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Sunday, April 18, 2021
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हम सिर्फ संयम ही सीखते है!

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हर रोज की तरह जब नहा धोकर टीवी खोला तो पता चला कि मुंबई के एक बड़े भाग के ग्रिड फेल हो जाने के कारण बिजली की सप्लाई नहीं हो रही है। वहां की जीवन रेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेने् रास्ते में ही ठहर कर रुक गई है। सड़कों पर ट्रैफिक लाइट न जलने के कारण यातायात व्यवस्था ठप्प पड़ गई है। दफ्तरों से लेकर अस्पतालों तक को बिजली न आने की मार झेलनी पड़ रही है। ऐसे में जाने माने अभिनेता अमिताभ बच्चन का एक ट्वीट पढ़ बताया गया कि वे कह रहे थे कि लोग परेशान न हो, संयम बरते और लोग संयम बरतते हुए रेलवे स्टेशनों से लेकर सड़क तक पर चुपचाप खड़े हुए संयम बरत रहे थे।

यह सब देखकर याद आया कि हम जिस देश में रहते हैं वहां हमें बचपन से ही संयम बरतना सिखाया जाता है। वह संयम जो कि हम लोग सदियों से बरतते आ रहे हैं। जब छोटा था व कानपुर में रहते हुए पहली बार मुंबई गया था तो मेरे जीजाजी ने बताया था कि वहां बिजली कभी नहीं जाती है व यहां देश की सबसे सस्ती महज 25 पैसे प्रति यूनिट है। वह मेरे लिए बहुत अचरज भरी बात थी। क्योंकि हम लोग तो बचपन से ही बिजली की कमी का अनुभव करते आये थे। उसके बिना रहने के इस कदर आदि बन गए थे कि वह हमारे लिए कभी नहीं आनंद का पर्याय बन गई।

हमारे शहर में मई-जून की झुलसती गर्मी में भयंकर लू चला करती थी। तब घरों में आमतौर पर एसी तो क्या कूलर तक नहीं हुआ करते थे। उन झुलसती गर्मी में हम लोग राशन की दुकानों पर पसीने से तरबतर होने के बावजूद दुकान खुलने की प्रतीक्षा में लंबी लाइने लगाया करते थे। हम लोग अपनी बारी आने पर गीली व गंदी चीनी चुपचाप ले लेते थे। राशन लेने के पहले कई दिनों तक दुकानों पर टंगी यह तख्ती देख देख कर थक जाते थे कि सामान खत्म है। राशन लेने गए हैं पर कभी भी दुकानदार से चूं नहीं करते।

यह नहीं पूछते थे कि राशन आने में इतना समय कैसे लग गया। हम राशन मिलने पर अपने पर किया जाने वाला उसका व सरकार का अहसान मानते थे। जब रात को बिजली चली जाती तो हम मानते कि यह समस्या नहीं हमारे लिए अवसर है व हमें इस अवसर को उपलब्धि में बदल देना चाहिए व बिजली जाने पर पढ़ना लिखना छोड़कर खेलने का पूरा फायदा उठाना चाहिए।

आज हमारे प्रधानमंत्री अवसर को उपलब्धि में बदलने की जो बात कर रहे हैं व नारा दे रहे हैं उसे तो हमने बचपन में ही अपना लिया था। असल में हमने बचपन से सीखा है कि हमारा शासक कोई गलती नहीं कर सकता व मजबूत को हमारे साथ मनचाहा करने का पूरा अधिकार है। हमें उसका विरोध नहीं करना चाहिए। आने वाली सरकारों ने हमें यह घुट्टी पिलाई की सरकार का विरोध देशद्रोह होता है व सरकार देश होती है अतः हमें उसका विरोध नहीं करना चाहिए।

जब आपातकाल लगा तो पता चला कि हमारे कुछ मौलिक अधिकार भी होते हैं! हालांकि तब तत्कालीन शासकों ने जिंदा रहने के मौलिक अधिकार न होने की बात कही व सुप्रीम कोर्ट ने उसे सही ठहराया मगर हम चुप्पी साधे रहे। इसके बाद हालात ऐसे हो गए कि बिना किसी सशस्त्र विद्रोह के हमने सरकार बदल दी। जिन्हें लाए उन्हें भी कुछ समय तक झेला और फिर उन्हे ही सिंहासन पर बैठा दिया जिनका कि हमने विरोध किया था। विरोध करना व संयम रखना तो हमारे डीएनए का अभिन्न हिस्सा है।

हम हजारों साल तक गुलाम क्यों रहे क्योंकि विरोध करना व प्रतिक्रिया जताना तो हमारे खून में था ही नहीं। खिलजी, मुगल आए, अंग्रेज आए, सबने हम पर राज किया व हम उनकी गुलामी करते हुए उन्हें सलाम ठोकते रहे। वह तो अंग्रेजों के लिए हिंदुस्तान मानो नेशनल टेक्सटाइल मिल्स की तरह घाटे में चलने वाला उद्योग हो गया वरना वे उसे कभी आजाद नहीं करते और हम लोग बिना किसी खून खराबे या सशस्त्र क्रांति के आजादी हासिल नहीं कर पाते।

उन झुलसती गर्मी में हम लोग राशन की दुकानों पर पसीने से तरबतर होने के बावजूद दुकान खुलने की प्रतीक्षा में लंबी लाइने लगाया करते थे। हम लोग अपनी बारी आने पर गीली व गंदी चीनी चुपचाप ले लेते थे। राशन लेने के पहले कई दिनों तक दुकानों पर टंगी यह तख्ती देख देख कर थक जाते थे कि सामान खत्म है। राशन लेने गए हैं पर कभी भी दुकानदार से चूं नहीं करते।

देश आजाद होने के बाद सत्तारुढ़ दलों ने अंग्रेजों की प्रतिमाएं हटाकर अपने नेताओं की प्रतिमा लगा दी तो दक्षिण में तो जीवित नेता की ही प्रतिमा लगाने की परंपरा शुरु हो गई। मायावती ने तो अपनी व कांशीराम की प्रतिमाएं दफ्तर में लगवायी व अस्पतालों की जगह पत्थर की मूर्तियां स्थापित कर पार्क बनवाने शुरू किए्।  किसी ने इस कृत्य की आलोचना नहीं की।  हमारे क्रांतिकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति गुजरात में स्थापित कर विश्व रिकार्ड बनाया। जब कोरोना काल लागू हुआ तो सरकार के दावे वादे देखकर लगा कि हमारे डीएनए हम पर हावी है। लोग बेरोजगारी भूख से मर रहे हैं व हम सभी चुपचाप बैठकर देख रहे है कि दिल्ली में हजारों करोड रू से सत्ता की नई बिल्डिगें बन रही है। ।

इन सरकारी आंकड़ों से स्वीकार कर रहे है कि लोग विशेष रेलगाड़ियों से घर जा रहे हैं। गांवों में हर आदमी को मनरेगा के तहत पूरा काम मिल रहा है। हमारी आर्थिकी मजबूत हो रही है भले ही लोगों का समान न बिक रहा हो व बेरोजगार अवसाद से घिरे हो। हर रोज रोगियों की संख्या बढ़ रही है मगर हम इन सरकारी दावों को स्वीकार कर रहे है कि कोविड से ठीक होने वालों की संख्या व प्रतिशत बढ़ा है। भले ही मोदी का सबसे अभिन्न मित्र ट्रंप हमारे दावों को झूठा हुआ बताता रहा हो। मेरा मानना है कि हमारे लिए अच्छे दिन तो मानों वे बिरले दिन  है जब हम अपने बुरे दिनों से उनकी तुलना करते हैं तो यह काल अच्छा नजर आने लगता है।

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