Narco Jihad Heroin Seized मुंद्रा पोर्ट से भारत में में ‘नारको जिहाद!
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मुंद्रा पोर्ट से भारत में में ‘नारको जिहाद!

Narco Jihad Heroin Seized

‘नारको जिहाद’ के जुमले से सांप्रदायिकता की बू आ रही है तो आप कोई और शीर्षक सोच सकते हैं, जैसे ‘नारको टेरेरिज्म’ या ‘उड़ता हिंदुस्तान’! वैसे भी ‘नारको जिहाद’ यानी नशीली दवा के जाल में दूसरे धर्म के लोगों को फंसाने की इस्लामिक चाल का यह जुमला केरल के एक चर्च के बिशप ने बोला है। इस पर विवाद हो गया है और बहस चल रही है। कैथोलिक ईसाइयों की संस्था ‘साइरो मालाबार कैथोलिक चर्च’ की पलाई ईकाई के बिशप मार जोसेफ कल्लारांगट ने पिछले दिनों अपने धार्मिक उपदेश में कहा- जिहादी गैर-मुसलमान नौजवानों को बरबाद करने के लिए ड्रग्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे कई जगहों से काम करते हैं। इनमें से आइसक्रीम पार्लर और रेस्तरां प्रमुख हैं। Narco Jihad Heroin Seized

इस बयान के लिए उनकी बडी आलोचना हुई। इसे भेदभाव करने और सांप्रदायिक विभाजन कराने वाला बताया गया। हो सकता है कि उन्होंने जो जुमला चुना वह ठीक नहीं हो, लेकिन नशीले पदार्थों के फैलते जाल और नौजवानों के उसमें फंसने की जो बात उन्होंने कही, उससे भला किसको इनकार हो सकता है! तभी केरल कैथोलिक बिशप कौंसिल ने बयान का समर्थन करते हुए कहा कि बिशप कल्लारांगट के शब्दों पर विवाद की जगह सार्वजनिक रूप से जिम्मेदारी के साथ चर्चा की जानी चाहिए।

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बिशप मार जोसेफ कल्लारांगट के जुमले पर बहस करने की बजाय अगर सचमुच इस मसले पर जिम्मेदारी से चर्चा की जाए तो आंखें खोलने वाले तथ्य सामने आएंगे। सोचें, जिस समय केरल के एक बिशप ने नौजवानों को नशे की लत लगाने की सोची समझी साजिश के बारे में बयान दिया, लगभग उसी समय वहां से हजारों किलोमीटर दूर गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पर तीन हजार किलो हेरोइन पकड़ी गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक किलो हेरोइन की कीमत पांच से सात करोड़ रुपए होती है। इस लिहाज से पकड़ी गई हेरोइन 15 से 21 हजार करोड़ रुपए की है। यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी जब्ती है और दुनिया में भी इतनी बड़ी जब्ती दो-चार ही हुई है। इस लिहाज से यह जब्ती गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में जाने वाली है। यह हेरोइन अफगानिस्तान से भारत लाई गई थी। इसे अफगानिस्तान से पहले ईरान के बांदर अब्बास बंदरगाह पहुंचाया गया और वहां से कंटेनर में रख कर इसे भारत लाया गया।

मुंद्रा बंदरगाह देश के दूसरे सबसे बड़े उद्योगति गौतम अडानी का है। यह निजी नियंत्रण वाले बिल्कुल शुरुआती बंदरगाहों में से एक है। तीन हजार किलो हेरोइन पकड़े जाने की खबर के बाद दक्षिण भारत के प्रतिष्ठित अखबार ‘डेक्कन क्रॉनिकल’ ने बताया कि जिस कंपनी ने तीन टन माल मंगाया था उसी कंपनी ने जून के महीने में 25 हजार किलो यानी 25 टन माल मंगाया था। सोचें, एक महीने में 25 टन हेरोइन पहुंची और किसी को कानों कान खबर नहीं हुई। 25 टन हेरोइन की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत एक लाख 25 हजार करोड़ रुपए से लेकर एक लाख 75 हजार करोड़ रुपए तक है। अगर न्यूनतम कीमत के लिहाज से भी विचार करें तो एक महीने में एक लाख करोड़ रुपए का नशीला उत्पाद एक बंदरगाह पर उतरा और देश के अलग अलग हिस्सों में पहुंच गया। अब बिल्कुल वस्तुनिष्ठ तरीके से इस पर विचार करें कि भारत में किसकी हैसियत ऐसी है कि वह सवा लाख करोड़ रुपए का नशीला पदार्थ मंगा सके?

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नशीले पदार्थ का यह कारोबार आशी ट्रेडिंग कंपनी के नाम से चल रहा था। आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में रजिस्टर्ड इस कंपनी का टेल्कम पावडर का कारोबार है। टेल्कम पावडर के नाम पर ही पहले भी हेरोइन आई है और इस बार भी दो कंटेनर में रखा गया माल आधिकारिक रूप से टेल्कम पावडर ही था। इस सिलसिले में डीआरआई ने कंपनी के मालिक एम सुधाकर और उसकी पत्नी जी दुर्गा पूर्णा वैशाली को चेन्नई से गिरफ्तार किया है। इसमें कुछ अफगानी लोगों के भी शामिल होने की खबर है। अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की हसन हुसैन ट्रेडिंग कंपनी के जरिए यह माल भेजे जाने की खबर है। डीआरआई ने कहा है कि वह पूरे रैकेट की जांच कर रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि कंपनी के मालिक एम सुधाकर और उसकी पत्नी की हैसियत नहीं है कि वह हजारों करोड़ रुपए का कारोबार कर सके। वे बहुत छोटी हैसियत के लोग हैं और नशीली पदार्थों की विशाल खेप से अपने आप जाहिर है कि वे दोनों फ्रंट हैं। उनके नाम पर कारोबार कोई और चला रहा है। क्या कभी इसका खुलासा हो पाएगा कि विजयवाड़ा की छोटी सी कंपनी और दो लोगों की आड़ में कौन लोग इतना विशाल कारोबार कर रहे हैं?

सबको पता है कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से दूर-दराज के इलाकों में तालिबान के लोग अफीम की खेती करते थे, जिससे हेरोइन तैयार की जाती थी। अमेरिकी फौजों की मौजूदगी और हामिद करजई व अशरफ गनी की सरकार के समय भी तालिबान का यह कारोबार रूका नहीं था। ईरान और मध्य एशिया के दूसरे देशों के रास्ते अफगानिस्तान में तैयार होने वाला नशा पूरी दुनिया में फैल रहा था। यह तालिबान की कमाई का एकमात्र जरिया रहा है। लेकिन कमाई के साथ साथ क्या यह उनके जिहाद का हथियार नहीं है? क्या यह उनकी सोची समझी रणनीति नहीं हो सकती है कि भारत के युवाओं को नशे की लत लगाई जाए और पीढ़ी दर पीढ़ी उसे कमजोर किया जाए? क्या यह हकीकत नहीं है कि आज कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से मणिपुर तक नशे का कारोबार तेजी से फैल रहा है और युवा पीढ़ी इसकी चपेट में आती जा रही है? ऐसा नहीं है कि इस जिहाद से सिर्फ गैर मुसलमानों की युवा पीढ़ी बरबाद हो रही है, समूचे कश्मीर में मुस्लिम नौजवानों में नशे की लत फैल रही है। लेकिन इससे तालिबान को या नशे का कारोबार करने वालों को क्या फर्क पड़ता है? उनके तो दो मकसद पूरे हो रहे हैं। पहला भारत को बरबाद करना और दूसरा पैसे कमाना! अब असली जरूरत उन चेहरों को उजागर करने की है, जो इस धंधे के असली संचालक हैं। यह किसी छोटे-मोटे कारोबारी का काम नहीं है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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