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मोदी की सीबीआई, ईडी व गोरों और मुगलों का राज, उनके कोतवाल!

नरेंद्र मोदी के राज का नंबर एक पाप क्या है? अपना मानना है भारतीयों पर वैसे ही राज करना, जैसे अंग्रेजों ने किया था। फूट डालो राज करो। दूसरे, सत्ता और पुलिस से सत्ता विरोधियों को डराना। उन्हें देशद्रोही-भ्रष्ट करार देना। मुझे सन् 2014 में मोदी से तीसरी आजादी की उम्मीद थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि नरेंद्र मोदी लाल किले से विरोधियों में यह खौफ बनाएंगे कि मैं छोड़ूंगा नहीं। इतिहास का सत्य है कि लाल किले का बादशाह हिंदुओं को डरा कर राज करता था। मुगलों और अंग्रेजों दोनों ने कोतवालों और पुलिस के ऐसे कायदे कानून बनाए थे, जिससे चांदनी चौक का कोतवाल शासन का नंबर एक औजार था। उसी के डर से सब बादशाह के गुलाम तथा भक्त बने रहते थे। मुगलों और अंग्रेजों ने प्रजा को दो हिस्सों में बांट कर शासन किया। अपने और पराए याकि समर्थकों और विरोधियों की दो कैटेगरी के चेहरों में बादशाह फैसले लिया करते थे। जो लोग बादशाह या अंग्रेज के समर्थक थे वे उनको पैसा और नजराना देते। सेना (आज के संदर्भ में चुनावी चंदा) का खर्चा उठाते। ऐसे लोगों को मनमानी की छूट थी। वे दरबार से ईमानदार, राष्ट्रभक्त होने का ठप्पा लिए होते थे। वैसे ही जैसे मोदी राज में मंत्री, दरबारी, पाला बदल कर आए नेता भले कितने ही भ्रष्टाचारी रहे हों लेकिन उनकी तरफ सीबीआई, ईडी, कोतवाल, पुलिस की हिम्मत नहीं होती जो वे उनके खिलाफ कुछ करें। उन पर छापा मारें।

इतिहास का सत्य है कि जिसकी दिल्ली और जो लाल किले का मालिक वह मानो भारत का मालिक। दिल्ली का जो भी मालिक होता था वह देश में दूसरे किसी को ताकतवर, लोकप्रिय होते लीडर को बरदाश्त नहीं करता था। दिल्ली के मुगल और अंग्रेज पूरे देश को अपने एजेंटों, पुलिस, कोतवालों तथा फौज से कंट्रोल करते थे। अंग्रेजों ने इसी अंदाज में जमींदारियां बनवाईं। उन्हें जब उद्धव ठाकरे जैसे किसी हिंदू राजा से खतरा लगा तो लोकल एजेंट के जरिए खरीद-फरोख्त से उसके दरबार में विभीषण पैदा किए। उसकी सत्ता पलटवाई। एकनाथ शिंदे जैसे किसी ताबेदार को रियासत का जमींदारा दिया। दिल्ली का मुगलिया औरंगजेब इसलिए छत्रपति शिवाजी से चिढ़ा क्योंकि वे अपनी प्रजा और अपनी स्वाधीनता में जीने की हूक लिए हुए थे। भला ऐसा मिजाज पूरे हिंदुस्तान का अपने को बादशाह मानने वाला औरंगजेब कैसे बरदाश्त करता?

दिल्ली से औरंगजेब ने जिस क्रूरता से बंगाल, मराठा, दक्खन के रजवाड़ों के पर कतरे, उस वक्त के इतिहास और आज के वक्त का बेसिक फर्क यह है कि नरेंद्र मोदी की निज सत्ता एकाधिकारी भूख से सब कुछ है जबकि औरंगजेब को धर्म भी ड्राइव करता था। वह इस्लाम का सच्चा बंदा था। उसने मंदिर तुड़वाए। असंख्य लोगों का धर्मांतरण कराया। वह सादगी में जीता था। कथनी नहीं, बल्कि उसने करनी से भारत को इस्लामी झंडे में रंगा। जबकि सन् 2022 की रियलिट केवल निज सत्ता की चिंता है। कथनी और दिखावे में हिंदुओं को सिर्फ बहलाना-फुसलाना है। यह भ्रम बनवाना है कि मैं हूं तो सब है! मैंने यदि तिरंगा उठाया है तो यहीं भगवा धर्म ध्वजा है।

बहरहाल, यह अलग मसला है। मोटा मोटी गुलामी काल और आज के लोकतांत्रिक भारत का सत्य है कि दिल्ली सल्तनत को मेवाड़ या मराठा, झांसी, अवध आदि के रजवाड़ों, सामंतों, स्वाभिमानी-आजादीपरस्त हिंदू वीर और विरोधी ताकतें हमेशा चुभती रहीं। मुगल और अंग्रेजों की दिल्ली का मनोभाव वहीं था, जो आज के राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी का है। मैं पूरे देश का मालिक। और मेरी सत्ता की निरंतरता की गारंटी की मूल जरूरत है बांटो व राज करो। विरोध-विपक्ष को ऐसे बदनाम, भ्रष्ट, देशद्रोही करार दो, जिससे जनता को दूसरा विकल्प समझ ही नहीं आए। उन लोगों और उनके नेताओं, उनकी पार्टियों को खत्म करो, जिनसे सन् 2024 या सन् 2029 में खतरा हो।

दिल्ली की अंग्रेज सत्ता का क्या मकसद था? पहले कंपनी की कमाई और फिर महारानी के भारत कोहिनूर की रक्षा। कैसे यह काम हुआ? कोतवालों, सूबों में एजेंटों, जमींदारों के जरिए और सीबीआई तथा कोतवालों के आतंक से उन्होंने अपनी सत्ता, एकाधिकार बनाया। अंग्रेजों की व्यवस्था में ही पुलिस, सीबीआई के वे कानून-कायदे बने, जिसके आजाद भारत में ये बाई-प्रोडक्ट हुए- डीआरआई, मीसा, टाडा, ईडी जैसे नए कानून और उनकी व्यवस्थाएं। रौलेट एक्ट, देशद्रोह कानून, प्रेस एक्ट, सीबीआई सभी को अंग्रेजों ने ही बनाया, ताकि उनका विरोध नहीं हो। विपक्ष खड़ा न हो। लोग आजादी नहीं मांगें।

मगर गोरे अंग्रेज फिर भी ब्रितानी लोकतंत्र के बंदे थे। इसलिए उन्होंने बदलते वक्त के साथ भारत में विरोध बनने दिया। खुद एक अंग्रेज ने कांग्रेस नाम की पार्टी बनवाई। कांग्रेस को चंदा दिया। पैसा इकठ्ठा करने दिया। स्वदेशी आंदोलन होने दिए। लोगों को पार्टियां बनाने दी। पार्टियों-विरोधियों को धरना-प्रदर्शन-आंदोलन करने दिए। कांग्रेस, हिंदू महासभा, आरएसएस, मुस्लिम लीग सभी सेठों-बिड़लाओं व खाते-पीते लोगों से पैसा याकि चंदा लेते थे। राजनीति करते थे। अंग्रेजों की ऐसी तैसी करते थे। अंग्रेज सभ्य थे। जानते थे कि राजनीति पैसे से चलती है। और वे टैक्स याकि कानूनी तौर पर जब खुद पैसा इकठ्ठा कर राज चलाने का खर्चा व कमाई जुटाते हैं तो बेचारी भारत की विरोधी पार्टियों, जमातों के नेता यदि पैसा इकट्ठा कर रहे हैं तो क्या गलत। इसलिए गांधी यदि बिड़ला-बजाज सेठ को पटा कर खर्चा जुटा रहे हैं तो यह तो पाप होगा जो गांधी के आश्रम पर सीबीआई छापा डाले या कांग्रेस पार्टी के नेताओं, मुस्लिम लीग-हिंदू महासभा, आरएसएस के नागपुर दफ्तर पर, हेडगेवार के ठिकाने पर छापे मार कर पैसे और कागजों की बरामदगी से हल्ला बनवाए कि देखो, देखो गांधी बिड़लाओं से पैसा लेता है, जबकि संत-महात्मा होने का ढोंग रचता है! ये देशी लोग भ्रष्ट हैं इनकी कमान में आजादी ले कर भारतीयों क्या पाओगे?

तभी सोचें, आजादी से पहले के 75 सालों और आजादी बाद के 75 वर्षों में भारत की पार्टियों ने लोगों से कितने अरब रुपए का नकद पैसा या चंदा, चुनावी-राजनीति खर्च इकठ्ठा किया होगा? क्या कांग्रेस, संघ, जनसंघ, भाजपा नकद पैसा, दो नंबर का पैसा लेकर राजनीति व समाज सेवा करते हुए नहीं थे? संभव है इसमें कई लोगों ने पैसा खाया हो, निजी भ्रष्टाचार किया हो। लेकिन 150 वर्षों में दिल्ली का ऐसा कौन सा अंग्रेज हाकिम, कांग्रेसी हाकिम या जनसंघी (प्रधानमंत्री वाजपेयी) ऐसा राष्ट्र प्रमुख हुआ, जिसने विरोधी सूबेदार, राजा, विरोधी पार्टी, विपक्ष को ले कर यह तरीका अपनाया हो कि मैं सत्ता में रहते हुए कानूनी तौर पर (फिलहाल चुनाव के इलेक्टोरल बांड्स के जरिए) हजारों करोड़ रुपए का कुबेरी खजाना बनाऊंगा लेकिन विपक्ष को न पैसा लेने दूंगा न रखने दूंगा? नरेंद्र मोदी और अमित शाह क्योंकि तासीर में पैसे का खेल बारीकी से जानते हैं तो सत्ता संभालते की चुनाव सुधार के ढोंग में चुनावी बांड्स की ऐसी व्यवस्था बनाई कि अरबपतियों के काम करके, उन्हें बहला-फुसला-धमका कर सत्तावान तो अरबों रुपए का चेक से पेमेंट ले कर चुनावी खर्च का बंदोबस्त कर सकता है। जनता, संसद, मीडिया को किसी को पता नहीं पड़ता की किस सेठ ने भाजपा याकि दिल्ली की सत्तारूढ़ पार्टी को कितना पैसा दिया। सोचें 75 वर्षों की कैसी चतुर और भ्रष्ट चंदा नीति। इस नीति में क्या किसी सेठ की हिम्मत जो वह सत्तारूढ़ पार्टी के बराबर विपक्षी दलों को चंदा देगा! तभी मोदी-शाह के राज में बेइंतहां अरबों रुपए का चंदा भाजपा को और बाकी पार्टियों को छटांग भर पैसा!

सोचें, मोदी राज ने विपक्ष को राजनीति के लायक नहीं रहने देने का कैसा गजब प्रबंध किया। जबकि ऊपर से अपने बेइंतहां चुनावी खर्च से विरोधियों की जरूरतें बढ़ाईं। मगर राजनीति और चुनाव लड़ने लायक पैसा आए तो कहां से?

विपक्ष के पास न बांड्स और चंदे से पैसे इकठ्ठा होने देना। और नकद कोई ले, इकठ्ठा करे तो सीबीआई और ईडी से छापे डलवा कर, उनका रिकार्ड चेक करवा कर उन्हें जनता के आगे नंगा बनाना। ताकि जनता उन्हें दागी, भ्रष्टाचारी मान उन पर विश्वास नहीं करे।

क्या मैं गलत हूं? लाल किले में रहने वाले मुगल बादशाह और लाल किले की प्राचीर से भाषण देने वाले नरेंद्र मोदी की शासन नीति में विपक्ष, विरोधी के लिए लिए एक इंच स्पेस नहीं। जब लड़ाई, चुनाव का साधन ही नहीं तो लड़ेंगे क्या? राणा प्रताप को घास की रोटी खाने को मजबूर कर दो, मराठा वीर शिवाजी को ताकत से ऐसे कुचलों कि वे लड़ना छोड़ छापामारी करें। उन सूबो, उन रजवाड़ों का पैसा बंद करा दो जो विरोधी मिजाज के लगते हैं।

भारत का सत्य है दिल्ली ने हमेशा अहंकार से राज किया। अंग्रेजों और मुगलों के आइडिया में भी भारत भूभाग के एकत्रीकरण, सबको गुलाम बनाने का अखिल भारत राष्ट्र मिशन होता था। इसका नंबर एक औजार क्या था? ताकत (पैसा और डंडा), याकि कोतवाल। अंग्रेजों ने सीबीआई को जन्म देने वाला दिल्ली एक्ट और ईडी जैसी एजेंसियों की नींव बनाई। मगर हां, तब लोकतंत्र का ढोंग नहीं था। अब लोकतंत्र में भी यदि पैसे से चुनाव लड़ने वाली (क्योंकि दूसरा कोई तरीका ही नहीं छोड़ा) ताकत विपक्ष के पास नहीं तो वह यह तो घर बैठे या सत्ता का गुलाम हो जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस 15 अगस्त नया आयाम जोड़ा है। वे लाल किले से चांदनी चौक (देश) को संबोधित करते हुए कहते हैं सुन लो, मेरे कोतवाल छोड़ेंगे नहीं! मैं राजनीति की सफाई कर दूंगा। विरोधी भ्रष्टाचारी हैं। वे तमाम सूबेदार, मुख्यमंत्री और पार्टियां देशद्रोही, भ्रष्ट और परिवारवादी हैं, जो मेरे से डरते नहीं। मेरे गुलाम नहीं। मेरे वफादार नहीं, जबकि मैं 140 करोड़ लोगों का असल मालिक हूं। मेरी सुनो और भारत के लोगों मैं ही ईमानदार, लायक, देशभक्त हूं और मेरे विरोधी बेईमान, नालायक, देशद्रोही।… सोचें 75 के भारत का यह विकास और नई अमृत वेला में विरोध-विपक्ष को मारने का नया अंदाज!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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