में होती तो हिंदुओं की वह दुर्दशा ही नहीं होती जैसी है! 

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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