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Monday, April 19, 2021
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जहां चाह, वहां राह

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म्यांमार में इस बार सैनिक शासकों के लिए पहले जैसी आसानी नहीं है। इस बार वहां की जनता ने साफ कर दिया है कि उन्हें लोकतंत्र का गला घोंटा जाना मंजूर नहीं है। इसके लिए वहां के लोग- खास कर नौजवान बड़े जोखिम उठा रहे हैं। साथ ही उन्होंने विरोध जताने के ऐसे तरीके ईजाद किए हैं, जिनकी आज दुनिया भर में चर्चा है। बीते एक फरवरी को नव निर्वाचित संसद की पहली बैठक से कुछ घंटे पहले ही सेना ने सत्ता हथिया ली थी। उसके अगले ही दिन से देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। तब से लगातार सिविल नाफरमानी आंदोलन जारी है। इस दौरान लोगों ने अपनी ड्यूटी पर जाने से इनकार किया है, सैनिक जनरलों के स्वामित्व वाले कारोबारी घरानों का बहिष्कार किया गया है और लगातार सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे हैं। विरोध का एक खास तरीका मोहल्लों में देखा गया है। वहां लोगों ने अपने घरों से बाहर आकर बरतन बजा कर विरोध जताते रहे हैं।

म्यामांर में जन मान्यता के मुताबिक बरतन बजाने से भूत- प्रेत भाग जाते हैं। आज भी रोज रात लोग आठ से सवा आठ बजे तक अपने घरों से बाहर आकर बरतन बजाते हैँ। आंदोलन में शिक्षकों, स्वास्थ्य कर्मियों और वन अधिकारियों जैसे सरकारी कर्मचारियों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया है। प्रदर्शनकारियों ने ट्रैफिक रोकने के नए- ऩए तरीके अपनाए हैँ। इसके लिए चौराहों पर किसी ने जानबूझ कर चावल और प्याज जैसी वस्तुएं गिरा दी जाती हैं। उसके बाद वहां भीड़ इकट्ठी होकर प्याज और चावल के एक- एक दाने को चुनती है। उनका मकसद होता है ट्रैफिक जाम करना था। पुलिस इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर पाती। इसके अलावा सड़क पर कार ब्रेकडाउन कर खड़ी कर देने या धीमी गति से ड्राइविंग करने के उपाय भी अपनाए गए हैं। ट्रैफिक रोकने के लिए लोग अचानक सड़क पर बैठ कर अपने जूते के फीते बांधने लगते हैं। इसी तरह सड़कों पर संगीत कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, जिससे यातायात ठहर जाता है। लॉटरी बायकॉट की मुहिम खासी प्रभावी रही है। इसकी सीधी चोट सरकार खजाने पर पड़ रही है। पत्रकारों ने सैनिक अधिकारियों की प्रेस कांफ्रेंस के बहिष्कार किए हैं। इस वजह से कुछ पत्रकारों को नौकरी भी गंवानी पड़ी है। तो कहा जाता है कि जहां चाह है, वहां राह निकल आती है। म्यांमार की जनता ने लोकतंत्र के लिए संघर्ष की चाह दिखाई है, तो रास्ते निकल आए हैं।

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