विकल्प हमेशा हैं

श्रुति व्यास

सबसे पहले तो मैं ईमानदारी बरतूंगी। न तो मैंने हरियाणा विधानसभा चुनाव कवर किया था, न ही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बारे में खबरें पढ़ीं थीं। इसकी एकमात्र वजह सिर्फ यही थी कि यह पहले तय ही था कि इन दोनों राज्यों में भाजपा ही सत्ता में लौटेगी। और ऐसा मानने वालों में केवल मैं ही नहीं थी। कई राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों तक ने इसी तरह की संभावनाएं जाहिर की थीं। चुनाव नतीजे आने के एक दिन पहले एक अखबार में योगेंद्र यादव ने लिखा था कि “ हरियाणा और महाराष्ट्र में वोटों की गिनती देखने के लिए आपको गुरुवार सुबह वक्त बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। नतीजे जगजाहिर हैं और विधानसभा चुनावों के इस दौर में यह पहले ही से स्पष्ट हो चुका है।” निसंदेह भाजपा उस दिन तीन सौ दो सीचें जीत कर जोरदार बहुमत के साथ सत्ता में लौटी और सारे प्रादेशिक और राष्ट्रीय दलों को समेट कर रख दिया और इस सबने हम सबको शांत कर दिया था। इस शांति में ऐसे संवाद थे कि नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है, ऐसे विचार तैर रहे थे कि क्षेत्रीय पार्टियां मर चुकी हैं, ऐसा माहौल बन गया था कि जिसमें कांग्रेस और इसके नेताओं का नाम तक गायब हो चुका था। यानी कुल मिला कर जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं, वह लोकतंत्र शब्द निरर्थक-सा नजर आ रहा था। और हम नरेंद्र मोदी को ही सर्वोच्च नेता और तकदीर मान बैठने को मजबूर थे।

लेकिन अब वह हनीमून पीरियड खत्म हो चुका है जो जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के खात्मे और राम मंदिर के साथ शुरू हुआ था। कहें कि अब जड़ता टूट चुकी है। भाजपा हरियाणा में चालीस सीटों पर ही ठहर गई और महाराष्ट्र में वह सरकार बनाने को लेकर शिवसेना के साथ संघर्ष में फंस गई है। भाजपा के लिए सब वैसा ही नहीं हुआ जैसी कि उसकी स्क्रिप्ट तैयार की गी थी। पिछले नौ महीनों में नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालार ने लोगों का ध्यान खींचने के लिए इस स्क्रिप्ट को बदला है। इन्होंने पाकिस्तान को एक तरह का विपक्ष, दुश्मन बना डाला है, जैसे कि वह कोई गुंडा हो। मोदी भारत की हर समस्या की जड़ पाकिस्तान में बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। उन्होंने भारत की हर समस्या के पीछे पाकिस्तान को बताया और एक अप्रत्याशित स्तर तक राष्ट्रवाद का जुनून भर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनाव नतीजे उनके मुताबिक आ गए थे। और विधानसभा चुनावों में भी इसी स्क्रिप्ट को आजमाते हुए आगे बढ़ा गया और शोर मचाया गया कि मोदी पाकिस्तान को हरियाणा से मिलने वाले उस पानी को रोक देगा जो सालोंसाल से कांग्रेस की सरकारें उसे देती आ रही थीं। हरियाणा के चरखी दादरी में एक चुनावी रैली में अनुच्छेद 370 के मसले पर तो नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को धमकियां देते हुए ‘डूब मरो’ जैसे शब्दों तक का इस्तेमाल किया गया था। इसलिए यह सवाल तो उठता ही है कि भाजपा के अति-आत्मविश्वास खा गया या फिर मोदी-शाह के उग्र-राष्ट्रवाद के करिश्मे की हवा निकल गई?

हालांकि यह दोनों का ही मिलाजुला असर है, लेकिन सबसे भारी गलती राष्ट्रवाद के पिच पर जरूरत से ज्यादा दौड़ भरने की हुई है। इन राज्यों में राष्ट्रवाद पर अनवरत समर्थन भारी पड़ गया। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में भी हमने यह देखा था और एक बार फिर यह देखा है। पाकिस्तान और कांग्रेस को लेकर मोदी चाहे जितनी छाती पीट लें, लोगों को इससे न तो कोई फर्क पड़ता है, न उनमें कोई बेचैनी नजर आती है, और न ही वे इसे तवज्जो देते हैं। लोगों के लिए मोदी का बार-बार का इस तरह का विलाप अब उबाऊ बन चुका है। जैसा कि माना जा रहा था कि अनुच्छेद 370 और एनआरसी का मसला बहुत काम करेगा, एकदम फुस्स हो गया और लोगों ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। मोदी भक्तों के लिए तो यह मनोरंजन की बात हो सकती है, लेकिन हरियाणा के एक जाट या गुर्जर के लिए ये निपट बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है। आज जब बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, किसान और किसानी का संकट जैसे गंभीर मुद्दे सामने हैं तो राष्ट्रवाद और धारा 370 जैसे मुद्दे हवा हो जाते हैं। यही वजह है कि छह महीने पहले हरियाणा में दस में से दस सीटें और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिल कर अड़तालीस में इकतालीस सीटें जीतने वाली भाजपा आज हरियामा में सात और महाराष्ट्र में उन्नीस सीटों पर सिमट कर रह गई।

लेकिन प्रदेशों के चुनाव में एक बात खासतौर से जो दिखी वह थी लोगों की ताकत। कुछ दिन पहले महिपालपुर में मैं जाम में फंस गई थी। एक बस खराब हो गई थी और जाम लग गया था। पंद्रह मिनट हो गे थे, लेकिन निकलने के लिए रास्ता नहीं था। कहीं कोई ट्रैफिक पुलिस नहीं थी। कुछ हताश-निराश लोग कारों से निकले और जाम खुलवाने में लग गए। जैसे तैसे करके छोटी कारों के लिए रास्ता निकाला गया और पंद्रह मिनट से कम में ही फिर से ट्रैफिक चल निकला, पर तब तक भी कोई ट्रैफिक पुलिस वाला वहां नहीं पहुंचा था। अगर हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के नतीजों को इस घटना से मिला कर देखें तो कोई विकल्प नहीं की सारी बातें तमाशा जैसी लग रही हैं। जब वक्त आता है, जब जरूरत पड़ती है तो अचानक ही विकल्प भी सामने आ जाता है। शरद पवार, भूपिंदर सिंह हुड्डा, जयंत चौटाला सब अपनी जमीन के नेता हैं जो लोकसभा में बुरी तरह से सिमट गए थे और इनकी पार्टियों का नामलेवा तक नहीं बचा था। हालांकि आज ये लोग बड़े विजेता बन कर उभरे हैं। आखिर किसने इन्हें ये जीत दिलाई? क्या ये नरेंद्र मोदी का विकल्प नहीं हैं? क्या कांग्रेस पार्टी जिसे नरेंद्र मोदी ने कई बार किनारे किया और जो बिना चेहरे के चल रही है, क्या वह दूसरी नंबर की विजेता बन कर नहीं उभरी है? क्या ये सब विकल्प नहीं बन सकते हैं?

हां, भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र में अपनी सरकार तो बना ली है, लेकिन ये बिना साख की सरकारें हैं। बल्कि इस तरह की सरकारें मोदी-शाह के लिए एक तरह की चेतावनी हैं कि वे एक क्षण के लिए रुकें और सोचें कि जो स्क्रिप्ट लेकर वे आगे बढ़ रहे हैं उसका नतीजा क्या आ रहा है। अगर जरूरत पड़ती है तो लोग उसका विरल्प तलाश लेते हैं। जब भ्रष्टाचार, धूर्तता, चालाकी जैसी चीजें हावी होती जाती हैं, सामाजिक-आर्थिक उथल-पुथल तेज होने लगती है तो फिर लोग विपक्ष की तलाश शुरू कर देते हैं, भले उसमें उन्हें कोई उपयुक्त चेहरा नजर न आए। और भारत की राजनीति को कभी भी कम करके नहीं आंकना चाहिए, भले वक्त नरेंद्र मोदी का ही क्यों न हो। आज जैसी शांति दिखाई पड़ रही है, वह स्थायी कभी नहीं हुआ करती।

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