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उफ! हिंदू स्वर्णयुग में इतना झूठ

world hunger index report

एक तरफ विज्ञापनों के जरिए देश में चौतरफा खुशहाली है तो दूसरी ओर ठोस सचाई बताने वाले आंकड़े हैं, देश की जमीनी हकीकत है। जमीनी हकीकत यह है कि दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब और कंगले लोग भारत में है। दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे-नंगे लोग भारत में है। दुनिया के सबसे ज्यादा अशिक्षित लोग भारत में हैं और सबसे ज्यादा बेरोजगार भी भारत में हैं। विश्व संस्थाओं की ओर से किए जाने वाला कोई भी सर्वेक्षण उठा कर देख लें, हर पैमाने पर भारत पैंदे में पहुंचा हुआ है। भूख का सूचंकाक हो, कुपोषण का सूचकांक हो, मानव विकास की स्थिति का सूचकांक हो, मानवाधिकार की स्थिति हो, प्रेस की आजादी की स्थिति हो, लोकतंत्र की दशा-दिशा हो, धार्मिक आजादी हो हर पैमाने पर भारत दुनिया के फिसड्डी देशों में खड़ा है। हैरानी की बात है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की ओर से भी बताया जा रहा है कि भारत में कितनी गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता है इसके बावजूद देश का कलियुगी हिंदू मोदी भक्ति में ऐसे मगन हैं कि वे सरकारी विज्ञापनों और भाषणों में बताई जाने वाली बातों पर यकीन कर रहे हैं। उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति का, अपनी मुश्किलों का अंदाजा ही नहीं है।

सिनेमा के बारे में कहा जाता है कि वह यकीन दिलाने की कला है। लोग सिनेमा देखने जाते हैं तो ढाई घंटे के लिए अपनी समझदारी पर ताला लगा देते हैं। अंग्रेजी में इसके लिए एक जुमला इस्तेमाल होता है- विलफुल सस्पेंसन ऑफ डिसबिलिफ। यानी किसी चीज के बारे में तार्किक रूप से सोचने और उस पर भरोसा करने से पहले उसके बारे में पड़ताल करने की जो समझदारी होती है उसे जान बूझकर स्थगित कर देना। भारत के लोग सिनेमा के बारे में नहीं, बल्कि असल जिंदगी के मामले में इसी सिद्धांत पर चल रहे हैं। उन्होंने अपनी समझदारी पर ताला लगा दिया है। किसी बात पर यकीन करने से पहले उसकी पड़ताल करने की जरूरत को उन्होंने स्थगित कर दिया है। भारत का बेरोजगार नौजवान और दाने-दाने को मोहताज व्यक्ति भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उसके पास नौकरी नहीं है या खाने को अन्न नहीं है। वह मान रहा है कि सब ठीक है या ठीक नहीं है तो किसी बड़े मकसद को हासिल करने की मोदीजी कोशिश कर रहे है, जिसकी वजह से वक्ती तौर पर उन्हें ये मुश्किलें झेलनी पड़ रही है। वे यह भी देखने-मानने को तैयार नहीं है कि कोई बड़ा मकसद हासिल ही नहीं हो रहा है।

देश की हकीकत बताने वाले एक बयान पर गौर करे। यह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नंबर दो पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबाले ने दिया है। उन्होंने दो अक्टूबर को स्वदेशी जागरण मंच के एक कार्यक्रम में कहा, ‘देश की राष्ट्रीय आय का 20 फीसदी हिस्सा एक फीसदी लोगों के पास हैं, जबकि देश की आधी आबादी यानी 50 फीसदी आबादी के पास राष्ट्रीय आय का सिर्फ 13 फीसदी हिस्सा है।’ उन्होंने गरीबी के बारे में कहा, ‘यह शर्म की बात है कि देश में 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं और 23 करोड़ लोग हर दिन 375 रुपए से भी कम कमा रहे हैं’। बेरोजगारी को लेकर होसबाले ने कहा, ‘भारत में चार करोड़ बेरोजगार लोग हैं, जिनमें से 2.2 करोड़ लोग शहरी क्षेत्रों में और 1.8 करोड़ देहात में हैं’। हालांकि कई संस्थाओं के आंकड़े इससे भिन्न हैं। एक आकलन के मुताबिक भारत में गरीबों की संख्या 27 से 34 करोड़ के बीच है और यह आंकड़ा कोरोन से पहले का है। यानी इसमें और बढ़ोतरी होने की पूरी संभावना है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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