Most successful olympics india खेल के तपस्वियों को सलाम!
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खेल के तपस्वियों को सलाम!

Most successful olympics india नीरज चोपड़ा को सलाम! रवि दहिया और बजरंग पूनिया को भी सलाम! पीवी सिंधु, मीराबाई चानू और लवलिना बोरगोहेन को नमन! मनप्रीत सिंह के नेतृत्व में खेली भारतीय हॉकी टीम को नमन! इनमें से छह खिलाड़ियों ने इंडिविजुअल इवेंट्स में भारत को पदक दिलाया और भारतीय हॉकी टीम ने 41 साल बाद पदक जीत कर एक ठहर गए सिलसिले को फिर से शुरू किया। इंसानी क्षमता, उसकी साधना, उसकी एकाग्रता के सर्वोच्च प्रदर्शन यानी ओलंपिक मुकाबले में पदक जीतना इन खिलाड़ियों को सर्वश्रेष्ठ बनाता है। इसलिए इन सबको नमन। पदक से चूक गई रानी रामपाल के नेतृत्व वाली महिला हॉकी टीम को सलाम और पदक से चूकी दीपिका कुमारी, मैरीकॉम, विनेश फोगाट, अदिति अशोक को भी सलाम। इन खिलाड़ियों ने टोक्यो ओलंपिक में जिस कौशल और जज्बे का प्रदर्शन किया है वह बेमिसाल है और आने वाले बरसों में इस बुनियाद पर उपलब्धियों की एक भव्य और चमकदार इमारत खड़ी होनी है।

नीरज चोपड़ा भारत के पहले खिलाड़ी बन गए हैं, जिन्होंने एथलेटिक्स यानी ट्रैक एंड फील्ड की स्पर्धा में भारत को पदक दिलाया है और वह भी स्वर्ण पदक! संभवतः नीरज चोपड़ा को भी अंदाजा नहीं होगा उन्होंने भारत के 140 करोड़ लोगों के लिए क्या हासिल किया है? उन्होंने भारत को वह जीत दिलाई है, जिसका यह देश दशकों से इंतजार कर रहा था। अब भारत के पास एक विरासत है, एक मिसाल है, एक मशाल है, जो आगे-आगे चलेगी! भारत के लिए यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे मानव सभ्यता के विकास में आग या पहिए का आविष्कार था! जैसे नील आर्मस्ट्रांग का चांद पर पहला कदम रखना था! जैसे शेरपा तेनजिंग नोर्गे का एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचना था! जैसे कुछ भी पहला होना होता है, नीरज चोपड़ा की यह जीत वैसी ही है। इस जीत की कहानी लाखों-करोड़ों युवाओं को असंभव को साधने के लिए प्रेरित करेगी!

पदक जीतना नीरज चोपड़ा का निज उद्यम है लेकिन यह इंसान के सामर्थ्य का चरम है, उसकी एकाग्रता और तपस्या का सर्वोच्च शिखर है, यह सर्वोत्तम है! यह उपलब्धि इतनी बड़ी है कि सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद उनके अंदर श्रेष्ठ होने का भाव नहीं भरती है, उनमें अहंकार नहीं पैदा करती है, बल्कि विरोधी के प्रति भी सम्मान का भाव जगाती है, प्रतिस्पर्धी के बारे में भी अच्छा सोचने के लिए प्रेरित करती है। तभी नीरज चोपड़ा को जर्मन एथलीट जोहानेस वेटर के लिए बुरा लगा। जोहानेस वेटर भाला फेंकने वाले विश्व चैंपियन एथलीट हैं, जिन्होंने 97 मीटर तक भाला फेंका है। उन्होंने ओलंपिक से पहले कहा था कि नीरज उनको छू भी नहीं पाएंगे। दुर्भाग्य से वेटर खराब प्रदर्शन और दो फाउल की वजह से बाहर हो गए। फिर भी नीरज ने कहा कि उनको वेटर के लिए बुरा लगा।

नीरज ने एथलेटिक्स में मिला पहला पदक इस देश के संभवतः सबसे महान एथलीट मिल्खा सिंह को समर्पित किया और इस तरह उन्होंने अपनी इस उपलब्धि को 60 साल पुरानी उस असफलता से जोड़ दिया, जिसका बोझ हम भारतीय छह दशक से अपने सीने पर ढो रहे थे! 1960 के रियो ओलंपिक में सेकेंड के सौवें हिस्से के अंतर से मिल्खा सिंह पदक से चूके थे, उस हार का बोझ कितना भारी था, इसे मिल्खा सिंह के साथ साथ पूरा देश महसूस करता रहा। 1984 के लॉस एंजिलस ओलंपिक में पीटी उषा एक सेकेंड के सौवें हिस्से के अंतर से कांस्य पदक से चूकी थीं। उसका बोझ भी हम भारतीय चार दशक से अपने सीने पर महसूस कर रहे थे। नीरज चोपड़ा ने एक झटके में वह बोझ सबके सीने से उतार दिया। यह सिर्फ उनकी उपलब्धि नहीं है और उनको मिला पदक सिर्फ सोना नहीं है, वह करोड़ों भारतीयों के लिए एक प्रेत बाधा से मुक्ति है! वह हर भारतीय के उन्मुक्त आकाश में उड़ने की आजादी है! पूरा जहान हासिल करने की प्रेरणा है!

Olympic

तभी पीटी उषा ने नीरज चोपड़ा को धन्यवाद दिया और कहा कि उनके इस बेटे ने उनके अधूरे सपने को पूरा कर दिया है। थोड़े ही दिन पहले मिल्खा सिंह अपने अधूरे सपने के साथ दुनिया से विदा हो गए, लेकिन आसमान में कहीं से वे अगर नीरज चोपड़ा को देख रहे होंगे तो जरूर उन्हें आशीर्वाद दे रहे होंगे। सचमुच ओलंपिक में एथलेटिक्स का पदक भारत के लिए एक अधूरा सपना था! भारत का पूरा ओलंपिक अभियान एक ऐसा इंद्रधनुष था, जिसमें सारे रंग नहीं थे! चोपड़ा ने उसमें सारे रंग भर दिए हैं! वे एक महान एथलीट के साथ साथ ‘जय जवान और जय किसान’ का सर्वोत्तम प्रतीक हैं। आप सोशल मीडिया में खोजें तो चारों तरफ नीरज की सूबेदार की वरदी पहने हुए तस्वीर मिलेगी और साथ ही कंधे पर कुदाल रखे उनके पिता की तस्वीर भी मिलेगी। कंधे पर कुदाल रखे पिता के साथ गर्वोन्नत नीरज चोपड़ा की तस्वीर, मौजूदा समय की संभवतः सबसे खूबसूरत तस्वीर है!

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टोक्यो ओलंपिक अब तक संयोग से पदक जीतते रहे भारतीयों के प्रदर्शन में निरंतरता आने का भी वह मुकाम है, जिसका बरसों से इंतजार था। यह अनायास नहीं है कि बजरंग पूनिया ने कुश्ती में कांस्य जीतने के बाद अपने गुरू सुशील कुमार को याद किया। सुशील भारत के पहले खिलाड़ी थे, जिन्होंने लगातार दो ओलंपिक में पदक जीते। उससे पहले भारतीय खिलाड़ी जो पदक जीतते थे उसमें संयोग का फैक्टर सबसे बड़ा होता था। जैसे 2004 के ओलंपिक में अंजलि भागवत पदक की दावेदार थीं और पदक ले आए राज्यवर्धन राठौड़। वैसे ही 2008 में पदक के दावेदर थे राठौड़ लेकिन पदक ले आए अभिनव बिंद्रा!

संयोग के इस चक्र को पहली बार सुशील कुमार ने अपने प्रदर्शन की निरंतरता से तोड़ा था। उन्होंने साबित किया था कि उनकी पहली जीत संयोग से नहीं हुई थी। वह दिन भी भारत के खेल इतिहास में मील का पत्थर था। तभी उनके शिष्य बजरंग पूनिया ने सेमीफाइनल की हार को पीछे छोड़ कर कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में जिस अंदाज में कुश्ती लड़ी वह इस ओलंपिक की सबसे खूबसूरत चीजों में से एक है। पूनिया ने कांस्य के मुकाबले में अजरबैजान के पहलवान को 8-0 से हराया और यह साबित किया कि वे भले सेमीफाइनल में हार गए थे लेकिन उस हार को उनकी अंत परिणति न समझा जाए। वे वापसी करेंगे। इसी जुनून का परिणाम है, जो पीवी सिंधु लगातार दूसरी बार पदक जीतीं और तीसरी बार जीतने को लेकर आश्वस्त हैं। सिंधु ने भी कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में चीन की खिलाड़ी को सीधे सेट्स में महज 52 मिनट में हरा दिया और यह दिखाया कि उनका कांस्य पदक जीतना नहीं, बल्कि सेमीफाइनल में उनका हारना एक संयोग था। बजरंग पूनिया और पीवी सिंधु खेलों के अंतरराष्ट्रीय फलक पर भारत का समय आ जाने का प्रतीक चेहरा हैं!

इसी तरह 41 साल के बाद हॉकी में भारतीय पुरुष टीम का कांस्य जीतना एक सोते हुए शेर के जग जाने की तरह है। ओलंपिक में आठ बार स्वर्ण जीत चुकी भारतीय हॉकी टीम के लिए यह दूसरी स्वर्णिम पारी की शुरुआत है। पुरुष और महिला दोनों हॉकी टीमों ने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया। महिला हॉकी टीम पहली बार सेमीफाइनल में पहुंची तो पुरुष हॉकी टीम 1980 में मास्को में हुए अधूरे ओलंपिक के बाद पहली बार पदक जीतने में कामयाब हुई। इस सफलता के पीछे खिलाड़ियों के अनथक परिश्रम और कौशल के साथ साथ ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का सबसे बड़ा योगदान है। प्रचार पसंद नेताओं के मौजूदा दौर में पटनायक ने चुपचाप, बिना किसी प्रचार के हॉकी की पुरुष और महिला दोनों टीमों को स्पांसर किया और उनके प्रशिक्षण के लिए हर साधन जुटाए। उसका नतीजा आज सबके सामने है।

PV Sindhu loses in semi-finals

कह सकते हैं कि यह ओलंपिक कई मायने में भारत के लिए बेहद खास रहा है। नीरज चोपड़ा ने एथलेटिक्स में देश को पहला पदक दिलाया और अनंत आकाश के दरवाजे खोल दिए तो पीवी सिंधु ने लगातार दो ओलंपिक में पदक जीत कर प्रदर्शन की निरंतरता कायम रखने की राह दिखाई। कुश्ती में सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त की परंपरा को बजरंग पूनिया और रवि दहिया जैसे पहलवानों ने आगे बढ़ाया है तो लवलिना बोरगोहेन के रूप में देश को मैरीकॉम का उत्तराधिकारी मिला है। टोक्यो में भारत के लिए पहला पदक जीतने वाली मीराबाई चानू ने कर्णम मल्लेश्वरी की परंपरा को आगे बढ़ा कर उम्मीदों की नई लौ जगाई है। इन सभी खिलाड़ियों को सलाम कीजिए, उनका सजदा कीजिए, उनकी आरती उतारिए, उनकी जय बोलिए! यह भारत का स्वर्णिम क्षण है, इसे संजो कर रखिए!

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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