जश्न अगर भ्रामक ना हो

नरेंद्र मोदी सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट में माहिर है, ये बात तो अब सारी दुनिया मानती है। मगर मैनेजमेंट जब ऐसा होने लगे कि हकीकत को पलट कर दिखाया जाए, तो सरकार को यह समझना चाहिए कि इसकी एक सीमा होती है। मोदी सरकार ने कश्मीर में धारा 370 खत्म किया और उसके बाद वहां लॉकडाउन किया। इसके बाद वहां हिंसा रोके रहने में वह कामयाब रही है, ये बात सब मानते हैं। यह अलग बात है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं का प्रबंधन करने में मोदी सरकार को उतनी कामयाबी नहीं मिली है। इसलिए यह समझा जा सकता है कि हाल में हुए ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल चुनावों को एक बड़ी सफलता के रूप में बता कर वह यह संदेश देना चाहे कि कश्मीर की जनता सरकार के कदम के साथ है। मगर इस कोशिश में भ्रामक बातें कही जाएं, उससे कोई लाभ नहीं होगा। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन चुनावों को ऐतिहासिक बताया। कहा कि इन चुनावों में ऐतिहासिक 98 फीसदी मतदान हुआ और इस खबर ने प्रत्येक देशवासी को गर्व से भर दिया है।

नरेंद्र मोदी ने इसे पांच अगस्त के अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले से भी जोड़ दिया। कहा कि पांच अगस्त के ऐतिहासिक फैसले की वजह से जम्मू-कश्मीर के लोगों ने उत्साह के साथ मतदान प्रक्रिया में भाग लिया और बिना किसी हिंसा के 98 फीसदी मतदान हुआ। मगर हकीकत यह है कि नरेंद्र मोदी उस मतदान का जश्न मना रहे हैं जो इस साल पांच अगस्त के फैसले से पहले हुआ था। फिर ये परोक्ष मतदान से हुआ चुनाव है। जम्मू-कश्मीर में 316 ब्लॉक हैं। 24 अक्टूबर को इनमें से दो ब्लॉक में चुनाव नहीं हुआ, क्योंकि इनके अंतरगत आने वाली पंचायतों में कोई प्रतिनिधि ही नहीं था। इससे साफ पता चलता है कि घाटी में पिछले दिसंबर में लोगों ने पंचायत चुनावों का बड़े स्तर पर बहिष्कार किया था। चार काउंसिलों में जहां चेयरपर्सन का पद महिलाओं के लिए आरक्षित था, वहां किसी ने भाग ही नहीं लिया। तीन अन्य काउंसिलों में सभी नामांकनों को रद्द कर दिया गया। इस हिसाब से देखा जाए तो 307 ब्लॉक में ही चुनाव हुए। 27 काउंसिलों में केवल एक प्रत्याशी था। इन 27 काउंसिलों में 24 कश्मीर घाटी की थीं। इस हिसाब से इन काउंसिलों में सौ फीसदी मतदान हुआ। अब प्रधानमंत्री खुद कम मतदान को जम्हूरियत की जीत बता रहे हैं। क्या इससे सच पर लोगों का ध्यान नहीं जाएगा?

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