मुसलमान और संस्कृत

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गजब का पाखंड चल रहा है। वहां के संस्कृत विभाग के छात्र इसलिए धरने पर बैठे हैं कि डा. फिरोज खान नामक एक मुसलमान को अध्यापक क्यों नियुक्त कर दिया गया है? इन छात्रों को और इनकी पीठ ठोकनेवाले पोंगा पंडितों को पता नहीं है कि संस्कृत किसी के बाप की धरोहर नहीं है।

भारत में संस्कृत किस-किस ने नहीं पढ़ी है? क्या उन्होंने गाड़ीवान रैक्व का नाम सुना है? जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात द्विजर्उच्यते, क्या इसका अर्थ उन्हें पता है? संस्कृत और वेद पढ़ने का अधिकार मनुष्य मात्र को है। मुसलमानों और ईसाइयों ने संस्कृत साहित्य को अपूर्व योगदान दिया है।

क्या दाराशिकोह हिंदू ब्राह्मण थे? उन्होंने उपनिषदों पर अदभुत काम किया है। अब्दुल रहीम खानखाना ने ‘खटकौतुकम’ नामक संस्कृत काव्यग्रंथ लिखा है। उनके मणिप्रवाल शैली में लिखे पदों को पढ़कर मन-मनोज खिल उठता है। ईसाई विद्वानों ने संस्कृत में ‘ख्रीस्त गीता’ और ‘ख्रीस्त भागवत’ लिखी है।

मेक्समुलर, पाल डायसन, कर्नल जेकब आदि दर्जनों विद्वानों के नाम क्या गिनाऊं, जिन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया है। शाहजहां के दरबार के त्रिशूली पंडित अपनी संस्कृत रचनाओं के लिए प्रसिद्ध थे। संस्कृत के एक शिया विद्वान 1972 में ईरान विवि में मेरे साथ पढ़ाते थे और इस्लामाबाद में एक सुन्नी विद्वान (मूलतः पुणे निवासी) लगभग 40 साल पहले जब मुझसे पहली बार मिले तो वे संस्कृत में ही संभाषण करते रहे।

पंडित गुलाम दस्तगीर बिराजदार (85) और दिल्ली के डा. हनीफ खान (70) से मेरी पत्नी स्व. वेदवतीजी और मेरा सीधा संपर्क रहा है। मुझे याद है कि दस्तगीरजी ने अपने बेटे की शादी का निमंत्रण संस्कृत में छपवाया था। अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी में डा. खालिद बिन युसूफ और डा. मुहम्मद शरीफ संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रहे हैं।

कश्मीर विवि में डा. मिराज अहमद खान संस्कृत पढ़ाते रहे हैं। प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान प्रो. सत्यव्रतजी ने इस विषय पर गहन शोधपूर्ण निबंध भी लिखे हैं। काशी वि.वि. के संस्कृत छात्रों से मैं अनुरोध करता हूं कि वे संस्कृत का गला घोटने का पाप-कर्म न करें। संस्कृत विश्व की सबसे सरल और सबसे समृद्ध भाषा है। इसे किसी जाति, मजहब या राष्ट्र की सीमा में कैद करने की कोशिश न करें।

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