नेतन्याहू के बाद इजराइल - Naya India
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नेतन्याहू के बाद इजराइल

इजराइल में अब सबसे अहम सवाल यह है कि नई बनी नफताली बेनेट की सरकार कब तक टिक पाएगी? बेनेट के नेतृत्व में अलग-अलग विचारों वाली पार्टियों का नया गठबंधन बना है? ऐसे में यह ठीक ही कहा गया है कि सरकार का भविष्य बेनेट के व्यक्तित्व के करिश्मे से तय होगा।

इजराइल में बेंजामिन नेतन्याहू पूरे 12 साल तक प्रधानमंत्री रहे। यह एक रिकॉर्ड है। इसके पहले सबसे अधिक समय तक प्रधानमंत्री मिनाखिम बेगिन रहे थे। वे सात साल लगातार प्रधानमंत्री रहे। लेकिन गौरतलब यह है कि नेतन्याहू भले 12 साल प्रधानमंत्री रहे, लेकिन वे एक बार भी चार साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। हर बार मध्यावधि चुनाव में उन्हें उतरना पड़ा। पिछले दो सालों में तो हद हो गई, जब चार बार संसद- नेसेट के लिए चुनाव हुए। ये बातें इजराइल में अक्सर चलने वाली राजनीतिक अस्थिरता को बताती हैं। ये तथ्य इस बात की पुष्टि के लिए काफी हैः 1949 में इजराइल की स्थापना के बाद यहां अब 36वीं सरकार बनी है। यानी 72 साल में 36 सरकारें। यानी इजराइल में सरकारों का औसत कार्यकाल दो साल का रहा है। तो सवाल है कि नई बनी नफताली बेनेट की सरकार का क्या होगा? उनके नेतृत्व में बना अलग-अलग विचारों वाली पार्टियों का नया गठबंधन कब तक टिक पाएगा? यह ठीक ही कहा जाता है कि इजराइल की राजनीति में नेता का व्यक्तित्व बहुत अहम होता है।

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प्रधानमंत्री बनना और टिके रहना काफी कुछ नेता के अपने करिश्माई शख्सियत से तय होता है। तो अब सवाल यही है कि क्या बेनेट में ऐसा करिश्मा है? तो वे इसलिए बन गए क्योंकि नेतन्याहू को हटाने पर आमादा दलों ने उन्हें आगे कर अपना सियासी मकसद साधा। मगर सरकार चले, यह बेनेट के अपने करिश्मे से तय होगा। बेशक नेतन्याहू में ऐसा करिश्मा था। उनकी लिकुड पार्टी आज भी उनके प्रति वफादार है। नेतन्याहू धुर दक्षिणपंथी और रूढ़िवादी पार्टियों के साथ मजबूत गठबंधन कायम रखने में अभी भी कामयाब हैं। जबकि दक्षिणपंथी यामिना पार्टी के नेता बेनेट के साथ दिक्कत यह है कि उनके गठबंधन में कई मध्यमार्गी पार्टियां और एक अरब आबादी समर्थक पार्टी भी शामिल है। ये नहीं भूलना चाहिए कि 120 सदस्यीय नेसेट में नेतन्याहू के साथ अभी भी 52 सदस्यों का समर्थन है। नेतन्याहू कड़वाहट लिए अपने पद से हटे हैं। वे नई सरकार को गिराने की हर जुगत अपनाएंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर वापसी की अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी है। ऐसे में यह साफ है कि बेनेट को लगभग रोज ही अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। इसमें वे कितने कामयाब होंगे, उससे ही इजराइल में राजनीतिक स्थिरता की स्थिति तय होगी।

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